क्या जबलपुरिया जनता घुसपैठिया हो गई…?

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ज़हीर अंसारी
जब से आदर्श आचार संहिता लागू हुई है तब से ज़िला प्रशासन और पुलिस का रवैया बदल गया है। ख़ासकर पुलिस प्रशासन का। लगता है पुलिस ने पूरे जबलपुर जिले के नागरिकों को घुसपैठिया मान लिया है। शहर के हर चौराहे-तिराहे पर बेरिक्रेट लगाकर और बल तैनातकर न केवल आने-जाने वाले दो और चार पहिया वाहनों को रोक रही है बल्कि उनके साथ पुलिसिया अन्दाज़ में दुर्व्यवहार किया जा रहा है। जैसे वाहन वाले कोई जुर्म करके आ रहा हो। डंडा पटककर तीखे शब्दबाण चलाकर ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे ये जबलपुर के वोटर न होकर घुसपैठिया हों। वाहनों में क्या लिखा है, क्यों लिखा है कि जाँच-परख करने का तरीक़ा ऐसा है जैसे यहाँ आपातकाल लागू हो गया है। नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए गए हों।

निर्वाचन आयोग का निर्देश सिर्फ़ इतना है किसी वाहन में पदनाम, दलीय चिन्ह, किसी पार्टी या उम्मीदवार की प्रचार सामग्री या पार्टी विशेष का झंडा-झंडी, बैनर पोस्टर तो नहीं लगा है, अगर लगा है तो इसे हटाना है। आयोग के निर्देश का पालन करवाने की बजाय पुलिस डंडा पटक संस्कृति अपना रही है। डाक्टर, वक़ील, प्रेस या धार्मिक चिन्ह और गुरुओं के नाम पर चालान कर रही है या ज़बरिया हटवा रही है। क्या डाक्टर, वक़ील, प्रेस, धार्मिक चिन्ह या गुरुओं के नाम किसी पार्टी विशेष का प्रचार कर रहे हैं।

अब बात करते हैं कारों में लगी फ़िल्म और सम्पत्ति विरूपण अधिनियम का, यह नियम लागू कराने में अभी तक प्रशासन ने कोई ठोस क़दम क्यों नहीं उठाया ? क्या वह सत्ता पक्ष का अर्दली था अभी तक। चुनावी अधिसूचना जारी होते ही शेर हो गया जो कमज़ोर शिकार पर झपटने लगा। मुख्य मार्गों पर बेरिक्रेट-स्टॉपर और भारी संख्या में बल तैनात कर क़ानून से डरने वालों को क्या इसलिए डराया जा रहा कि अब लोकतंत्र नहीं पुलिस तंत्र चल रहा है। अब तक कई चुनाव इस शहर ने देखे मगर ऐसी लालफ़ीताशाही पहली बार देखी जा रही है। शायद तभी हाईकोर्ट बार एसोशिएशन के अध्यक्ष आदर्शमुनि त्रिवेदी ने कहा कि आचार संहिता लागू हुई है, आपातकाल नहीं। हम प्रशासन को 48 घंटे की मोहलत देते हैं कि वो अपने रवैए में बदलाव करे वरना अधिवक्ता बिरादरी सड़कों में उतर आएगी।

अरे भाई चोर-उच्चके, गुंडे-मवाली, अपराधी, शराब और रुपयों का परिवहन करने वाले कभी भी मुख्य मार्गों का इस्तेमाल नहीं करते, रुपए-शराब का परिवहन करने वाले अपना मार्ग ख़ुद तय करते हैं। मुख्य मार्गों पर वही चलते हैं जो क़ानून को शिरोधार्य करते हैं।

आचार संहिता की आड़ में अगर पुलिस को अपनी पर्फ़ोर्मन्स दिखानी ही है तो मुखबिर सूचनाओं के पुराने पन्ने पलट से। पता चल जाएगा कहाँ-कहाँ जुआ, सट्टा और आपराधिक गतिविधियाँ चल रही है। कौन-कौन नशीले पदार्थों और अवैध शराब के कारोबार में लिप्त है। किस-किस इलाक़े में गुंडई का बोलबाला है। पुलिस जाकर उनका टेटुआं आसानी से दबा सकती है, अब तो नेताओं की नेतागिरी पर आपातकाल लागू है। नेता साहबान तो चूँ करने की स्थिति में नहीं हैं।

कमाल इस बात है कि इस वक़्त शहर में जो कुछ चल रहा है उसको लेकर सत्ता और विपक्ष दोनों चुप हैं। जैसे इन्हें आम लोगों के वोटों की दरकार नहीं है। पंद्रह सालों तक राज करने वाली पार्टी के नेताओं की चुप्पी और सत्ता में आने को आतुर नेताओं की ख़ामोशी आम लोगों की समझ से परे ह
फोटो सांकेतिक है