इस बार मच्छर काटेगा नेताओं को …..

0
56

ज़हीर अंसारी

ये बात भी बड़ी अजीब लगती है कि जब पूरा जबलपुर शहर मच्छरों के हमले से हलाकान और परेशान है तब नेतागण टिकिट की घुड़दौड़ में मस्त हैं। कोई दिल्ली तो कोई भोपाल के राजनीतिक गलियारों में अपने नेताओं के पोस्टरों की चरण वंदना करते फिर रहे हैं। लंबलेट होकर ‘मुझे टिकिट दे दो’ की गुहार लगा हैं।

इधर लगभग समूचा शहर मच्छर जनित रोगों से हलाकान और परेशान है। हर घर में एक-दो बीमार हो चुके या हैं। सरकारी अस्पताल की छोड़िए निजी अस्पताल मरीज़ों से भरे पड़े हैं। हालत ये है कि मरीज़ों को वापस लौटाया जा रहा है। एक बुखार एक मरीज़ को पाँच हज़ार रुपए का पड़ रहा है। अगर मरीज़ निजी अस्पताल में भर्ती हुआ तो पच्चीस से पचास हज़ार रुपए से निपट ही जाता है। कई परिवार ऐसे हैं जहाँ दो-तीन सदस्य वायरल का शिकार हुए। सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन पर कितना आर्थिक बोझ पड़ा होगा। डेंगू और चिकिनगुनिया की जाँच धड़ाधड़ करवाई जा रही है। एक जाँच के हज़ार-डेढ़ हज़ार रुपए लग रहे हैं। जाँच की लाखों किट खप चुकी है। जाँच किट बनाने वाली कम्पनियाँ मालामाल हो गई। निजी अस्पताल भले पैसा ले रहे हैं मगर लोगों की जान बचा रहे हैं। ग़रीब और अति ग़रीब सरकारी अस्पतालों के फ़र्श पर इलाज कराने मजबूर है। सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाएँ किसी से छिपी नहीं है।

हालत इतनी विकट बन गई कि शहर के किसी भी ब्लड बैंक में प्लेट्लेट्स नहीं है। निजी ब्लड बैंक वाले इसके लिए दस-बारह हज़ार रुपए वसूल रहे हैं। दवा, जाँच, डाक्टर, अस्पताल और तीमारदारी से लोगों की समृद्धि को पलीता लग चुका है। छोटे-छोटे नौनिहालों की मौत हो रही है। अब तक सौ से ज़्यादा मरीज़ों की मौत डेंगू, चिकिनगुनिया से हो चुकी है। स्वाइनफ़्लू से भी आधा दर्जन मौतों की ख़बर है। कई लोग जीबीएस जैसी ख़तरनाक बीमारी की चपेट में आ गए। यह बीमारी जिसको लग गई तो समझो दासियों लाख रुपए ख़र्च करने के बाद भी जीवन की गारंटी नहीं है।

इस सबके बावजूद जनता के नुमाइंदों के मुँह में मौजूद जिह्वा लकवाग्रस्त पड़ी है। किसी भी बड़े नेता या जनप्रतिनिधि ने न तो ज़िला व स्थानीय प्रशासन के साथ कोई मीटिंग की और न ही जनता के दुःख-दर्द को जानने उनके द्वार गए। ग़रीब से लेकर अमीर तक रहनुमाओं की इस बेदिली पर बौखलाया हुआ है।

शहर के वर्तमान हालात देखकर लगता है कि सियासतदानों ने जनता को बंधुआ वोटर समझ लिया। नेतागण अगले हफ़्ते से घर-घर जाएँगे और वोट माँगेंगे। सत्ता बचाने और पाने की लालसा वाले सभी उम्मीदवार और कार्यकर्ता नाक रगड़ेंगे। अब देखना यह है जनता का चित्त किस करवट बैठता है। वैसे मच्छरों ने घर-घर ख़ूब प्रचार-प्रसार कर दिया है।

फ़ुर्सत है किसको रोने की दौर-ए-बहार में
मोती पिरो रहा हूँ गिरेबाँ के तार में