सरकार सब कुछ करे पर भरोसा न तोड़े…

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राघवेंद्र सिंह

सियासत और समाज के साथ जीवन के हर क्षेत्र में विश्वसनीयता जरूरी है। कई बार लोग कहते हैं जुए सट्टे से लेकर अंडरवल्र्ड की दुनिया में कोई लिखा पढ़ी नहीं होती मगर मजाल है कि जो बात तय हो जाए कोई उससे टस से मस हो जाए। पिछले कुछ दशकों में राजनीति में सबसे ज्यादा संकट भरोसे का पैदा हुआ है। नेता लोग जनता और कार्यकर्ता से कुछ कह दें तो लोग उसे जैसा अभी सच मानते हैं वैसा पहले भी मान लेते थे। मगर अब बस सत्ता मिले इसके लिए कुछ भी करने बोलने को तैयार रहती हैं पार्टियां और नेता। उसे दृष्टिपत्र और वचन पत्रों से भी जोड़ के देखा जा सकता है। बहरहाल हम मुद्दे पर आते हैं और सत्ता के दांव पेंच और षड़यंत्रों को समझने के लिए मध्यप्रदेश के परिदृश्य में महाभारत की एक घटना याद आती है। इसमें युध्द के दौरान पांडव खेमे में द्रोणाचार्य को लेकर बहुत चिंता थी। सबको पता था गुरू द्रोण हैं तो फिर युध्द जीतना मुश्किल है। ऐसे में कृष्ण ने एक योजना बनाई कि द्रोणाचार्य का मनोबल तब टूटेगा जब उनके पुत्र अश्वत्थामा की मृत्यु हो जाए। लेकिन सब जानते थे अश्वत्थामा अमर है। रणनीति के तहत कृष्ण ने मुश्किल से ही सही धर्मराज युधिष्ठिर को इस बात के लिए राजी किया कि वे रणक्षेत्र में यह कह दें कि अश्वत्थामा मारा गया। कौन जाने नरोवा या कुंजरा। असल में कौरव दल में अश्वत्थामा नाम का एक हाथी भी था। पांडवों ने युधिष्ठिर के ऐलान के साथ ही इतने जोर से नगाड़े बजाए कि अश्वत्थामा मारा गया के बाद के शब्द शोर में दब गए। चूंकि धर्मराज ने ऐलान किया था सो पुत्र शोक में डूबे गुरू द्रोण ने हथियार डाल दिए थे। इसके बाद महाभारत की घटना तो बहुत सी हैं जिसमें भीष्मपितामह को मृत्युशैया पर लिटाने से लेकर कर्ण से रक्षा कवच लेने और पांच पांडवों की प्राण रक्षा का वचन भी शामिल है। ये सब केशव की रणनीति के हिस्सा थे। आज मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ इस भूमिका में काफी कुछ दिग्विजय सिंह नजर आते हैं। उन्हें लोग अर्जुन सिंह के बाद सूबे की सियासत में चाणक्य भी कहते हैं।
मुख्यमंत्री चयन से लेकर मंत्रिमंडल गठन और विभाग वितरण तक जो सीन दिखा उससे राज्य के शुभचिंतकों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई है। हमने पहले भी लिखा था कम से कम सौ दिन या छह महीने सरकार के कामकाज को लेकर टिप्पणी करने के बजाए धीरज की जरूरत है। लेकिन जो घटनाएं होंगी उस पर लिखना बोलना नई बहू के हनीमून पीरियड से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। अलग बात है कि कमलनाथ उन भाग्यशाली नेताओं में हैं जिन्होंने लगभग छह महीने पहले ही प्रदेश अध्यक्ष का कार्यभार संभाला और ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम पर माथापच्ची के बाद थोड़ा विलंब से ही सही मुख्यमंत्री बन गए। इसे भाग्य पराक्रम उनकी वरिष्ठता और दिग्विजय जैसे नेता का साथ में होना भी समझा जा सकता है। मगर असली परीक्षा का कम समय कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन के डायलाग की तरह ‘समय शुरू होता है अब…’ कहा जा सकता है सरकार में चेहरा मुख्यमंत्री हैं दिमाग और शरीर दिग्विजय सिंह हैं। सूबे के बारे में भाजपा और कांग्रेस में अगर नेता, अफसर और पत्रकार को जितना दिग्विजय सिंह जानते हैं उतना शायद कम ही लोग जानते हैं। ये भी कहा जा सकता है कि ये सरकार उनके बच्चे की तरह है। पहले वे कार्यकर्ता और जनता से कहते भी थे टिकट किसी को भी मिले बस कांग्रेस को जिताना है। इसके बाद मुख्यमंत्री मंत्री और विभागों के सवालों पर उनका उत्तर होता था। एक बार सरकार में आ जाएं सब तय कर लिया जाएगा। निर्णय तो हुए लेकिन थोड़ी जग हसाई के बाद। ऐसा नहीं माना जा सकता कि कमलनाथ, दिग्विजय सिंह या टीम राहुल को इससे हुए नुकसान का अंदाजा का नहीं होगा। भाजपा कैंप इस तरह के मुद्दों को हवा दे सकता है लेकिन कार्यकर्ता और मतदाताओं को भरोसा है कि चाहे जैसी राजनीति हो रही हो कांग्रेस वचन पत्र को हर हाल में पूरा करेगी।

विश्वास को समझने के लिए स्कूल में पढ़ी बाबा भारती और डाकू खड़ग सिंह की एक कहानी याद आती है जिसमें बाबा भारती घोड़े के शौकीन थे और उनके पास सफेद रंग का आज्ञाकारी घोड़ा था जिसे वे आवाज देकर बुला लिया करते थे। उस पर बिना लगाम के भी वे सवारी करते थे। डाकू खड़ग सिंह को बाबा का घोड़ा पसंद आया और उसने उसे मांगा। बाबा के इंकार पर उसने घोड़ा पाने की एक साजिश रची जिसमें वह रास्ते में गरीब और बीमार आदमी का भेष रख कर बैठ जाता है। घोड़े पर आ रहे बाबा को देख वह इलाज के लिए शहर जाने के वास्ते घोड़ा मांगता है। उसकी तकलीफ देखकर बाबा भारती अपने घोडे पर उसे बैठा देते हैं। इसके बाद थोड़ी दूर जाने पर खड़ग सिंह घोड़े को ऐड़ लगाता है और भागते हुए कहता है देखा बाबा मैने कहा था न ये घोड़ा मैं आपसे ले लूंगा। इस पर आवाज देकर बाबा ने घोड़े को बुलाया और उस पर सवार डाकू से कहा तुम घोड़ा भले ही ले जाओ मगर ये किस्सा किसी को बताना मत। नहीं तो लोग गरीब, असहाय और बीमारों पर भरोसा करना बंद कर देंगे। कमलनाथ तो आंदोलन से जन्मी उस कांग्रेस के सिपाही हैं जिसमें महात्मा गांधी पर लोगों का इतना भरोसा था कि अगर बापू ने कहा है आंदोलन में हिंसा नहीं होगी तो भले ही अंग्रेजों ने घोड़ों से कुचला हो या गोलियां बरसाईं हों कार्यकर्ताओं और जनता ने हिंसा का रास्ता अख्तियार नहीं किया। अब भरोसे की गेंद कमलनाथ के पाले में है वे उसे तोड़ते हैं या जोड़ते हैं।