रथ तो रुका पर राम भरोसे कांग्रेस……….

0
102

राघवेंद्र सिंह

चुनाव हों और सियासत में भगवान राम को न लाया जाए ऐसा नामुमिकन भले ही न हो मुश्किल जरूर लगता है। मध्यप्रदेश में चित्रकूट से शुरु हुए कांग्रेस के राम पथ गमन रथ को लेकर चुनाव आयोग की रोक से कांग्रेस के मन ही मन लड्डू फूट रहे हैं। जितना यात्रा से राजनैतिक लाभ मिलता उतना पुण्य उसे यात्रा के रुकने से मिलता दिख रहा है। इसमें एक बात और हुई है। एक तो यात्रा में कांग्रेसियों को पसीना और पैसा दोनों बहाना पड़ता। आयोग के प्रतिबंध से उसे बिना कुछ किए भाजपा को राम विरोधी बताने का मुद्दा मिल गया। गांव में एक कहावत है जिसकी किस्मत करे जोर उसके कोदो नींदे चोर। शहरी अंदाज में इसे यूं समझ सकते हैं अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान।
मतदान में अभी वक्त है और 28 नवंबर को वोट पड़ने तक सियासत का ऊंट कई करवट बदलेगा। इस बार के चुनाव सभी दल खासतौर से भाजपा कांग्रेस के लिए मुद्दों के मामलों में रस्सी पर चलने जैसा होगा। डीजल-पेट्रोल के आसमान छूते भाव,कमर तोड़ती मंहगाई,बेबस मध्यम वर्ग और नाराज सवर्ण भाजपा को दिक्कत दे रहा है। चैंबर पालिटिक्स करने वाले कांग्रेसियों की मानें तो इन तमाम मुद्दों ने फिलवक्त लाटरी खोल दी है। अभी से उनके रथ जमीन से एक एक फुट ऊपर चलने लगे हैं। अभी खुदा ने हुस्न दिया नहीं है नजाकत पहले से आ गई है। ऐसे ही भाजपा में भी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का अंदाज और उनकी बाडी लैंग्वेज बताती है कि उनका भी रथ जमीन से ऊपर ही चल नहीं बल्कि उड़ रहा है। वे भाषण में वोट मांगते नहीं हैं बल्कि चुनाव का निर्णय सुनाते हुए लगते हैं। शाह की मानें तो भाजपा की सरकार बनने से कोई नहीं रोक रहा। मगर लोकतंत्र में माई बाप तो जनता है। उसने फैसला दिया नहीं और आप निर्णय सुनाने लग गए कि मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार अंगद की तरह है कोई उखाड़ नहीं सकता। एक बात औऱ मांगने वाला तो विनय करता है लेकिन यहां तो आदेश,निर्देश जैसी भाषा बोली जा रही है। जीत हार अपनी जगह है लेकिन ये एक तरह से वोटर की अनदेखी है और अपमान कोई भले ही न माने मगर यह मतदाताओं का मान भी नहीं बढ़ाती। फिर हम एक गांव की कहावत पर जाएंगे जिसे शहरों के भद्रजन भी समझ सकते हैं, मांगने के लिए याचक बनना पड़ता है। कोई बाप बनकर मांगे तो यह अन्डर वर्ल्ड की भाषा में डानगिरी समझी जाएगी। हालांकि सबका अपना अपना अंदाज होता है । कोई साधु महात्मा भिक्षामदेही करके सीता को हर ले जाता है तो कोई बुद्ध महावीर की तरह कटोरे में उतना ही मांगता है जितने में उनका एक समय का भोजन हो जाए। दूसरे वक्त की भोजन की वह चिंता नहीं करता। लेकिन राजनेता उनके दल और व्यापारियों का कितना भी मिल जाए न तो मन भरता है और भूख मिटती है। एक और कहावत है राजा को कभी संतोषी नहीं होना चाहिए और साधु को अपनी इच्छाओं का विस्तार नहीं करना चाहिए। उस हिसाब से तो सब ठीक हो रहा है। मगर मांगने वाले को चाह भिक्षा हो या वोट याचक की तरह लेना चाहिए। चित्रकूट में रथ रोकने पर गोस्वामीजी की पंक्तियां याद आ रही हैं, चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़,तुलसीदास चंदन घिसे और तिलक करे रघुवीर। अब पता नहीं चुनाव में किसका तिलक होगा…?