देशहित में ‘काउंटर इनफ़ोर्मेशन’ लाज़िमी…….

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ज़हीर अंसारी

बड़ी अजीब बातें हो रही हैं आजकल। सच की बजाय झूठ परोसा जा रहा है। झूठ परसने का सलीक़ा ऐसा कि युवा पीढ़ी उस कृत्रिम झूठ को सच मान रही है। कृत्रिम झूठ की वजह से भारत का इतिहास, सामाजिक व राजनैतिक ताना-बाना और आपसी सौहार्द दूषित हो रहा है। ये दौर देश में पाँच-छः साल पहले शुरू हुआ था, जो अब तक चालू है। हालाँकि कृत्रिम झूठ की रफ़्तार अब थोड़ी थमी सी प्रतीत हो रही है, फिर भी कृत्रिम झूठ की गाड़ी चलाई जा रही है। इस कृत्रिम झूठ की वजह से आम जनमानस दुविधा में पड़ गया है। दुविधा इसलिए कि आम नागरिक सत्य को समझ नहीं पा रहा है। सत्य के भी दो पहलू हैं। एक वो सत्य जो वाक़ई सत्य है, एक वो झूठ जो बिना किसी पुख़्ता आधार के सत्य निरूपित किए जाने का प्रयास किया जाता है। झूठ को सत्य बताने के लिए सुनियोजित तंत्र सक्रिय है और इस तंत्र के पीछे वो लोग शामिल हैं जो किसी भी क़ीमत पर देश की सत्ता हथियाना चाहते हैं।

देखने में आ रहा है कि धर्म, जाति, इतिहास और पूर्ववर्ती राजनेताओं के बारे में भ्रामक जानकारियां सुव्यवस्थित तरीक़े से सोशल मीडिया में फैलाई जा रही। इस मुहिम में उन्हें भी नहीं बख़्शा जा रहा है जिन्होंने आज़ादी के बाद देश को नहीं सुदृढ़ और सार्थक दिशा प्रदान की थी। झूठे तथ्यों को स्थापित करने सोशल मीडिया के अलावा कुछ मीडिया हाउसेस का सहारा भी लिया जा रहा है। इस सहारे के एवज़ में रक़म पानी की तरह बहाई जा रही है। ये वो रक़म जो जनता की जेब से आती है।

झूठ फैलाने की घातक प्रवृति को देखते अनेक प्रबुद्धजन, वरिष्ठ साहित्यकार और इतिहासकार चिंतित हैं। इन्हीं में देश-विदेश में ख्यातिप्राप्त वरिष्ठम साहित्यकार ज्ञानरंजन भी हैं। ज्ञान जी ने अपने जीवन के शुरुआत में जिस समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र, साहित्य और इतिहास पढ़ा, जाना और समझा अब उसका स्वरुप विशेष मुहिम की तहत बदनुमा किया जा रहा है। लिहाज़ा उनका फ़िक्रमंद होना लाज़िमी है। इसलिए ज्ञान जी का मशविरा है कि जब भी इस तरह के सवाल-जवाब किए जाते हैं, सोशल मीडिया पर थोड-मरोड़कर इतिहास या अन्य पठनीय सामग्री पेश की जाती है तो उसकी ‘काउंटर इनफ़ोर्मेशन’ ज़रूर हासिल करना चाहिए। किसी भी प्रसारित तथ्य की पुष्टि बिना विश्वास करना या आगे प्रेषित कर दूसरों को भ्रमित करना देशहित में नहीं होगा।

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