16 नवम्बर प्रेस दिवस पर विशेष= प्रेस का कुशल मंगल आखिर किसके लिए..!

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जयराम शुक्ल

संविधान के प्रावधानों से इतर लोकमानस में चौथे स्तंभ के तौरपर स्थापित प्रेस आज भी अन्य स्तंभों से ज्यादा विश्वसनीय, सहज और सुलभ है। समस्याओं से घिरा आम आदमी सबसे पहले अखबार के दफ्तर में जाकर फरियाद करता है। थाने, दफ्तरों और भी सरकरी गैर सरकारी जगहों में जब वह दुरदुराया जाता है तो उसका आखिरी ठिकाना भी प्रेस का ही दफ्तर होता है।

यह छपे हुए शब्दों की ताकत है जो प्रेस को तमाम लानतों मलानतों के बावजूद प्रभावी बनाए हुए है। धारणाओं की प्रतिष्ठा लोकमानस के जरिये होती है। जैसे प्रेस का मतलब आज भी अखबार और पत्रिकाएं हैं, न कि टीवी चैनल और बेव पोर्टल। इसलिए प्रेस के समानांतर मीडिया के नाम को चलाने के जतन शुरू हुए लेकिन प्रेस शब्द का रसूख कायम है।

इस ‘प्रेस’ शब्द को अभी भी ऐसा उच्च सम्मान प्राप्त है कि अपराधी भी प्रायः इसे ढाल की तरह इस्तेमाल करने लगते हैं। कमाल की बात है कि जिस ‘प्रेस’ शब्द को भारतीय संविधान ने भी अपने पन्नों में भी जगह नहीं दी उसे लोकमानस ने आगे बढ़कर सिरोधार्य किया।

यह प्रेस पर पाठकों की अहौतुकी कृपा है, ये इज्जत, सोहरत, ताकत लोक की वजह से है, सरकार की वजह से नहीं यह बात अच्छे से समझ लेना चाहिए।

छपे हुए शब्द आज भी सबसे ज्यादा विश्वसनीय और खरे हैं। हाल ही की एक सर्वे रिपोर्ट बताती है कि पाठकों का भरोसा मुद्रित माध्यमों के प्रति और बढा है।

देश में टेलीविजन का विस्तार 1982 से प्रारंभ हुआ। 1990 के बाद निजी क्षेत्र के चैनल आए। खबरों की गलाकाट स्पर्धा शुरू हुई। विदेशी चैनलों के लिए भी दरवाजे खोल दिए गए। इस जनसंचार क्रांति से ऐसा लगा कि अखबार और पत्रिकाओं का भट्ठा बैठ जाएगा। कुछ शुरुआती असर दिखा भी लेकिन लोकमानस में चैनल्स खबरों को लेकर अपनी छाप नहीं छोड़ पाए, जबकि ये ऐसे माध्यम हैं कि खबरेंं जीवंत दिखती हैं।

प्रयः सर्वे बताते हैं कि चैनल्स अखबारों के हित में ही रहे। इन्होंने खबरों की भूख बढ़ाने का काम किया, अखबार और भी गंभीरता से पढ़े जाने लगे। प्रसार के हर साल जारी होने वाले आँकड़े बताते हैं कि अखबारों के प्रसार का दायरा दिनोदिन बढ़ा ही है।

अब आते हैं प्रेस की स्थिति पर। प्रेस की इस महत्ता ने हर क्षेत्र के व्यवसाइयों को अपनी ओर खींचा है। बिल्डर, चिटफंडिये, खदानों और शराब का ठेका चलाने वाले, राजनीति में रसूख जमाने की लालसा रखने वाले नवकुबेर, सभी प्रेस पर मोहित हुए या यूँ कहिए प्रेस ने सभी को लुभाया।

एक बड़े व्यापारी ने सच्चा किस्सा बताया- मैं एक हजार कऱोड़ के टर्नओवर वाला व्यापारी किसी काम से मंत्रालय गया पीएस से मिलने। चार घंटे बैठे रहने के बाद भी मेरा नंबर नहीं आया, जबकि विधिवत् अपाइंटमेंट ले रखा था। कुछ लोग आते सीधे चैम्बर में घुस जाते। मैंने पूछा ये कौन लोग हैं? चपरासी ने बताया कि ये प्रेस वाले हैं।

