धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के पैरोकार मौन क्यों…….?

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ज़हीर अंसारी

साठ के दशक में प्रदीप जी ने एक गीत लिखा था और गाया भी था। गीत के बोल थे ‘ देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कि कितना बदल गया है इंसान।

वाक़ई इंसान बदल गया है। देश की सरकार बदल गई। सिस्टम बदल गया है और राष्ट्रवादी लोग बदल गए हैं। ये सब ऐसे बदले कि अब इन्हें कुछ दिखाई-सुनाई नहीं पड़ रहा है। अंध-मूक-बधिर सी स्थिति निर्मित हो गई है। देश की संस्कृति, कला, व्यापार और सामाजिक ताना-बाना बिगड़ रहा फिर भी सब ख़ामोश हैं। किसी के बोल नहीं फूट रहे हैं। विदेशों में निर्मित सामग्रियाँ भारतीय बाज़ार में बिकने की बात पुरानी हो गई अब तो विदेशी धंधेबाज़ हमारे घरों में घुस रहे हैं। हमारी संस्कृति और कला पर आक्रमण कर रहे हैं। हमारे पूजन स्थल तक इनकी पहुँच हो गई है, फिर भी जागरुक और कथित राष्ट्रवादी मौन हैं। पता नहीं इन लोगों ने किस वैद्य की पुड़िया खा ली है जिससे इनकी बोलती बंद हो गई है।

निर्माण से लेकर विलासिता की वस्तुओं पर चायना निर्मित प्रोडक्ट्स हावी है। टिमटिम करती झालर से लेकर बड़ी-बड़ी मशीनों तक, एलेक्टरोनिक्स तथा एलेक्ट्रिकल्स आइटम, स्मार्ट फोन्स और रोज़मर्रा की दीगर चीज़ों तक मेड इन चायना का ठप्पा वाला माल भारतीय बाज़ार में धढल्ले से उपलब्ध है। अभी तक चायना निर्मित मूर्तियाँ बिका करती थीं अब तो रेडीमेड रंगोली भी आने लगी है। भारतीय परंपरा के अनुसार घर और पूजन स्थलों पर रंगोली बनाई जाती है। अधिकांशत: महिलायें रंगोली बनाया करती हैं। रंगोली बनाना एक प्राचीन स्वदेशी कला है जिसमें महिलाओं के भाव, विचार, कल्पना और कला की समझ मिलती थी, अब इसे भी नेस्तनाबूद करने का प्रयास प्रारंभ हो गया है। इस बार की दीवाली में कई घरों में चायना मेड रंगोली देखने मिली। चायना मेड रंगोली कई डिज़ाइन में हैं। पीस-पीस में आने वाली रंगोली को डिज़ाइन के हिसाब से ज़मीन पर जमा लीजिए, बस बन गई रंगोली। ये चमकदार और ख़ूबसूरत डिज़ाइन में आती हैं। बहुतेरे घरों में इस दीवाली में इस तरह की रंगोली देखी गई। ये देखने में तो सुंदर हैं मगर इनमें हमारी संस्कृति, बनाने वाली नारी के भाव, विचार, कल्पनाशीलता का अभाव स्पष्ट दिखता है। आयातित रंगोली देखने के बाद लगता है कि विदेशी अब हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा और कला पर सीधा प्रहार कर रहे हैं। फिर भी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के वाहक ख़ामोश हैं। यह ख़ामोशी अगर यूँ ही बरक़रार रही वो दिन दूर नहीं जब अंगूठे और उँगली के ज़रिए भरी जाने वाली रंगोली की कला विलोपित हो जाएगी।

ज़हीर अंसारी