कमलनाथ, इसलिए कुछ अलग, कुछ हटकर

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जयराम शुक्ल

छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता/टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता..
भारतरत्न अटलबिहारी वाजपेयी की एक लंबी कविता के बीच की इन दो पंक्तियों के मंत्र को भले ही उनके अनुयायी आत्मसात न कर पाएं हों पर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इसे चरितार्थ कर दिखाया, वह भी कुर्सी सँभालते ही।

25 दिसम्बर को वाजपेयी जी की जयंती है उसके एक दिन पहले से ही प्रदेश में उनको समर्पित सुशासन सप्ताह मनाया जा रहा है। यह प्रयोजन शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने प्रारंभ किया था। प्रबंधन गुरू के तौर पर विख्यात कमलनाथ का मुख्यमंत्री के तौरपर यह कूटनीतिक चातुर्य का पहला प्रकरण है।

आमतौर यह धारणा है कि सत्ता बदलने के साथ नया सत्ताधीश सबकुछ बदल देता है। योजनाएं, कार्यक्रम, उनके नाम, उद्देश्य तौरतरीके सबकुछ। कभी-कभी तो वह उस कुर्सी को भी धुलवाकर अभिमंत्रित करता है जिसमें पूर्ववर्ती बैठा करता था। कमलनाथ ने यह कुछ करने की बजाय उन्हीं के अस्त्रों से उन्हीं को धूलधूसरित करने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है।

सरकार बदलने के साथ राजनीतिक नियुक्तियों को रद्द करना तो स्वाभाविक ही है। वैसे तो ऐसे पदों पर विराजमान महानुभावों को नतीजे आने के साथ ही त्यागपत्र दे देना चाहिए पर कई ..कुछ दिन और.. के मोह में किरकिरी करवा ही लेते हैं, सो करवा लिया। जाहिर है इन पदों पर पंद्रह साल से सत्ता के लिए भूखे बंगालियों का हक है और उन्हें मिलना भी चाहिए। यह सत्ता प्रबंधन का हिस्सा है।

कमलनाथ जी ने प्रशासनिक सर्जरी शुरू कर दी है। पर इस सर्जरी में बदले का भाव वैसा नहीं दिखता जैसे कि उम्मीद की जा रही थी। मसलन चर्चाओं में रहीं रीवा कलेक्टर को लूपलाइन में डालने की बजाय सागर का कलेक्टर बना दिया। कई ऐसे कलेक्टर हैं जिनके जिले बदले हैं दायित्व नहीं। पूर्व मुख्यमंत्री के सचिवालय में काम करने वाले उनके निकटवर्तियों को उनकी क्षमता और योग्यता के अनुरूप विभाग प्रमुख बनाए। ऐसे और कई भी दृष्टांत मिल जाएंगे इस रद्दोबदल में।

सही पूछें तो ब्यूरोक्रेसी एक रोबट मशीनरी है, यह रिमोट हैंडलर पर निर्भर करता है कि उसका कैसे इस्तेमाल करे। सभी जानते हैं कि जो प्रशासनिक अधिकारी कभी दिग्विजय सिंह के आँख-नाक-कान हुआ करते थे वही बाद में शिवराज सिंह के बन गए और आप देखेंगे उन्हीं में से प्रायः कई कमलनाथ के बन जाएंगे। इसमें हर्ज भी नहीं है। मैनेजमैंट फंडा कहता है कि व्यवस्था बदलने से बेहतर है कि उसे अपने हिसाब से ढाल लिया जाए और नए संसाधनों की खोज में माथापच्ची करने की बजाय उसी संसाधन को अपनी धार बना लें।

कमलनाथ ने इसकी शुरुआत शपथ लेने के साथ ही कर दी। राजेश राजौरा साहब जिन्हें भाजपा की राजनीतिक कार्यशालाओं में जाकर कृषि के मामलों में व्याख्यान देने के लिए कांग्रेसी आड़े हाथों लेते थे, मुख्यमंत्री कमलनाथ का पहला आदेश उन्हीं के करकमलों से हस्ताक्षरित होकर जारी हुआ। आदेश था कृषि के कर्जमाफी का। राजौरा साहब सही सलामत हैं।

