अंग्रेज़ों के एजेण्डे पर मीडिया का एक तबक़ा….?

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ज़हीर अंसारी
जो काम गोरे अंग्रेज़ अधूरा छोड़ गए थे, लगता है उसे काले अंग्रेज़ पूरा करके ही दम लेंगे। इंडियन मीडिया की अंग्रेज़ी पढ़ी-लिखी जमात का एक बड़ा तबक़ा अंग्रेज़ों की विरासत को आगे बढ़ा रहा है। फूट डालो और धर्म-जातियों को लड़ाओ। उनके बीच वैमनस्यता फैलाओ। जैसे इस बड़े तबके ने अंग्रेज़ों के अधूरे काम को पूरा करने
सुपारी ले ली है। जिस तरह की ख़बरें और डिबेट आजकल परसी जा रही है उससे तो यही सही प्रतीत होता है। गोरे ने तो धर्म के बीच फूट डालो राज करो की नीति अपनाई थी। कुछ वर्षों तक वो अपनी इस रणनीति में कामयाब रहे मगर एक समय के बाद दोनों समुदायों के लोगों ने मिलकर उन्हें खदेड़ दिया और मुल्क को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद करा लिया। उस वक़्त का मीडिया पूरी तरह से निष्पक्ष और समन्वयवादी था। अपने देश को स्वतंत्र कराने वाले आंदोलनकारियों को पूर्ण समर्थन दिया। अपना सर्वस्व न्योछावर किया, कई अख़बार मालिक, सम्पादक और पत्रकारों को अंग्रेज़ी हुकूमत की यातनाएँ भी झेलनी पड़ी। आज़ादी के बाद उस दौर के पत्रकारों ने देश निर्माण के लिए जी-जान लगा दिया। देश की एकता और अखंडता बरक़रार रखने पुरज़ोर हिकमत लगाई। जबकि बँटवारे के बाद मुल्क के हालात बहुत ही नाज़ुक थे।

वक़्त बदला, इक्कीसवीं सदी आई। अख़बारनवीसी व्यवसायिक बन गई। राष्ट्रीयता, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रीय एकता साम्प्रदायिक सौहार्द को ताक में रख दिया गया। धनलोलुप्ता की चाशनी मीठी लगने लगी। चाशनी की चाह में मीडिया के एक बड़े वर्ग ने अपनी अस्मिता गिरवी रख दी। उस दौर में धार्मिक मतभिन्नता को भी सामंजस्य और संतुलन के साथ पेश किया जाता था मगर अब छोटे-छोटे मुद्दे और विवादों को ऐसा पेश किया जाता है जैसे इन मुद्दों का मुल्क के रहवासियों से कोई ताल्लुक़ न हो। बेफ़िज़ूल की मीडिया डिबेट का कोई नतीजा नहीं निकलता, अलबत्ता मानसिक और आपसी तनाव ज़रूर बढ़ जाता है।

सन 2008 में जब देश आर्थिक मंदी आई थी तो इलेक्ट्रानिक मीडिया ने ख़र्च में कटौती का मार्ग खोजा। देश-दुनिया की ख़बर एकत्रित करने में ख़र्च होने वाली राशि को न्यूनतम करने डिबेट का सिलसिला शुरू किया। डिबेट के शुरुआती दौर में राष्ट्रीय, विकासीकरण और राष्ट्र निर्माण के मुद्दे हुआ करते थे। देश के उम्दा से उम्दा चिंतक, विचारक, राजनेता, अर्थशास्त्री और दीगर प्रबुद्धजन भाग लेते थे। अब इसके उलट सब चल रहा है। घटिया और अर्थहीन मुद्दों पर बहस कराई जा रही है। बहस में शामिल होने वालों की भाषा शैली से ही उनकी बौद्धिक क्षमता का आकलन होता जाता है। डिबेट में चीख़ना-चिल्लाना, बेवजह के तर्क देना, आम बात हो गई है। गंदी गलियाँ और मारपीट छोड़कर सब देखने-सुनने मिल जाता है।

टीवी चैनल्स जिस तरह के मुद्दों पर बहस करा रहे हैं या प्रिंट मीडिया इसे प्रकाशित कर रहे हैं उससे क्या देश और नागरिकों का भला होने वाला है, बिलकुल नहीं। अब हालात ये बन पड़े हैं कि अधिकांश दर्शकों ने डिबेट देखना छोड़ दिया है, ख़ासकर महिलाओं ने। अब इन्हें इन डिबेट्स में सार नज़र नहीं आता। दर्शकों के बड़े वर्ग का मानना हैं कि ऐसी डिबेट्स में शिक्षा, स्वस्थ्य, स्वच्छता, अर्थव्यवस्था और रोज़गार जैसे मुद्दों पर बहस कराई जानी चाहिए। इन विषयों के एक्स्पर्ट्स को बिठाया जाना चाहिए न की एकांगी सोच के व्यक्ति को।

बहरहाल इस वक़्त मीडिया का रवैया देश को जोड़ने वाला न होकर सनसनी और वैमनस्यता पैदा करने वाला हो गया। जो कहीं न कहीं राष्ट्र की एकता और समन्वय के लिए घातक है।