वोट से भगवान की जाति का क्या ताल्लुक़….

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ज़हीर अंसारी
सियासी फ़ायदे-नुक़सान के लिए अभी तक धर्म, जाति, वर्ग और अमीर-ग़रीब की व्याख्या की जाती रही है मगर अब इसमें भगवान और देवताओं को भी शामिल किया जाने लगा है। धर्म-जातियों के विभाजन के बाद अब भगवान की जाति बताने की शुरुआत हो गई है। मतदाताओं को प्रभावित करने का नया तरीक़ा ईजाद कर लिया। भगवान की बिरादरी बताकर वोट माँगने का सिलसिला किसी और ने नहीं बल्कि सनातन धर्म के प्रकांड विद्वान योगी आदित्य नाथ ने शुरू की है।

योगी आदित्य नाथ ने अलवर (राजस्थान) जिले के मालिखेड़ा ग्रामीण इलाक़े में चुनावी भाषण करते-करते यह कह दिया कि अंजनीपुत्र भगवान हनुमान दलित हैं। योगी ने यह बात अनुसूचित जाति की सुरक्षित सीट से भाजपा के प्रत्याशी के समर्थन में भाषण देते वक़्त कही। योगी के इस कथन ने सनातन धर्मावलंबियों को अचरज में डाल दिया। उनके इस बयान की सोशल मीडिया में जमकर आपत्ति दर्ज कराई जा रही है।

चूँकि यह पूर्णतः धार्मिक विषय है इसलिए इस पर ज़्यादा लिखना अनुचित है पर सियासी नज़रिए से यह सवाल ज़रूर उठाया जा सकता है कि सिर्फ़ सरकार बनाने के लिए करोड़ों आस्थावान लोगों के आराध्य रामभक्त हनुमान को क्यों शामिल किया जा रहा है ? अभी तक भगवान के नाम पर वोट माँगे जाते रहे, अब भगवान की जाति बताकर वोट माँगना कहाँ तक उचित है ?

उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं धर्म के ज्ञाता हैं। हज़ारों वर्ष पुराने गोरखपुर मठ के महंत होने के नाते हिंदू धर्म की रक्षा और मानवता की सेवा उनका कर्तव्य और दायित्व बनता है, लेकिन ये क्या वो हिंदू धर्म को ही बाँटने पर उतारु हो गए। चंद वोट पाने के लिए भगवान हनुमान की जाति बताने लगे। मुख्यमंत्री योगी ने एक और भाषण में यह स्पष्ट कर दिया कि हनुमान जी भाजपा में ही रहेंगे, कांग्रेस के नहीं हो सकते।

अफ़सोस होता है कि योगी जैसे महंत चुनावी फ़ायदे-नुक़सान के लिए भगवानों की जाति की आड़ लेने लगे। अब आगे देखिए देश की राजनीति कितनी गिरती है।

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