दिक्कत छोटे मन के बड़े नेताओं से…

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राघवेंद्र सिंह

राजनीित के राज-रोग में शुमार हो गए हैं छोटे मन के बड़े नेता.. आमतौर पर सियासत में ज्यों-ज्यों लीडर का कद बढ़ता गया उनके िदल छोटे होते जाते हैं.. कुछ बिरले ही हैं जो इस राज-रोग से बच जाते हैं.. चुनावी साल में ये रोग पार्टी और नेताओं को ज्यादा सालता है.. कह सकते हैं कि खुदा ऐसी खुदाई न दे िक खुद के सिवाय कुछ दिखाई न दे.. कार्यकर्ता और जनता अपने लीडरों को खजूर के पेड़ के मानिंद बढ़ता देख रही है जिनमें छाया भी नहीं होती और फल भी दूर लगते हैं.. कुल मिलाकर इवेंट का जमाना है.. भाजपा हो या कांग्रेस या कोई और दल.. सब मैनेजमेंट के मास्टरों के पीछे चल पड़े हैं.. ऐसे में चुनाव के वक्त भी कार्यकर्ता पार्टी फ्रेम में फिट नहीं हो पा रहे हैं.. उपेक्षित लोग या तो उदासीन हैं या खजूर का पेड़ बने नेताओं से मतदान के दिन हिसाब बराबर करने के मूड में हैं.. पार्टियों ने डैमेज कंट्रोल नहीं किया तो इस बार के चुनाव आग की दरिया की तरह हैं.. जिसमें उम्मीदवारों को डूबकर जाना है..
भाजपा अपने खांटी कार्यकर्ताओं की नाराजगी को लेकर खासी चिंतित है.. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी सहजता और सरलता से जरूर वोटर और कार्यकर्ताओं को समझाने-बुझाने में लगे हैं.. लेकिन पिछले 15 साल में विधायक, मंत्री और पार्टी के पदाधिकारियों का अहंकार उनकी बॉडी लैंग्वेज से नजर आता है.. शिवराज सिंह से लेकर अमित शाह तक कई बार कह चुके हैं कि कार्यकर्ताओं की चिंता करें और उनके निजी कामों को तरजीह दें.. लेकिन अब तो समय निकल चुका है.. सत्तारूढ़ नेता कोशिश भी करें तो आचार संहिता के कारण ऐसा संभव नहीं है.. अब तो केवल मीठी बातें करना और यह कहना ही मजबूरी है कि इस बार तो जिताओ सरकार बनते ही सबसे पहले आपका ख्याल रखेंगे.. लेकिन 2003 से लेकर 2018 तक 15 साल में उम्मीद पर जो कार्यकर्ता धीरज रखे थे उनकी सब्र का बांध टूट रहा है.. इस मामले में नाराजगी विधायक-मंित्रयों से लेकर पार्टी पदाधिकारियों से भी है.. कई बार ऐसे किस्से आए हैं नेताओं के अहंकार की लोगों ने यह कहकर निंदा की कि पार्टी राम की है और अहंकार रावण जैसा.. ऐसे नेताओं के टिकट भी काटे जाने की बातें हो रही हैं ताकि कार्यकर्ताओं को संतुष्ट किया जा सके.. यह हाल अकेले भाजपा में नहीं है, कांग्रेस में भी सरकार बनाने की संभावना मात्र से जिन नेताओं के व्यवहार में अकड़ आ गई है, उनसे कार्यकर्ता दुखी है.. चुनावी साल है भाजपा-कांग्रेस समेत सभी दलों को जरूरत है नेता भले ही छोटे हों, लेकिन उनके मन बड़े हों.. अलग बात है कि सत्ता में आने के बाद कद बड़े हो जाते हैं और मन छोटे… लगभग सभी पार्टियां इस तरह की समस्या से जूझ रही हैं.. दिक्कत यह है कि इसका इलाज किसी के पास नजर नहीं आ रहा है.. ऐसे में पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की कविता की चार पंक्तियां याद आ रही हैं…
छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता,
टूटे तन से कोई खड़ा नहीं होता।
मन हारकर, मैदान नहीं जीते जाते,
न मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।
..लेकिन इवेंट और मीडिया मैनेजमेंट के महारथी जमीन से कटे नेताओं को वोट कबाड़ने के नुस्खे बता रहे हैं…
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