बढ़े मतदान प्रतिशत ने कराया शीर्षासन…

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राघवेंद्र सिंह

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव मतदान के साथ 11 दिसंबर तक के लिए कई पहलियां छोड़ गया है। पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार मतदान प्रतिशत 7-8 प्रतिशत तक बढ़ कर 80 फीसद का आंकड़ा छूने की संभावना है। कल तक वोट कितने पड़े यह साफ हो जाएगा और इसके साथ ही शुरू हो जाएगा हार-जीत का गुणा-भाग। अभी तक राजनीतिक पंडित जो मतदान के बाद रुझान बता दिया करते थे कि सरकार बनाने का पलड़ा किसकी तरफ झुक रहा है अब वे भी माथापच्ची करने में लगे हैं। वोटर ने बता दिया है िक पार्टियां, प्रत्याशी जितने चालाक और चालू होते हैं उस तुलना में वो भी सीधा भले ही है, मगर खेलना उसे भी आता है। हालांकि भाजपा ने 90 फीसदी वोट कराने का विज्ञापन दिया था।
सारे राजनीतिक पंडित मतदान का रुख जानने के लिए शीर्षासन कर रहे हैं। लेकिन बढ़ा हुआ मतप्रतिशत, गांव में अधिक मतदान उसमें भी महिला और लड़कियों की ज्यादा भागीदारी सबको चौंका रही है। भाजपा नेता कहते हैं कि हम पहले ही कह रहे हैं कि शिवराज भैया और जगत मामा की तरफ बहनों और भांजियों ने जी खोलकर वोट दिया है। अगर यह सही मानें तो चुनाव का यह ऊंट मामा की करवट बैठ सकता है। दूसरी तरफ कांग्रेस की मानें तो उनके नेताओं का कहना है कि महिला प्रताड़ना और बेटियों से बलात्कार की बढ़ती घटनाओं ने बहनों और बेटियों को कांग्रेस की तरफ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इसके साथ अक्सर कहा जाता है िक ज्यादा वोट सत्ताधारी दल के खिलाफ है लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजे इस तरह के अनुमान को झुठलाते हैं। 2008 की तुलना में 2013 के चुनाव में भाजपा ने विधानसभा में ज्यादा सीटें जीती थीं। अब इस हिसाब से आज के बढ़े मतदान के बारे में बड़े-बड़े सूरमा अनुमान लगाने की बजाय वोटर के सामने पानी भरते नजर आ रहे हैं।
कहा जाता है िक रोग का पता करने के लिए जिस तरह कई तरह की जांच की जाती है, इनमें पैथोलॉजी लैब और एक्सरे पुराने जमाने के नुस्खे हैं। अब बदलते युग में एमआरआई, सीटीस्कैन और ऐसी मशीनें भी आ गई हैं जो एक बूंद खून में कई तरह की जांच रिपोर्ट दे देती हैं। मगर मतदाताओं का मूड भांपने से लेकर मतदान के प्रतिशत तक नतीजे कैसे आएंगे इसे लेकर कोई साफतौर पर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है। दावे भी हो रहे हैं तो होम्योपैथी दवा के नुस्खों की तरह हैं जिसमें कहा जाता है िक दवा असर कर गई तो तीर नहीं तो तुक्का। ऐसे ही क्रिकेट में भारतीय टीम के वरिष्ठ खिलाड़ी रहे लाला अमरनाथ की विशेषज्ञ िटप्पणियां भी याद आती हैं। मैच के बारे में वे सवालों के जवाब में कहते थे कि ये मैच हम जीतेंगे या हारेंगे और ऐसा नहीं हुआ तो ड्रा भी हो सकता है। मतलब जब ये सब कुछ होगा तो विशेषज्ञ टिप्पणियां कैसी? आज के मतदान ने बहुत कुछ विशेषज्ञों को लाला अमरनाथ की तरह बना दिया है।
खैर यह सब पिछले एक महीने से चल रहे सियासी जंग के आखिरी किस्सों में है। हमने ये बाखबर कॉलम अपने पाठकों को राजनीतिक उठापठक, जोड़तोड़, पार्टियों और प्रत्याशियों के दांवपेंच से अवगत कराने के लिए मतदान होने तक के लिए आरंभ किया था। इस बीच में यह बताने की कोशिश की थी कि राजनीतिक दुरभिसंधियों में क्या खिचड़ी पक रही है वोटर को रिझाने के लिए नेता और पार्टियां हकीकत से दूर सपनों और गप्पों के संसार में विचरण कर रही थीं। कई बार हमारी टिप्पणी और सूचनाएं मतदाता को सचेत करने के लिए होती थीं और बहुत बार दलों को जमीनी हकीकत बताने के लिए भी होती थीं। दरअसल कार्यकर्ता क्या सोच रहा है, पार्टियां कहां गलती कर रही हैं, प्रत्याशी कहां रावण के अहंकार में है, यह सब खट्टे-मीठे और कभी-कभी कड़वी बातें भी हमने लिखीं। मतदान के िदन ही आज के बाखबर कॉलम के शीर्षक को अगर याद करें तो हमने लिखा था, ‘कम खराब चुनने का वक्त’ समझाने की गरज से हमने डकैत और नेताओं के बारे में ओशो द्वारा कही गई एक कहानी का भी जिक्र किया था। मगर यह सब समझने और समझाने के लिहाज से था। लोकतंत्र और उसमें राजनीति करने वालों के लिए हमारा कोई पूर्वाग्रह नहीं था। लिहाजा एक महीने की बाखबर की लंबी श्रृंखला को मतदान संपन्न होने के साथ हम भी इसे पूर्णाहुति की तरफ ले जाते हैं। फिर कभी अवसर आया तो बाखबर के साथ आपसे रूबरू होंगे तब तक पत्रकारिता और पाठकों की जय-जय.