शिवराज की सक्रियता और उसके कूटनीतिक मायने…

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राघवेंद्र सिंह

मौसम के लिहाज से मध्यप्रदेश में कड़ाके की सर्दी पड़ रही है ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की सक्रियता ने कांग्रेस तो ठीक भाजपा में भी गर्माहट बढ़ा दी है। भोपाल में ठिठुरते गरीब और बेसहारा लोगों के बीच उपस्तिथि दर्ज करा सबको हैरत में डाल दिया है।भाजपा में उनकी सक्रियता के कई मायने निकले जा रहे हैं।कुछ नेता मानते हैं कि शिवराज की नजरें संगठन में प्रदेश अध्यक्ष के पद पर लगी हुई हैं तो कुछ ऐसा भी मानते हैं कि विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में आक्रामक भूमिका निभाना चाहते हैं।
शिवराज के ये डायलॉग इस मायने में काफी महत्वपूर्ण है – जैसे टाइगर अभी ज़िंदा है,हम कम है पर कमजोर नही। बहुमत की संख्या से सात कदम पीछे है। वे यह भी कहते हैं कि सरकार में आने के लिए वचन कांग्रेस ने दिए हैं मगर उन्हें पूरा हम कराएंगे। इसी तरह दो दिन पहले भोपाल के रैन बसेरों में सर्द हवाओं के बीच गरीब लोगों से बातचीत कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे गरीबों कर साथ हैं और उनके हित में संघर्ष करते रहेंगे। रैन बसेरा में जब एक आदमी ने कहा कि उन्हें अपना घर चाहिए तब उन्होंने कहा कि हमने इसी के लिए तो संबल योजना बनाई थी। इसके पहले उन्होंने बुधनी से आये कार्यकर्ताओं से कहा था हमने जो जो घोषणा की हैं उसकी सूची बना लें मतदान केंद्र और गांव के हिसाब से उसकी पूर्ति कराएंगे।अगर नई सरकार नही मानती है तो फिर सड़क पर डेरा डालो, घेरा डालो आंदोलन करेंगे,नेताओं को घेरेंगे और ऑफिसों का घेराव करेंगे। कुल मिलाकर उन्होंने सरकार और अपने कार्यकर्ताओं को संदेश दिया है कि तेरह साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी अब विरोधी नेता के रूप में न तो उनकी सक्रियता काम हुई है और न ही उनकी धार बोथरी हुई है। उनके इसी अंदाज ने सूबे की सियासत को गरमा दिया है।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष कौन होगा इसको लेकर भाजपा में मंथन चल रहा है लेकिन शिवराज सिंह की सक्रियता ने यह ज़ाहिर कर दिया है कि विरोधी दल के नेता के लिए वे सबसे प्रबल दावेदार हैं।दूसरी तरफ विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार को लेकर चुनाव के पहले प्रदेश अध्यक्ष बनाये गए राकेश सिंह का पद पर बने रहना सवालों के घेरे में आ गया है। उनकर ग्रह जिले जबलपुर से लेकर महाकौशल और बुंदेलखंड में पार्टी की पराजय राकेश सिंह और उनकी टीम की असफल होने की पुष्टि करती है।हालांकि हार की ज़िम्मेदारी शिवराज सिंह ने अपने ऊपर ली है मगर बगावत और उससे हिने वाले डैमेज को कंट्रोल नही कर पाना अगले साल हिने वाले लोक सभा चुनाव कर लिए पार्टी को खतरनाक संकेत देते हैं।आने वाले दिनों में प्रदेश भाजपा में बड़े बदलाव के संकेत मिले हैं।बहुत संभव है केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को प्रदेश भाजपा में फिर भेज जाय साथ ही विधान सभा में शिवराज सिंह को कमान सौपी जाए।हालांकि इस दौड़ में गोपाल भार्गव और नरोत्तम मिश्रा भी मजबूत दावेदार बनकर उभरे हैं।लेकिन सबकुछ ठीकठाक रहा तो एक बार फिर भाजपा हाई कमान अनचाहे ही सही एक बार फिर नरेंद्र सिंह तोमर और शिवराज के कानों से सुनेगा और उनकी आंखों से देखेगा। वर्ष 2008 और 2013 में इन दोनों नेताओं की जोड़ी ने प्रदेश में पार्टी को बहुमत दिलाया था।तीन राज्यों में चुनाव में हारने के बाद भाजपा हाई कमान भी कमजोर ही गया है और वो खुद भी आलोचनाओं के दबाव में है।लोकसभा चुनाव जीतना हाई कमान की पहली प्राथमिकता है। इसलिय हारे हुए राज्यों में अभी सूबेदारों की सियासत चलने के आसार हैं।इधर कांग्रेस इस बात की प्रतीक्षा कर रही है कि नेता प्रतिपक्ष कौन होता है ? और बदलाव हुआ तो भाजपा नया प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा ? फिलहाल तो राजनीति के विक्रमों पर सवाल पर बेताल सवार है और इसी किसम के उलझे सवाल पूछ रहा है…? उत्तर समय देगा और सभी को उसी का इंतजार है… सियासत के ग्राफ ने सर्दी के पारे को थाम सा दिया है और इस गर्मी की आंच में कई नेताओं के अरमान पिघलते लग रहे हैं…फिलहाल तो सब दम साधे देख रहे हैं…
(लेखक IND24 न्यूज MP/CG समूह के प्रबंध संपादक हैं)