कलफ पीने वालों से मुश्किल में पार्टी…

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राघवेंद्र सिंह

अक्सर कलफ कपड़ों को कड़क करने के लिए लगाया जाता है। पुराने जमाने के लोग चाहे वो सियासत में हों या आम जिंदगी में, इस बात को अच्छे से जानते हैं। कभी पुलिस में कॉटन की वर्दी का रिवाज था और उस पर सिपाही से कप्तान तक कलफ लगी वर्दी पहनते थे। स्कूल-कॉलेज में एनसीसी के कैडेट्स भी वर्दी के लिए चावल का माढ़ वाला कलफ तैयार करते थे। कुल मिलाकर यह सब रौब के साथ स्मार्ट दिखने के लिए भी काम आता था। धीरे-धीरे राजनीति में बड़े नेताओं के बाद अब छुटभैये भी कलफ वाले कुर्ते-पजामे पहनना मैंटेन करने लगे हैं। राजनीति में कलफ के वैसे तो कई मायने हैं, लेकिन अब बहुत से नेता कपड़ों पर तो ठीक कलफ पीकर निकलने लगे हैं और यहीं से शुरू होती है सियासत में उनकी अकड़ की कहानी, जो चुनाव के समय उन्हें तो ठीक, पार्टी के लिए बड़ी कीमत चुकाने वाली होती है।
मध्यप्रदेश में ऐसे नेता भी हैं, जो राजनीति में तो शिखर पर हैं, लेिकन कपड़ों में कलफ की बजाय बड़े साधारण और सामान्य हैं। सत्तारूढ़ भाजपा की बात करें तो पितृपुरुष कुशाभाऊ ठाकरे को कलफ वाले कपड़ों में शायद ही देखा हो, लेकिन बड़े-बड़े कलफधारी नेता उनके पैर छूने के लिए गुड़ी-मुड़ी हो जाते थे। कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी कलफ वाले कपड़ों का इस्तेमाल नहीं करते। उनका स्वभाव भी जनता और कार्यकर्ता से सहज है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी कलफ वाले कुर्ते-पजामे पहनने लगे हैं, लेकिन व्यवहार में वे कलफ पीकर नहीं निकलते हैं, इसलिए मुख्यमंत्री बनने के 13 साल बाद भी उनकी सहजता की लोग मिसाल देते हैं। इसके िवपरीत भाजपा और कांग्रेस में ऐसे कई नेता हैं, जिनके कलफनुमा कपड़ों के साथ स्वभाव भी कड़क हैं। चूंकि सत्ता में बीजेपी है, इसलिए उनके नेताओं में कलफ कपड़ों से ज्यादा स्वभाव में दिखना साधारण बात है। हम किसी के नाम का उल्लेख कर उसको छोटा-बड़ा नहीं करना चाहते। आम जनता और कार्यकर्ता पार्टियों में कलफ चढ़े नेताओं को देख और समझ सकते हैं। इतना तो तय है कि राजनीति में कड़क मिजाज नेताजी चुनाव के वक्त खुद के िलए तो मुश्किल होते ही हैं, पार्टी के िलए भी परेशानी की वजह बनते हैं। जो माननीय मंत्री और विधायकगण कलफ की तरह अकड़े-अकड़े रहते थे अब चुनाव में उनकी जीत को लेकर संकट वाली खबरें आ रही हैं। पहले तो उन्हें टिकट मिलना ही मुश्किल है और अगर उम्मीदवार बन गए तो जीतने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ेंगे।
अक्सर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्री-विधायकों से बैठक और आम चर्चाओं में कहते हैं कि विनम्रता से रहिए और महंगे कपड़ों से लेकर आलिशान मकान और बेशकीमती कारों का दिखावा मत करिए। जिसने ये मूल मंत्र माना वो टिकट पाने से लेकर जीतने में आसानी महसूस करेंगे। इसके अलावा सहजता का मामला नेताओं के व्यवहार से भी जुड़ा है। एक सांसद हैं, जो चौबीस घंटे फोन पर उपलब्ध रहते हैं और रात में 2 बजे भी अगर कोई अपरिचित या रॉन्ग नंबर लगने पर मदद मांगता है तो वो उसकी सहायता करते हैं। छोटा सा उदाहरण है, रात के 2 बजे 2 बार रॉन्ग नंबर लगता है। तीसरी बार व्यक्ति अपनी मुसीबत सांसद को बताता है बीमार पत्नी को लेर वो हमीदिया अस्पताल में था और इलाज की गुहार करता है। जरूरतमंद की मदद हो जाती है। राजनीति में ऐसे लोगों की ज्यादा जरूरत है। इन दिनोें भाजपा, संघ परिवार और कांग्रेस अपने कलफबाज नेताओं के कारण भारी परेशान हैं। इसके चलते अनुमान है कि कलफ की तरह कड़क नेताओं के टिकट खतरे में हैं। अगर वो उम्मीदवार बनने में सफल भी हुए तो जीतना संदिग्ध है।