कम खराब चुनने का वक्त…

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राघवेंद्र सिंह

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव में मतदान के साथ ही लोकतंत्र के यज्ञ की पूर्णाहुति हो जाएगी। कौन जीतेगा, इसका नतीजा तो 11 दिसंबर को आएगा, तब तक बहुतों की नींदहराम हो जाएगी। कह सकते हैं कि इतने दिन धुक-धुकी लगी रहेगी। मतदाताओं के िलए पार्टी, प्रत्याशी और उनके समर्थकों की तरह बड़ा मुश्किल है विधायक चुनने का काम। लोकतंत्र में अब लुच्चे, लंपट, चोर और भ्रष्टाचारियों की बात करें तो डकैत भी शरमा जाएं। ये सब बातें ईमानदार, कर्मठ और भले मानुष नेताओं के लिए नहीं है। उनसे माफी के साथ। वोटर के लिए कल का दिन अधिकांश बहुत खराब और कम खराब में से किसी एक को चुनने का है। इसलिए भारी मतदान करें। मगर वोट देते वक्त प्रत्याशी ऐसे चुनें जैसे हम अपनी बेटी और बहन के लिए वर ढूंढते हैं।
इस पूरे मामले में एक कहानी याद आती है जो कभी ओशो यानी आचार्य रजनीश ने कभी अपने प्रवचन में सुनाई थी। जिसमें उन्होंने कहा था कि राजनीति डकैती है दिनदहाड़े। िजनको लूटो, वो भी समझते हैं कि उनकी सेवा की जा रही है। बड़ी अद्भुत डकैती है। डाकू भी इससे मात खा गए। वह भी पिछड़ गए। आउट ऑफ डेट हो गए। इसलिए तो बेचारे डाकू समर्पण करने लगे। इसमें क्या सार है ? चुनाव लड़ेंगे उसमें ज्यादा सार है। डाकुओं को समझ है कि मारे-मारे फिरो जंगल-जंगल हथेली पर जान लिए और हाथ क्या खाक लगता है। हमेशा जीवन खतरे में। इससे राजनीति बेहतर डकैती की आधुनिक व्यवस्था है, क्रिया है। एक मिनिस्टर जनसंपर्क दौरे पर बाहर निकले। मंजिल तक पहुंचने से पहले डाकुओं द्वारा पकड़े गए। रस्सियों से जकड़े गए। कार से उतारकर पेश किए गए सामने सरकार के। बुरी तरह हांफ रहे थे मारे डरके कांप रहे थे। तभी बोल उठा सरदार डरो मत यार। हम तो एक हैं। दोनों के इरादे नेक हैं। दोनों को जनता ने बनाया है मुझे नोट देकर तुम्हें वोट देकर। तुम्हारे हाथ सत्ता है हमारे हाथ बंदूक। दोनों के निशाने अचूक। हम बच रहे हैं अड्डे बदलकर और तुम दल बदलकर। दोनों ही एक-दूसरे के प्रचंड फ्रेंड। जनता को लूटने में दोनों ट्रैंड्स। या यूं कह लो सगे भइया रास्ते दोनों के अलग लक्ष्य रुपैया। दोनों के साथ पुलिस हमारे पीछे तुम्हारे आगे। यहां आए हो तो एक काम कर जाओ अपनों के बीच आराम कर जाओ। बैंक लूटने के उपलक्ष्य में हमारे पक्ष में आज की रात ठीक 8 बजे तुम्हारा भाषण और तुम्हारे हाथों नए अड्डे का कल उद्घाटन। यह बात वर्षों पुरानी है लेकिन आज के दौर में भी सटीक सी लगती है।
ऐसा कम ही होता है कि चुनाव में लड़ने वाले सब घबराहट में हों। इस बार के चुनाव इतने कांटाजोड़ हैं कि चाहे कोई जीते या हारे ब्लडप्रेशर सबका बढ़ा हुआ है। भाजपा का दावा है कि कुछ भी हो सरकार बनाने के लिए 130 से अधिक विधायक जीत रहे हैं और कांग्रेस का कहना है कि यह वक्त है बदलाव का। सरकार में हमीं आ रहे हैं। पुनः भले नेताओं से क्षमा-याचना के साथ। फिलहाल तो मतदाता और लोकतंत्र की जय-जय…
फोटो प्रतीकात्मक है