चोरों को चोर कहने में कैसा डर

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जयराम शुक्ल

धन और बाहुबल हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर किस तरह कब्जा करने के लिए आतुर हैं और सालों-साल स्थितियां खतरनाक होती जा रही हैं, इससे देश के हर विवेकवान नागरिक का चिंतित होना स्वाभाविक है और ऐसी स्थिति में जब वह अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति करता है तो उसे किसी भी विशेषाधिकार के हनन का न तो डर रहता है और न ही परवाह।

जि स देश में चक्रवर्ती सम्राट राजा राम और उनकी धर्मपत्नी सीता के चरित्र और आचरण पर अंगुली उठाने और सार्वजनिक चर्चा करने का अधिकार एक आम नागरिक को मिला रहा हो, उस देश के नागरिकों को अपने भ्रष्ट, चरित्रहीन और अपराधी सांसदों, विधायकों और जनप्रतिनिधियों के आचरण के बारे में चर्चा करने से कोई कानून नहीं रोक सकता।

माननीयों के विशेषाधिकार से बड़ा विशेषाधिकार उन मतदाताओं का है जिन्होंने वोट देकर इन्हें विधानसभाओं और संसद में बैठाकर साधारण आदमी से माननीय बना दिया। यह बात अलग है कि अपने देश के कानून में यह व्यवस्था है कि चौराहे की भीड़ के सामने किसी निरीह का कत्ल करने वाले को भी तब तक कातिल नहीं कहा जा सकता जब तक कि उसका जुर्म साबित न हो जाए।

संसद और विधानसभाओं में बैठे कतिपय माननीयों के लिए ये सब बातें प्रति सेकन्ड किसी न किसी कंठ से फूटती हैं। यही बातें लगातार साहित्य, सिनेमा, कला के जरिए भी कही जाती हैं। देश में बनने वाली हर दूसरी फिल्म में नेता, विलेन के रूप में चित्रित किए जाते हैं।

देश की नई पीढ़ी लोकतांत्रिक संस्थाओं में बैठे ऐसे ही विलेनों को देखते हुए जवान हो रही है और तभी तो ‘पान सिंह तोमर’ फिल्म में जब यह डायलाग गूंजता है कि बीहड़ में बागी रहते हैं, डाकू तो संसद में रहते हैं तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है।

दरअसल राजनीति में अपराधीकरण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है और ऐसी स्थिति में आम नागरिक के आक्रोश की अभिव्यक्ति को कोई कानून नहीं रोक सकता। यदि विशेषाधिकार हनन के तहत किसी एक को भी सजा पड़ी तो यकीन मानिए देश भर के डेढ़ अरब लोग इस विशेषाधिकार का हनन करने के लिए तैयार बैठे हैं, किस-किस को संसद के बंदीगृह में डालिएगा।

आँकड़े जरा पुराने हैं, फिर भी अब संसद में ही अपराधियों के ब्योरे के बारे में जानें संसद में दाखिल किए गए 533 हलफनामों के आधार पर कहें 150 (28.14%) ऐसे सांसद हैं जिनके खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। 72 सांसद ऐसे हैं जिनके खिलाफ आईपीसी की संगीन धाराएं लगी हैं। इन पर हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, बलात्कार जैसे जुर्म का आरोप हैं।

2009 की लोकसभा में 300 सांसद जो करोड़पति थे, जबकि 2004 की लोकसभा में करोड़पतियों की संख्या महज 154 थी। इस लिहाज से संसद में धनाढ्यों की संख्या में 95 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। इसी तरह पिछली लोकसभा में जहां आपराधिक पृष्ठिभूमि के 128 सांसद थे वहीं इस लोकसभा में यह संख्या बढ़कर 150 हो गई है। सांसदों, विधायकों के आपराधिक प्रकरणों और संपत्तियों में कौन द्विगुणित होगी इसकी होड़ सी मची है।

यूपी समेत पांच राज्यों के चुनाव भ्रष्टाचार विरोधी वातावरण के बीच हुए। इस दरम्यान अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपने पूरे परवान पर था। चुनाव परिणामों पर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म एन्ड नेशनल इलेक्शन वाच का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन बताता है कि पांच राज्यों में चुने गए 690 विधायकों में से 252 विधायकों के खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज हैं।

