मप्र भाजपा: प्रथम ग्रासे मक्षिका पात

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राघवेंद्र सिंह

मध्यप्रदेश भाजपा में इन दिनों जो चल रहा है उसे फिल्म वो सात दिन के गाने की लाइन से समझेंगे तो आसानी होगी… अनाड़ी का खेलना और खेल का सत्यानाश.. यह गाना अनिल कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरी पर फिल्माया गया था। मध्यप्रदेश भाजपा में अनिल कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरी कौन है, हमें नहीं पता, लेकिन 6 महीने पहले अप्रैल में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह के पदभार ग्रहण करने के दूसरे दिन की एक घटना भी प्रथम ग्रासे मक्षिका पात-को समझने में आसान होगी। दरअसल, अक्षय तृतीया के दूसरे दिन प्रदेश कार्यालय में नवागत अध्यक्ष राकेश सिंह प्रेस से मुखातिब थे। वह बार-बार जिक्र कर रहे थे कि दो दिन में आपसे 9 बार मुलाकात हो गई है। ऐसे में एक पत्रकार ने कहा कि मिले हैं तो आप टीवी और अखबार में दिखे भी तो हैं। दरअसल, वह खबरनवीस अध्यक्ष महोदय के पत्रकारों के प्रति सह्दयता का जवाब दे रहे थे। इस पर राकेशजी इशारा करते हुए कहते हैं कि दिखेंगे तो तब जब कुछ मिलेगा। इसके बाद मामला खूब गर्म हुआ और मीडिया में उछला भी। इस प्रकरण को प्रेस के बारे में अध्यक्ष का सोच कितना गहरा उथला है, लोगों ने इस नजरिये भी देखा। 27 अक्टूबर 2018 को भाजपा में तर्क शास्त्र के उस्ताद माने जाने वाले राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस प्रदेश भाजपा के कच्चेपन की वजह से मटियामेट हो गई। समय से पूर्व सड़क पर पत्रकार वार्ता के कारण भाजपा के नौकरशाह रहे पदाधिकारी पर मुकदमा दर्ज हो गया। अध्यक्ष के नाते राकेश सिंह की प्रेस वार्ता और प्रवक्ता के रूप में संबित पात्रा की पत्रकार वार्ता ने साबित किया है कि गलतियों से कुछ सीखा नहीं जा रहा है। मुगालते और अहंकार के साथ हम सब जानते हैं कि चुनाव की शुरुआत में ही गुड़-गोबर हो रहा है। पात्रा की प्रेस कॉन्फ्रेंस का मामला दूर तक जाने वाला है। इसमें प्रेस वार्ता की अनुमति दोपहर 1.30 बजे की थी और शुरू हो गई वो 12.30 बजे ही। चूंकि इसका सीधा प्रसारण हुआ है और मुख्य चुनाव आयुक्त दिल्ली से शिकायत की गई है, इसलिए आने वाले दिनों में आयोग ऑब्जर्वर को भेजकर उसकी रिपोर्ट के आधार पर कोई बड़ी कार्रवाई भी कर सकता है। यहां पेंच प्रेस कॉन्फ्रेंस की अनुमति को लेकर भी फंसा हुआ है। पत्रकार वार्ता के दौरान जितने लोग मंच पर थे वह भी मुकदमे की जद में आ सकते हैं। खैर इस मुद्दे पर अभी तेल और तेल की धार देखना बाकी है। इस लापरवाही पर प्रदेश भाजपा की तरफ से किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हुई है। मतलब अभी और गलतियों का रास्ता खुला रखा गया है।
मध्यप्रदेश भाजपा की दुर्गति कोई एक दिन में नहीं हुई है। कभी भाजपा के नेता संगठन शास्त्र के ज्ञाता हुआ करते थे और दूसरे राज्यों में संगठन बनाने से लेकर चुनाव लड़ाने तक की योजनाओं में सहभागिता करते थे। अब हालत यह है कि पहले नए और कमजोर अध्यक्ष मिले, शांत और सीधे संगठन महामंत्री मिले और इसके साथ ही लंबे समय से प्रभारी के रूप में विनय सहस्रबुद्धे मिले। इन्हें पार्टटाइम प्रभारी भी कहा जाता है। उनकी रुचि संगठन को मजबूत करने में कम रही है, यह सबको पता है। बावजूद इसके कोई नया फुलटाइम प्रभारी हाईकमान ने नहीं दिया। सत्ता के चलते जो दुर्गुण आए उनके इलाज के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं िकए गए। अब चुनाव के वक्त केंद्रीय मंित्रयों में जिन्हें जिम्मा सौंपा है वह भाजपा कार्यकर्ताओं को जानना तो दूर की बात, न तो ठीक से प्रदेश के पदाधिकारियों को जानते हैं और न यहां के लोगों की तासीर और न राज्य का भूगोल। ऐसे अनाड़ीपन से तो भाजपा की दृष्टि से इस अच्छे भले राज्य में संगठन का खेल खराब ही होगा। पूर्व के चुनाव में कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, गौरीशंकर शेजवार आदि के साथ वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा आदि चुनाव आने के साल दो साल पहले से ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे। अब नए लोग हैं, नई योजनाएं, लेकिन अमल करने की कोई टीम पुख्ता नहीं है। कह सकते हैं कि जो सफलताएं दिखती थीं उसके पीछे समर्पित और कर्मठ कार्यकर्ताओं की टीम रहा करती थी जो गलतियां होने से पहले ही उसे सुधार लेती थी। अब मंच पर बैठने वाले, फोटो खिंचाने वाले लोग ज्यादा हैं। इसलिए भाजपा की रसोई बिगड़ रही है। इस पर मशहूर शायर दुष्यंत कुमार का एक शेर सटीक लगता है… ‘अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, यहां के कमल कुम्हलाने लगे हैं।’
भाजपा में टिकट तय करने की मैराथन कवायद प्रदेश कार्यालय में रविवार से शुरू हो गई है। इसमें सही लोगों को टिकट मिला तो ठीक नहीं तो बगावत के स्वर इतने तीखे होने की आशंका है कि उससे भाजपा दफ्तर की खिड़कियां हिलने और कांच टूट भी सकते हैं। इसके लिए डैमेज कंट्रोल करने की कोई ताकतवर टीम की जरूरत पार्टी को बहुत जल्द महसूस होगी। पूरे सीन पर दुष्यंत साहब का ये शेर बड़ा मौजूं है… दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए..
सूबे के समूची भाजपा के सियासी सीन पर मशहूर शायर दुष्यंत कुमार की ये ग़ज़ल खासी मौजू है-
कहीं पे धूप…
कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए।
जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा
बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए ।
खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को
सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए।
दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों
तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए।
लहू लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए।
ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है