नीमच के अफीमची कबूतरों की तरह होने से बचे सरकार…

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राघवेंद्र सिंह

मध्यप्रदेश में निजाम बदल गया है। मामा के स्थान कमिटमेंट नाथ ने जगह ले ली है। 15 साल की भाजपा सरकार की और 70 साल की प्रशासनिक जड़ता ने लाइलाज बीमारी की शक्ल अख्तियार कर ली है। ऐसे में कमलनाथ सरकार पर सरकार और प्रशासन में छाये अफीम के नशे को तोडऩे का महत्वपूर्ण काम आ पड़ा है। इस पूरे मामले को समझने के लिए मध्यप्रदेश के नीमच का एक सच्चा सीन आंखों के सामने घूम रहा है। असल में नीमच मंदसौर पूरे हिंदुस्तान तो क्या दुनिया भर में अफीम की खेती, ब्राउन शुगर के लिए जाना जाता है। शहर के बीचोंबीच एक ऐसा इलाका है जिसे समझें तो पूरे सूबे की हालत को देखा जा सकता है। असल में यहां अल्कलाइन फैक्टरी है जहां अफीम रखी जाती है। बरसों बरस से यह काम यहां हो रहा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि यहां इसके आसपास रहने वाले लोग पशु, पक्षी जानवर तक अफीम के नशे में डूबे हुए से लगते हैं। अब यहां कबूतरों का डेरे दिखते हैं जिनकी संख्या सैकड़ों में है। नीमच का इलाका छोड़कर यह कबूतर कहीं जाते नहीं हैं। क्योंकि यहां की हवा पानी और खाने पीने में अफीम का नशा इनको लग गया है। कितना भी भगाओ लेकिन यह कहीं जाते नहीं उसकी वजह यह है कि नशे की वजह से यह अफीमची हो गए हैं। जैसे सरकार अमले में काम करने वाले लोग नफरमानी और भ्रष्टाचार की अफीम में इतने डूब गए हैं कि हुकूमत कोई भी आ जाए वह टस से मस नहीं होते। इसके बाद यहां के गाय, बैल और पालतू पशुओं की भी यही हालत है। वह भी अफीम के नशे के चलते सड़कों पर खड़े हैं तो उसे छोड़े को तैयार नहीं अैार उठने को तैयार नहीं। भूखे हैं तो खाने को तैयार नहीं। वजह है अफीम का नशा। इसी तरह व्यापारी भी नशे की इस आवोहवा में ग्रस्त हैं। मिसाल के लिए अगर दुकान पर सेठ जी बैठे हैं और ग्राहक कोई कम पैसे का सामान लेने आता है उसे सौदा देने के बजाए वह कह देते हैं कि यह सामान हमारे पास नहीं है। कारण यह है कि इतने छोटे से सौदे के लिये उठकर कौन जाए। मसलन की दवाई की दुकान है और कोई दुख दर्द की दो रुपये की गोली मांगता है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं कि मेडीकल स्टोर पर बैठा आदमी यह कह दे कि यह दवाई हमारे पास नहीं है। अगर कोई ग्राहक दुकान पर रखी हुई दवा बता भी दे दे तो वह कह देगा आप उठा और पैसे दे दो। कुल मिलाकर नीमच शहर का यह इलाका अकेले नीमच की तस्वीर नहीं बताता। सरकार में बैठे लोगों को समझना पड़ेगा कि नौकरशाही, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार, निकम्मापन , मक्कारी और इन सबको लेकर आई जड़ता मंत्रालय से लेकर ग्राम पंचायत तक में छायी हुई है। यह भी एक किस्म का नशा है, बीमारी है। अगर इससे छुटकारा नहीं पाया गया तो प्रदेश में गवर्नेंस की स्थिति नीमच के उस अफीमची इलाके जैसी हो जाएगी जहां से कबूतर उडऩे को तैयार नहीं, जानवर सड़क से हटने को तैयार नहीं और आम आदमी काम करने को तैयार नहीं। अगर यह व्यवस्था नहीं बदली तो ऐसा न हो कि नीमच की अफीमची कबूतरों की भांति कमिटमेंट नाथ की सरकार के मंत्री और अफसर भी मंत्रालय में कमरों की तरह बनी शाखाओं में ऊंघते मिलें। जैसे नीमच कबतूरों को कितनी भी उड़ाने और भगाने की कोशिश होती है वह उड़ते नहीं वैसे ही आजादी के बाद से सत्ता और नौकरशाही के इन कबूतरों को जगाने और उड़ाने की कोशिश हो रही है मगर कामयाबी नहीं मिलती। हुकूमतों की बात करें तो दिग्विजय सिंह सरकार 10 साल रही और शिवराज सिंह की सरकार 13 साल रही। लेकिन सत्ता और प्रशासन में घुली अफीम और उसके नशे से छुटकारा यह नहीं पा सके।
एक और बात है कमलनाथ ने किसानों के दो लाख कर्ज माफी की बात की थी। लेकिन नौकरशाही ने जो आदेश निकाला उसमें लिखा था पात्रता प्राप्त किसानों के कर्ज माफ होंगे। यह जो पात्रता प्राप्त शब्द है यह साबित करता है कि जो नौकरशाही अफीम के नशे में शिवराज के संग डूबी हुई थी वह कमलनाथ के शासन में नशे से बाहर नहीं निकली। कमलनाथ सरकार की किरकिरी हुई और उन्हें फैसले में संशोधन करना पड़ा। ऐसे ही हर महीने की पहली तारीख को मंत्रालय में वंदमातरम गाने का था जो अचानक नौकरशाही के अफीमची होने के कारण बिना किसी वजह के बंद हो गया। लेकिन कमरनाथ सरकार ने किसानों के बाद वंदेमातरम में अपनी फजीहत कराई और बाद में इज्जत बचाने के लिये नये सिरे से लागू करने की बात की। वैसे तो सरकार अभी कुर्सी पर ठीक से बैठ भी नहीं पाए है और दो बड़े मामलों में उसे नीचा देखना पड़ा है। यह अफीम के नशे में डूबे कबूतरों और नशे में सड़क पर खड़े जानवरों की तरह का मामला है। कमलनाथ सरकार ने अधिकारियों की गलती को अपने सिर लिया अगर यह सिलसिला नहीं थमा तो नौकरशाही को पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और सुंदरलाल पटवा की तरह कमलनाथ ने कस कर नहीं रखा तो फिर यह अफसरशाही के कबूतर अपने घौंसलों से तो नहीं हटेंगे बल्कि हो सकता है कमलनाथ और उनकी सरकार उन्हीं कबूतरों के साथ बैठी नजर आए