बदनामी पर उतारु मुन्नियां………….

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ज़हीर अंसारी

कुछ समय पहले एक फ़िल्म का गाना बड़ा लोकप्रिय हुआ था। ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए’ तब मुन्नी बदनाम हुई थी अब मुन्नियाँ बदनाम कर रही हैं। मुन्नियों ने सालों बाद अपनी चिकनी चुपड़ी त्वचा से झुर्रियों की परत उकेर कर दिखाना शुरू कर दिया है कि किस-किस ने, कब-कब उनकी मलाई सी मख़मली चमड़ी का स्पर्शस्वाद लिया था। कमाल इस बात है कि मुन्नियों को बरसों पुरानी घटना अब याद आ रही है जब उनकी चमड़ी में भट्ट पड़ गई है। बड़ा ही अजीब दस्तूर निकाला है इन मुन्नियों ने। ख़ुद तो आउट आफ डेट हो चुकी हैं फिर भी एक्सपायरी डेट की बोर्डेर पर खड़े मुन्नाओं की चड्डी पब्लिकलि उतार रही हैं।

‘मी टू केम्पेन’ क्या चला मुन्नियाँ अपना नाम दैहिक शोषण की दौड़ में शामिल कराने दौड़ पड़ीं और मुन्नाओं का नाम उजागर करने लगी। दस, पंद्रह, बीस साल बाद इस तरह का पर्दाफाश होना आश्चर्यचकित करने वाला है। पब्लिक को इतने सालों के बाद यह बताया जा रहा है कि फ़लाँ मुन्ना ने दैहिक शोषण किया था। मुन्नियाँ यह नहीं बता रहीं कि दैहिक शोषण के ज़रिए उन्होंने क्या-क्या लाभ उस वक़्त उठाया था। मुन्नाओं को सीढ़ी बनाकर जिस ऊँचाई पर पहुँचीं हैं उसका ख़ुलासा भी मुन्नियों को करना चाहिए।

बड़ा सिम्पल सा फ़ंडा है ग्लैमर की दुनिया का। कम उम्र में अधिक की चाहत में बहुतेरी युवतियाँ-महिलायें कभी-कभी शार्ट-कट मार्ग चुन लेती हैं। सियासत, फ़िल्म इण्डस्ट्रीज, बड़े कारपोरेट सेक्टर के अलावा और भी कई ऐसे फ़ील्ड हैं जहाँ शार्ट-कट से जल्दी आगे बढ़ा जा सकता है। ये कोई आज की बात नहीं है, दशकों से यह परंपरा चली आ रही है। फ़िल्म इण्डस्ट्रीज और राजनैतिक क्षेत्र दैहिक शोषण के लिए कुख्यात हैं। यहाँ के शिकारी हर वक़्त वियाग्रा जेब में रखे शिकार की ताक में बैठे रहते हैं। सामान्य और मध्यम परिवार से पहुँचने वाली स्त्रियों के साथ यौन शोषण होना लगभग तय ही रहता है। हवस का शिकार न बनी तो समझो ‘करियर’ चौपट। उस वक़्त किए गए समझौते की पोल सालों बाद खोलना चर्चा में आना महज़ उद्देश्य प्रतीत होता है।

‘मी टू’ की शिकार कौन सी मुन्नी ट्विटर पर आने वाली है, यह ताकने कई लोग ट्विटर पर आँखें गड़ाए बैठे रहते हैं। जैसे ही किसी सेलिब्रिटी का नाम आया वैसे ही ‘जुगाली मीडिया’ की जिह्वा फड़फडाने लगती है। ‘मी टू’ में क्या हुआ, कितना हुआ, कितने साल पहले हुआ, यौन शोषण होने के बाद कितने साल संग रहे, यह जाने बिना मुन्नाओं की चड्डी उतार दी जा रही है। बेचारे मुन्नागण आदिमानव की तरह पत्ते लपेटे मुँह चुराते फिरते हैं।

अभी तक जिन मुन्नियों ने ‘मी टू केम्पेन’ के तहत अपने नक़ाब उतारे हैं, क़रीब-क़रीब वो सभी आउट-डेटेड हो चुकी हैं और मुन्ना लोग भी नाती-पोते वाले हो गए हैं। मुन्नाओं के बेटे-बेटियाँ बाप की क़लई खुलने को भले उतनी गंभीरता से न लेते हों मगर मुन्नाओं की नज़रें तो शर्मसार रहती ही होंगी। मुन्नाओं के सामने विकट स्थिति तब उत्पन्न होती होगी जब नाती-नतुरे पूछते होंगे कि नाना-दादा.. ये मी टू क्या होता है।

अब तो ‘मी टू, मी टू’ की धुन से अच्छे-अच्छों के कान के पर्दे फट रहे हैं, भय सता रहा है कहीं उनका नाम न आ जाए। आज ही बात है पड़ोस वाली भाभी सुबह-सुबह कल्लू स्वामी के द्वार पर खड़ी होकर ‘मी टू..मी टू’ चिल्ला रही थीं। यह सुनते ही कल्लू स्वामी भरी गर्मी में गद्दा ऊपर डाल के दुबक गए। बाद में पता चला कि भाभी का तोता स्वामी की छत पर बैठ गया था जिसे वो प्यार से ‘मिठू..मिठू’ पुकारती हैं।