समय समय की बात है …………

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राकेश दुबे

मध्यप्रदेश में कांग्रेस का अन्य दलों के साथ गठ्बन्धन न होना इस समय सबसे अधिक चर्चा का विषय है | समय की बलिहारी है , जो सपा और बसपा कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को बिना मांगे और बिना शर्त समर्थन दे रहे थे, आज ये दोनों ही दल कांग्रेस से चुनावी गठबंधन के लिए की बात नकार चुके हैं । इस बदलाव का कारण समय है। तब केंद्र सरकार की कमान कांग्रेस के हाथों में थी, और सरकार के हाथों में सीबीआई से लेकर क्या-क्या होता है, किसी से छिपा नहीं है।मुलायम सिंह यादव और मायावती पर समय-समय पर आरोप भी लगाते रहे हैं कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल अपने राजनीतिक हित साधने के लिए सीबीआई का दुरुपयोग करते हैं। यह दुरुपयोग कैसे होता है , यह बताने की जरूरत नहीं है । यह डर उन्हें ही ज्यादा रहताहै , जिन्होंने ऐसा-वैसा कुछ कर रखा है । क्या आपने कभी चंद्रबाबू नायडू और नवीन पटनायक को ऐसे आरोप लगाते सुना है?
मायावती ने छत्तीसगढ़ में पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजित जोगी की पार्टी से समझौता किया, और \ मध्य प्रदेश-राजस्थान में कांग्रेस से चुनावी गठबंधन करने से इनकार कर दिया, तब राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा था कि क्या फिर सीबीआई का डर, अपना असर दिखा रहा है? उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा, दोनों ही चुनावों का मत प्रतिशत बताता है कि अगर सपा-बसपा-कांग्रेस-रालोद का महागठबंधन बन जाये तो मोदी-शाह की करिश्माई जोड़ी भी भाजपा की नैया को डूबने से नहीं बचा पायेगी। सिर्फ बसपा को इस महागठबंधन से दूर रखने से भी भाजपा अपनी नैया पार लगा सकती है, ऐसा राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है।
कांग्रेस के प्रति बसपा की बेरुखी का कारण ढूंढा जाता , उससे पहले ही सपा ने भी ऐलान कर दिया कि अब मध्य प्रदेश-राजस्थान में गठबंधन के लिए कांग्रेस का और इंतजार नहीं किया जा सकता। इन दोनों राज्यों और छत्तीसगढ़ में भी बसपा के असर वाले कुछ क्षेत्र हैं, लेकिन सपा का राजस्थान में उंगलियों पर गिनी जा सकने वाली यादव असर वाली सीटों के अलावा कहीं कोई असर है| मुलायम और उनके वारिस पुत्र अखिलेश का समाजवाद भी यादवों तक सिमट गया है।

एक यह भी सच है कि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा ही, अब भाजपा के बाद, जनाधार वाले दल हैं। ऐसे में इनके साथ आये बिना देश में कोई भाजपा विरोधी विकल्प बन ही नहीं मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बसपा के असर वाले कुछेक क्षेत्र हैं। यह भी आम धारणा है कि मायावती अपना वोट बैंक ट्रांसफर कराने में सक्षम हैं। ऐसे में राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा के अलग चुनाव लड़ने तथा छत्तीसगढ़ में अजित जोगी की पार्टी से समझौता करने का सीधा लाभ भाजपा को और नुकसान कांग्रेस को ही होगा।
वैसे इन तीनों ही राज्यों में भाजपा को सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ेगा, जिसका सीधा लाभ कांग्रेस को मिल सकता है, बशर्ते वह भाजपा विरोधी मतों का बंटवारा टाल सके। अगर कांग्रेस से बसपा की दूरियों के पीछे भाजपाई रणनीति है तो चुनावी दृष्टि से लाभदायक ही साबित होगी। वैसे छोटे-मोटे दल ढूंढ कर उनसे गठबधंन कर चुनाव लड़ने वाली सपा भी हिस्सा तो अंतत: भाजपा विरोधी मतों में ही बंटायेगी यानी उसका भी लाभ अंतत: भाजपा को ही मिलेगा।मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को अगले आम चुनावों का सेमीफाइनल माना जा रहा है। ऐसे में येन केन प्रकारेण अगर भाजपा अपनी सत्ता बचा ले गयी, तो उसे आम चुनावों में ऊंचे मनोबल का मनोवैज्ञानिक लाभ मिलेगा, जबकि कांग्रेस पराजित मानसिकता के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी। लेकिन यह एक संभावना मात्र का विश्लेषण है। जरूरी नहीं कि ऐसा ही हो।
जनता जब बदलाव की ठान लेती है तब सारे गणित धरे रह जाते हैं। सेमीफाइनल में न सही, लेकिन फाइनल में तो खासकर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा की भूमिका गैर भाजपाई गणित में निर्णायक ही रहेगी। तब भी अगर उन्होंने कांग्रेस को ऐसे ही दुत्कार दिया, तब? धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता की राजनीति के पैरोकारों की अलग व्याख्या हो सकती है, लेकिन आज की सत्ता केंद्रित राजनीति में साधन और साध्य—सभी कुछ सत्ता ही है। यह सही है कि राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा की मजबूती कांग्रेस की कमजोरी का परिणाम है, लेकिन कांग्रेस को मजबूत करने के लिए सपा-बसपा या अन्य क्षेत्रीय दल खुद को कमजोर होने का जोखिम क्यों उठायें? एक बड़ा सवाल है | बसपा और सपा ने इन चुनावों में कांग्रेस से गठ्बन्धन को आत्मघाती माना यह परहेज कब तक चलेगा समय बतायेगा |