2007 के मुकाबले आपराधिक पृष्ठिभूमि वाले विधायकों की संख्या में आठ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। पांच राज्यों में चुने गए कुल विधायकों में से 66 प्रतिशत यानी कि 457 विधायक करोड़पति हैं। पिछले चुनाव के मुकाबले करोड़पतियों में 32 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इस मामले में यूपी की स्थिति बदतर है।

अध्ययन के अनुसार यूपी में 189 (47%) नए विधायक अपराधिक रेकार्ड वाले हैं, जबकि पिछली विधानसभा में यह संख्या 140 (34%) थी। इसी तरह यूपी में 271 (67%) विधायक करोड़पति हैं। जबकि 2007 की विधानसभा में महज 124 विधायक ही करोड़पति थे।

धन और बाहुबल हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर किस तरह कब्जा करने के लिए आतुर हैं और सालों-साल स्थितियां खतरनाक होती जा रही हैं, इससे देश के हर विवेकवान नागरिक का चिंतित होना स्वाभाविक है और ऐसी स्थिति में जब वह अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति करता है तो उसे किसी भी विशेषाधिकार के हनन का न तो डर रहता है और न ही परवाह।

वैसे भी यह विशेषाधिकार किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को आम आदमी से विशिष्ट नहीं बना देता, अपितु यह विशेषाधिकार संसद, उसकी समितियों के स्वतंत्र कार्य करने और प्रतिनिधियों को अपने विचार व्यक्त करने की व्यवस्था देता है।

विधानसभा या संसद में कही गई किसी बात को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके उलट जब मतदाता विधानसभाओं में बैठे अपने प्रतिनिधियों को ब्लू फिल्म देखते, लात घूंसे चलाते, माइक कुर्सी उखाड़ते, गाली गलौज करते देखते हैं, तब उन्हें नैसर्गिक विशेषाधिकार प्राप्त हो जाता है कि सार्वजनिक रूप से इनके आचरण व चरित्र के बारे में अपनी बात रखें।

उसी तरह संसद में जिस तरह माननीय गण महीनों-महीनों कार्रवाई ठप्प रखते हैं या कोई दस्तावेज फाड़ते हैं या नोटों के बंडल लहराते हैं, या फिर तहलका के स्टिंग आपरेशन में घूस लेते पकड़े जाते हैं, या सवाल पूछने के एवज में रुपये लेते हैं तो इनकी चर्चा करना किस विशेषाधिकार हनन की श्रेणी में आता है।

इन स्थितियों में ऐसे सांसदों को विचलित होने की जरूरत नहीं जो पाक-साफ हैं अपितु जनता के साथ खड़े होने की जरूरत है ताकि उनके बगल में बैठे भ्रष्ट और अपराधी लोगों को सबक मिले कि समूचा सदन उनके साथ नहीं है।

अब दो अहम सवाल उठते हैं। पहला पार्टियां इन्हें टिकट क्यों देती है, दूसरा, जनता इन्हें चुनती क्यों है? पहले का जवाब हाल ही में उत्तराखण्ड के लिए नियुक्त किए गए महामहिम राज्यपाल अजीज कुरैशी के आभार वक्तव्य से मिलता है। श्री कुरैशी ने राज्यपाल चयन के लिए गांधी-नेहरू परिवार के साथ वफादारी का पुरस्कार और सोनिया गांधी की कृपा बताया। एक संवैधानिक पद की योग्यता चाटुकारिता और वफादारी।

प्राय: सभी पार्टियां इसी आधार पर लोकसभा व विधानसभा की टिकटें बांटती हैं और तब ये नहीं देखतीं कि जिसे वे टिकट दे रही हैं वह फ्राड़, करप्ट और क्रिमिनल है। इसी रोग की शिकार सभी पार्टियां हैं और राजनीति का अपराधीकरण खतरनाक स्तर तक इसी प्रवृत्ति के चलते पहुंचा।

अब रहा सवाल जनता ऐसे लोगों को क्यों चुनती हैं, तो सहज जवाब है उसके सामने सिर्फ दो विकल्प हैं। सांपनाथ या नागनाथ। तीसरा विकल्प है कि वोट ही न दें। खुदा न खास्ता कभी किसी ईमानदार को चुन भी लिया तो इस बात की कोई गारंटी नहीं कि अगली बार वह नागनाथ-सांपनाथ की जमात में शामिल नहीं होगा।

और अब रही पते की बात, तो वह बकौल ‘ब्रेख्त’ हुजूर यदि आप इस जनता से नाखुश हैं तो आपको खुली छूट है कि अपने हिसाब से कोई दूसरी जनता चुन लें।