किसी बदली हुई व्यवस्था में प्रतिद्वंद्वी का विश्वसनीय और पुराना खिलाड़ी बड़े काम का होता है। वह अपनी नई वफादारी साबित करने के लिए दोगुनी ऊर्जा के साथ काम करता है। जो निर्णय लेने में नए नवेले असहज हो सकते हैं पुराने व घुटेहुए वही न सिर्फ मिनटों में ले लेते हैं अपितु उसे तार्किक बनाने में अपना समूचा प्रशासनिक ग्यान उड़ेल देते हैं। राजनीति प्रशासन और प्रबंधन के मंझे खिलाड़ी कमलनाथ को यह मालूम है।

हमारे देसज नेता यदि किसी बात से सबसे ज्यादा भय खाते हैं तो वह अफसरों की फर्राटेदार अँग्रेजी से। यही अँग्रेजी मंत्रियों को दबाए रखने में काम आती है। दून और सेंटजेवियर से पढ़कर भद्रलोक से राजनीति शुरू करने वाले कमलनाथ के आड़े यह भी नहीं आएगी।

बल्लभभवन की पहली बैठक में कमलनाथ अफसरों से अँग्रेजी में ही संवाद किए। एक उम्मीद आप पाल सकते हैं कि कमलनाथ के रहते कहीं भी ब्यूरोक्रेसी हावी होती नहीं दिखेगी क्योंकि सबके सब उनके आगे सर..सराते ही दिखेंगे।

शिवराज काल में ब्यूरोक्रेसी का हाल क्या था इसका एक वाकया बताते हैं.. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी ने खुद झाडू लेकर स्वचछता अभियान शुरू किया। देखा देखी मुख्यमंत्री समेत सभी छोटे मझोले नेताओं का यह रोजाना का कर्मकांड सा बन गया। अपने मुख्यमंत्री भी अतरे-दूसरे झाडू लिए अखबारों में छपने लगे। हम कुछ पत्रकार एक बड़े और बड़बोले ब्यूरोक्रेट से इसकी चर्चा कर रहे थे। उस ब्यूरोक्रेट ने छूटते ही कहा- मैं शिवराज से कहूँगा कि ढ़ोग-धतूरे का कर्मकांड बंद करें और भी दूसरे काम हैं। उस नौकरशाह ने शिवराज जी से यह कहा हो या नहीं, पर झाडू वाली तस्वीरें अखबारों से गायब हो गईं। अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में कोई नौकरशाह किसी के भी सामने मुख्यमंत्री को लेकर ऐसी हल्की बात कहने के लिए सौ-सौ बार सोचता।

मुख्यमंत्री ब्यूरोक्रेसी के लिए “टेकेन इन्टू ग्रांटेड” नहीं होता अर्जुन सिंह और श्रीनिवास तिवारी ने अपने -अपने कार्यकाल में अच्छे से समझाया। वह कैसे- तिवारी जी ने यह किस्सा सुनाया था “अर्जुन सिंह जब मुख्यमंत्री बने तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यही थी कि ब्यूरोक्रेसी पुट्ठे पर हाथ ही नहीं धरने देती। हर मसले पर इफ-बट और वही अँग्रेजी। मैंने(तिवारी जी) सुझाया कि अफसरों से उनकी ही भाषा में बात करें और लाइन में न आएं तो उनके सबसे बड़े अफसर को बर्खास्त कर दें। अगले महीने ही अनियमितता के किन्हीं पुराने प्रकरणों के आधार पर प्रदेश के मुख्यसचिव बर्खास्त। और इसके बाद अर्जुन सिंह का जो प्रशासन चला वह बताने की जरूरत नहीं। वही ब्यूरोक्रेसी उनकी मुस्कान और गंभीरता, भौंहों के संकेत पढ़ने में जुटी रही। फिर यही काम श्रीनिवास तिवारी ने विधानसभा में प्रमुखसचिव को बर्खास्त करके किया।

आदर्श स्थिति यह है कि लोकशाही राजसत्ता की सवारी करे। यद्यपि यह शेर की सवारी करने जैसा है। ठीक से मुश्कें नहीं कसी तो शेर चबा जाएगा। या फिर दूसरा विकल्प, शेर की सल्तनत स्वीकार करने का है जो आपदा और विपदा को भी इवेंट में बदलने में माहिर है। मध्यप्रदेश में पहली जरूरत यही है। कानून-व्यवस्था के इकबाल को बुलंद करने का। राजव्यवस्था के प्रति लोक की आस्था और विश्वास जागे तो फिर हर काम स्वमेव आसान होते चले जाएंगे।

