गौर- सरताज बगावत कर दें तो..?

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राघवेंद्र सिंह

चुनाव का माहौल है, वफादारी और बगावत दोनों देखने में आ रही हैं। कांग्रेस बगावत के लिए भाजपा की तुलना में ज्यादा बदनाम रही है। लेकिन इस बार असंतोष का बुखार भाजपा में थर्मामीटर के आखिरी छोर को छूने की तरफ जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर और कभी होशंगाबाद लोकसभा सीट से अर्जुन सिंह को हराकर मशहूर हुए सरदार सरताज सिंह बागी भले ही न हुए हों, लेकिन टिकट कटने से ये दोनों दुखी जरूर हैं। कह सकते हैं कि ये दोनों दिग्गज वफादारी और बेवफाई की दहलीज पर खड़े हैं। अगर डैमेज कंट्रोल करने वालों ने नहीं रोका तो दो दिन बाद कोई चौंकाने वाली खबर भी आ सकती है। बगावत कांग्रेस में भी है, मगर आत्मघाती कम छुट-पुट ज्यादा है। मसलन, भोपाल में आरिफ मसूद को उम्मीदवार बनाने के खिलाफ जरूर विरोध के स्वर पीसीसी में चुभने वाले लगे।
हम बात कर रहे हैं अनुशासित और बड़ों को इज्जत देने वाली और छोटों से प्यार करने वाली भाजपा की। इन दिनों ये दोनों ही बातें भाजपा में थोड़ी कम नजर आ रही हैं। इसलिए जिस नेता को मजदूर से मुख्यमंत्री बनाया था वे बाबूलाल गौर पहले तो बेआबरू होकर शिवराज मंत्रिमंडल से रुखसत किए गए और अब अपनी अजेय सीट गोविंदपुरा से टिकट पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भोपाल यात्रा के दौरान मंच पर उनसे कह गए हैं ‘एक बार और बाबूलाल गौर’ तो फिर उनके टिकट को लेकर क्यों उलझाया जा रहा है। गौर ऐसे शख्स हैं जिनका टिकट 2003 में भी अटक गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और सुषमा स्वराज की सिफारिश पर आखिरी सूची में नाम भी जुड़ा और बाद में वो मुख्यमंत्री भी बने। श्री गौर अभी भी 2003 के भंवर में फंस गए हैं। इस बार पता नहीं टिकट मिलता है या नहीं। क्योंकि इस बार उनके समर्थन में खड़े होने वाले न तो अटलजी हैं और न सुषमा स्वराज की सुनने वाला वैसा नेतृत्व है।
सरताज सिंह और गौर की उम्र को लेकर टिकट काटने की बात की जा रही है। इन दोनोें नेताओं पर कांग्रेस काम कर रही है। अगर कांग्रेस सफल होती है तो सिवनीमालवा के अलावा इटारसी, होशंगाबाद से मैदान में उतारती है तो भाजपा दिक्कत में आ सकती है। इसी तरह गौर को भी कांग्रेस ने समझा लिया तो भाजपा से नाराज होने वाले ये दो बड़े नाम माहौल बिगाड़ने में बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं। इस बार अभी तक की परिस्थितियों में राजनीति के सारे गणितज्ञ कांटे का मुकाबला मान रहे हैं। ये दोनों नेता पता चल जाएगा कि िदवाली बाद किस करवट बैठने वाले हैं।
भाजपा में अब दिक्कत यह हो गई है कि कल तक जो मैनेजमेंट के जरिए डैमेज कंट्रोल करते थे वह खुद ही असंतुष्टों की सूची में हैं। अब मालवा क्षेत्र को ही देख लें, सुमित्रा महाजन लोकसभा की अध्यक्ष हैं, वह टिकट वितरण को लेकर नेतृत्व से असहमत हैं। हालत यह हो गई कि उन्हें मनाने के लिए केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर और प्रदेश प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे को इंदौर जाना पड़ा। इसी तरह प्रदेश की राजनीति में स्टार लीडरों में शामिल कैलाश विजयवर्गीय अपनी बात मनवाने के लिए हाईकमान से आग्रह कर रहे हैं। इस चक्कर में इंदौर के साथ पूरे मालवा में भाजपा का ग्राफ ऊपर तो नहीं जा रहा है। किसान आंदोलन की वजह से भाजपा पहले ही यहां बैकफुट पर है। भाजपा में अनाड़ीपन तो नहीं कहेंगे लेकिन स्टार प्रचारकों की सूची में कुछ ऐसे नाम भी जोड़े गए हैं जो चुनावी प्रचार के मामले में तो क्या कार्यकर्ताओं के बीच भी लोकप्रिय हैं या नहीं, इस पर पार्टी में ही सवाल पूछे जाते हैं। अब स्टार प्रचारकों में राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल, प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे, सुहास भगत, अतुल राय,वीडी शर्मा शामिल हैं। अब यह भाजपा की चतुराई है या अनाड़ीपन। भाजपा की रणनीतियों को लेकर कई बार पार्टी में भी खूब हास-परिहास होते हैं।