तो क्या एक दिन की शपथ से रामराज आ जायेगा

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रवींद्र बाजपेयी

मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ का ये कहना पूरी तरह से सही है कि एक दिन वंदे मातरम गाने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता और जो लोग इसका गायन नहीं करते क्या वे देशभक्त नहीं हैं ? दरअसल ये बात तब उठी जब गत दिवस प्रदेश की राजधानी भोपाल में सचिवालय के समक्ष सभी कर्मचारियों द्वारा होने वाला राष्ट्रगीत गायन नहीं हुआ। इस परंपरा को बाबूलाल गौर द्वारा मुख्यमंत्री बनने पर प्रारम्भ किया गया था। विपक्षी दल भाजपा ने बिना देर लगाए मुख्यमंत्री और कांग्रेस पर हमला बोल दिया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो यहां तक कह दिया कि यदि कांग्रेस को वंदे मातरम गाने में शर्म आती है या उसके शब्द याद नहीं हैं तो वे स्वयं आकर गाने तैयार हैं। बाद में कमलनाथ ने स्पष्ट किया कि वे इस परंपरा का स्वरूप बदलकर इसे नए सिरे से शुरू करवाएंगे। कुछ लोगों का ये भी कहना है कि इस आयोजन से सचिवालय के कर्मचारियों का एक घंटा बेकार हो जाता था। खैर , नई सरकार के निर्णय ने एक विवाद को तो जन्म दे ही दिया। मुख्यमंत्री ने इसे क्यों बन्द किया इसका कारण स्पष्ट हुए बिना नई सरकार की मंशा पर संदेह करना जल्दबाजी होगी लेकिन ये भी सही है कि बरसों से चली आ रही परंपरा को बिना कोई ठोस कारण बताए अचानक बन्द करने पर सवाल उठना भी स्वाभाविक ही हैं। और फिर जब बात राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त वंदे मातरम की हो तब तो बवाल मचना ही था। उल्लेखनीय है संसद में भी वंदे मातरम का गान होता है। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रगीत गाने या न गाने को राष्ट्रभक्ति का आधार मानने सम्बंधी जो बात कही वह अपनी जगह सही है। वंदे मातरम को लेकर मुस्लिम समाज को सदैव आपत्ति रही है। भारत माता की जय बोलने पर भी कुछ लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं। लेकिन असदुद्दीन ओवैसी और आज़म खान ब्रांड मुसलमानों से हटकर जावेद अख्तर सरीखे मुस्लिम भी हैं जिन्होंने राज्यसभा में अपने विदाई भाषण में भारत माता की जय बोलकर उन लोगों को करारा जवाब दिया जो इसमें भी मज़हब तलाशते हैं। एक वर्ग डॉ. फारुख अब्दुल्ला जैसों का भी है जो दिल्ली में तो भारत माता की जयकार करता है लेकिन कश्मीर पहुंचते ही उनकी जुबान पलट जाती है। वंदे मातरम किसी धर्म या राजनीतिक दल विशेष का न होकर राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत एक गीत है जो स्वतंत्रता सेनानियों के लिए गुरुमंत्र समान था। कांग्रेस के अधिवेशनों में भी उसका गायन होता था। मौलाना आज़ाद जैसे मुस्लिम नेता तक ने कभी उसका विरोध नहीं किया। आज़ादी के बाद यद्यपि जन गण मन को राष्ट्रगान के तौर पर स्वीकार कर लिया गया लेकिन वंदे मातरम को भी बतौर राष्ट्रगीत सम्मान दिया जाता रहा। हालांकि बाद में कट्टरवादी सोच के चलते एक तबके ने इस पर ऐतराज करना शुरू भी किया लेकिन अधिकतर देशवासी जिनमें सभी धर्म और संप्रदायों के लोग हैं वंदे मातरम के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं। मप्र के सचिवालय में महीने के पहले दिन वंदे मातरम का सामूहिक गायन समय की बर्बादी या किसी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार या पोषण न होकर कर्मचारियों के बीच राष्ट्रभक्ति का भाव जगाने का प्रयास मात्र था। यह अपने उद्देश्य में कितना सफल हुआ ये विश्लेषण का विषय हो सकता है लेकिन इसे बिना किसी उचित कारण के बन्द कर देना खटकने वाला है। कमलनाथ और कांग्रेस दोनों की राष्ट्रभक्ति पर सन्देह करने का भाजपाई पैंतरा तो निश्चित रूप से राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित और प्रभावित कहा जा सकता है लेकिन बिना वैकल्पिक प्रबंध किए एक अच्छी परंपरा को अचानक रोक देना भी शुभ संकेत नहीं है। यदि मुख्यमंत्री या उनके सहयोगियों के मन में सन्दर्भित आयोजन को लेकर कोई विचार था तब वे उसे अगले माह से लागू कर सकते थे। अभी सरकार बने ज्यादा समय नहीं हुआ है। मंत्रियों ने ठीक से अपना कार्यभार भी नहीं संभाला। विभागों को लेकर असंतोष भी सतह पर तैर रहा है। बाहर से समर्थन दे रहे निर्दलीय और सपा – बसपा अलग आंखें तरेर रहे हैं। विधानसभा में सरकार के पास बहुमत का भी टोटा है। ऐसे में बेहतर होगा मुख्यमंत्री अपनी ऊर्जा चुनावी वायदों को पूरा करने में लगाएं। अगर वे रास्वसंघ की शाखा और वंदे मातरम सरीखे मुद्दों में उलझे तो लोकसभा चुनाव के पहले उनकी सरकार अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकेगी। मुख्यमंत्री ने शपथ लेने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटलबिहारी वाजपेयी के जन्मदिन को सुशासन दिवस के तौर पर मनाए जाने की शिवराज सरकार की परंपरा को जारी रखने का आदेश निकालकर अपनी रचनात्मक सोच का परिचय दिया था। प्रदेश भर में सरकारी दफ्तरों के पूरे अमले ने अटल जी की तस्वीर के सामने सुशासन की प्रतिज्ञा दोहराई। कमलनाथ ने महीने में एक दिन वंदे मातरम गाने से राष्ट्रभक्त नहीं हो जाने की जो बात कही यदि उसे ही मापदंड मानें तब ये सवाल भी तो उठ खड़ा होता है कि साल में एक दिन सुशासन की शपथ लेने से क्या सरकारी दफ्तरों में रामराज आ जाएगा? उम्मीद की जानी चाहिए कि कमलनाथ वंदे मातरम गायन को लेकर उत्पन्न विवाद का समुचित हल निकालकर अगले माह से वैकल्पिक व्यवस्था लेकर आएंगे क्योंकि प्रश्न राष्ट्रगीत की प्रतिष्ठा का है।