मुझे लगता है कि कमलनाथ ऐसा कुछ अलग नहीं करेंगे जो पूर्ववर्ती करते आए हैं बल्कि वे वही काम अलग ढंग से करेंगे। वे अनुमान के विपरीत भाजपा सरकार द्वारा शुरू किए सुशासन सप्ताह को और भी जोरदार तरीके से मानाकर करने जा रहे हैं।

भाजपा की अबतक की सबसे बड़ी ताकत कांग्रेस की कमजोरी रही है। वह कमजोरी चाहे अपने धर्म-संस्कृति की समझ को लेकर रही हो या महापुरुषों को उपेक्षित करने की। भाजपा ने सबसे ज्यादा इसे ही अपना भावनात्मक आधार बनाया। संगठन भाजपा की ताकत थी। अब यही सबकुछ काँग्रेस में दिखने लगा है। पंद्रह साल का समय सबक को सीखने और गल्तियां न दोहराने के लिए पर्याप्त होता है।

कमलनाथ बजरंगबली के भक्त हैं। शपथ के दिन से ही यह प्रचारित होना शुरू हो गया। बड़े कट आउट और होर्डिंग्स में भी बजरंगबली दिखे। आप क्या ऐसी कल्पना कर सकते हैं कि पंद्रह वर्ष पहले कांग्रेस का कोई नेता अपनी ऐसी धार्मिक पहचान के साथ प्रस्तुत हो सकता था..?

इन पंद्रह वर्षों में माँ नर्मदा का कितना पानी बह गया, यह दिग्विजय सिंह से ज्यादा और कौन जान सकता है। यदि नर्मदा पुत्र शिवराज 13 सालों तक राज कर सकते हैं तो नर्मदा भक्त कांग्रेसी क्यों नहीं। यदि उधर राम से सत्ता का भरोसा हाँसिल हो सकता है तो इधर हनुमान से क्यों नहीं। काँग्रेस भी अब प्रतीकों की राजनीति की महत्ता अच्छे से समझ गई है। जिन अस्त्रों से अब तक काँग्रेस लहूलुहान होती आई है उन्हीं अस्त्रों सी अब वह भाजपा को भोथरा करने की पूरी तैय्यारी में है, यह बात अच्छे से समझ लेना चाहिए।

कमलनाथ वर्षों पहले छिंदवाड़ा में बजरंग बली की भव्य और ऊँची प्रतिमा बनवाई थी। इसे हम अब जान पाए जब वे मुख्यमंत्री बने। हनुमानजी प्रबंधन के देवता हैं। परिस्थितियों को अपने अनुकूल करने में उनका कोई शानी नहीं। सुरसा को परास्त करने की क्षमता के बावजूद उससे कोई पंगा नहीं लेते। बज्रांग और सर्वशक्तिमान होने का अभिमान त्यागकर वे मच्छर(मसक) के बराबर हीन होकर लंका में प्रवेश करते हैं। सबसे पहले द्वारपाल लंकिनी को अपना अनुगामी बनाते हैं जो ..प्रविसि नगर कीजै सब काजा.. की मंगलकामना करती है। वो रावण की सबसे संवेदी और कमजोर कड़ी विभीषण को पटाते हैं..प्रकारान्तर में वही विभीषण लंकाविजय के सूत्रधार बनते हैं।

कमलनाथ को ब्यूरोक्रेसी और विपक्ष के विभीषणों की अच्छी परख होनी चाहिए.. क्योंकि वे भी राजनीति के प्रबंधन गुरू के नाम से सुविख्यात हैं। लिहाजा यह देखना दिलचस्प होगा कि खंडित जनादेश वाली सरकार को कहाँ से ले जाकर कहाँ और कैसे खड़ा करते हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर उनका पहला इम्तिहान आने वाली मई में है। पास हो गए तो कहने ही क्या..? फेल हुए तो फिर “वैतलवा पीठपर”।

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