तभी मेरे दिमाग में आया कि क्यों न हम भी अखबार शुरू कर दें। उक्त व्यवसायी ने एक दैनिक शुरू कर दिया। अच्छे पत्रकारों को नौकरी में रखा। फिर हुआ यह कि जो कभी चार घंटे पीएस का इंतजार करते बैठा करता था उसके ही दफ्तर उस पीएस के मंत्री और यहां तक कि मुख्यमंत्री भी आने लगे।

इनके लिए अखबार व्यवसाय का कवच और विजिटिंग कार्ड बन गया। यहीं से एक मुगालता और शुरू हुआ कि ऐसे व्ववसायी जो अखबार के मालिक बन गए, ने सोचा क्यों न अखबार के दम पर उल्टीसीधी फाइलें भी ओके करवा ली जाएं, यानी कि अखबार को अपराधियों के कट्टे की तरह इस्तेमाल करने की कोशिशें होने लगीं।

प्रेस को जब आप ‘प्रास’ बनाएंगे तो प्रेस की आत्मा वहीं शरीर छोड़कर भाग जाएगी।

एक मित्र गिनती लगाकर बता रहे थे कि कोई दो दर्जन से ज्यादा ऐसे अखबार और चैनलों के मालिक हैं जो जेल की हवा खा रहे हैं। कईयों के यहां ऐसे छापे पड़े कि वे अबतक सँभल नहीं पा रहे हैं।

कहने का आशय यह कि प्रेस को पेशेवराना अंदाज से ही चलाया जा सकता है इसलिये मीडिया के पुराने घराने ही इस मैंदान में कायम हैं। ये वो हर तिकड़म जानते हैं कि कैसे उनका रसूख भी कायम रहे और मीड़िया का धंधा भी चलता रहे।

1966 में प्रेस कौंसिल आफ इंडिया के गठन के बाद अखबारों में काम करने वालों के हित में कई वेजबोर्ड बने। तीस साल से बछावत, बेजबरुआ और मजीठिया का नाम सुन रहे हैं, शायद ही किसी मीड़िया घराने ने ईमानदारी से इनकी सिफारिशें लागू की हों।

ये सभी बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के माननीय जजों की अध्यक्षता में बने। इन दिनों मजीठिया की सिफारिशों को लागू करने पर जोर है। प्रायः सभी बड़े मीडिया समूहों ने इसका रास्ता निकाल लिया। अपनी ही आउटसोर्स कंपनियां बना लीं और पत्रकारों को नौकरी छोड़ने या आउटसोर्स कंपनी में काम करने का विकल्प रखा। मजबूरी में पत्रकार ने इसे स्वीकार कर लिया।

पिछले साल ही दिल्ली के एक बड़े मीडिया समूह से निकाले गए एक पत्रकार की कनाटप्लेस बाराखंबा रोड़ पर लावारिस मौत सुनकर दहल गया। वह न्याय को लेकर लड़ाई लड़ रहा था। व्यवस्था ने साथ नहीं दिया। आज की तारीख में सबसे कच्ची नौकरी पत्रकारों की है। वे कल किस वक्त निकाल बाहर कर दिए जाएं इसका पता नहीं।

अखबारों में दूसरों के शोषण की बात करने वाला खुद कितना शोषित है कि इसका जिक्र तक नहीं कर सकता। बड़े अखबारों में इस बात की घोषित मनाही है कि वह पत्रकारों की यूनियन से नहीं जुड़ेगा।

पत्रकारों की यूनियनें बँटी हुई हैं। श्रम कानूनों को सरकारों ने ही बधिया बनाके रखा है। सो पत्रकार जो दुनिया की नजरों में बड़ा क्रांतिकारी है, घुट घुटकर मरता है।

आँचलिक पत्रकारिता की तो और दुर्गति है। पहले अखबार मालिक उन्हें उतनी ही गंभीरता से लेते थे जैसे बस मालिक अपने.कंडक्टर को। अब तो स्थित यह है कि मामूली से वेतन और विग्यापन के भारी टारगेट के आधार पर ब्यूरो खोले जाते हैं और जो बैठता है खुद को चीफ कहवा कर ही साँत्वना दे लेता है। इस प्रक्रिया में अपराधियों का तबीयत से पत्रकारीकरण हो गया है। चैनल्स के क्षेत्रीय संवाददाताओं की स्थिति तो और भी गई गुजरी है।

इनके हितों की रक्षा कौन करे.? प्रेस कौंसिल…! प्रेस कौंसिल को 1966 में प्रेस के हितों की रक्षा व उन्हें मर्यादित करने के लिए गठित किया गया था। चूँकि 16 नवंबर से उसने काम करना शुरू किया था। इसलिए इस दिन को राष्ट्रीय प्रेस दिवस घोषित कर दिया। इसके अध्यक्ष अमूमन सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज होते हैं।

इस संस्था को प्रेस का .वाँचडाग.. कहा जाता है। लेकिन इस ‘वाँचडाग’ की नजरों के सामने ही वह पत्रकार न्याय माँँगते हुए बाराखंभा रोड के फुटपाथ में मर गया।

यह संस्था पीसीआई कुछ नहीं कर पाई। वह इसलिए कि जिस तरह के अधिकार बार कौंसिल, मेडिकल कौंसिल, टेक्निकल कौंसिल को मिले हैं वैसे अधिकार प्रेस कौंसिल के पास नहीं है। प्रेस कौंसिल यह भी तय नहीं कर सकता कि किसे पत्रकार कहा जाए किसे नहीं। जबकि बार या मेडिकल कौंसिल का सर्टिफिकेट ही किसी के वकील या डाक्टर होने का आधार होता है जिसे वे निरस्त भी कर सकते हैं।

प्रेस कौंसिल ऐसा नखदंत विहीन वाँचडाग है जो सिर्फ भोंक सकता है काट नहीं..। अखबार मालिकों पर ऐसे भोंकने वालों का कभी असर नहीं पड़ा।

हमारे संविधान निर्माताओं ने प्रेस के साथ ज्यादती की है। प्रेस को अभिव्यक्ति का उतना ही अधिकार है जितना कि एक आम नागरिक का। इस तरह हर व्यक्ति पत्रकार है जो अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल करता है। पत्रकार कोई संवैधानिक शब्द नहीं है।

अमेरिका, यूरोप में ऐसी स्थिति नहीं है। वहां प्रेस संविधान के अनुच्छेद में है और उसकी स्वतंत्राता को चुनौती नहीं दी जा सकती।

अमेरिकी पत्रकार सैमूरहर्ष ने मोरारजी को सीआईए का एजेंट लिखा। मोरारजी ने इसपर मुकदमा कायम किया। अमेरिकी अदालत ने बर्डन आफ प्रूफ का जिम्मा मोरारजी पर छोड़ दिया। सरकार इंदिरा जी की थी। मोरारजी को सरकार ने ऐसे दस्तावेज नहीं उपलब्ध कराए कि वे खुद को निर्दोष साबित कर सकें। सैमूरहर्ष जानते थे कि मोरारजी पर दोष नहीं निकलेगा। फिर भी मोरारजी कुछ नहीं कर पाए।यह कलंक लिए हुए ही मरे।

हमारे यहां इसकी उलट स्थिति है। क्योंकि पत्रकार की औकात सामान्य नागरिक से ज्यादा कुछ भी नहीं। पत्रकार पर मुकदमा लगता है तो उसे साबित करना होता है कि जो हमने लिखा वो ठीक लिखा। सो प्रेस की आजादी और सुरक्षा की बात करनी है तो संविधान संशोधन कर प्रेस को संविधान के दायरे में लाया जाए। उसका अलग अनुच्छेद बने। और लिखा जाए की प्रेस की स्वतंत्रता को चुनौती नहीं दी जा सकती। वकील,डाक्टर की तरह पत्रकार की न्यूनतम योग्यता तय की जाए। तभी हम भविष्य के प्रेस का कुशल मंगल देख सकते हैं। वरना कितने भी कानून आएं, आयोग और बोर्ड बनें, हर साल राष्ट्रीय प्रेस दिवस मनाएं कुछ होना जाना नहीं है।

संपर्कः। 8225812813