हाथी की ढाई घर चाल का मतलब समझिए

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जयराम शुक्ल

शतरंज की बिसात पर हाथी जब घोड़े की भाँति ढाईघर चाल चलने लगे तो समझ जाइए खेल का अंजाम क्या होगा? बहन मायावती का मध्यप्रदेश में बसपा का काँग्रेस के साथ गठबंधन तोड़ने, इसका ठीकरा दिग्विजय सिंह पर फोड़ने के पीछे का खेल वैसा ही है। जैसा सामने दिख रहा है वैसा तो हरगिज नहीं।

काँग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला के उस वक्तव्य पर ध्यान दें जिसमें उन्होंने कहा कि गठबंधन तय करने में राहुलजी और सोनिया जी के अलावा कोई तीसरी ताकत है ही नहीं। मायावती के मुखारबिंद से इन दोनों की प्रशस्ति के शब्द फूल बनकर झड़ रहे हैं। तो फिर दिग्विजय सिंह पर नजला क्यों?

दिग्विजय सिंह तो बेचारे खुद काँग्रेस के भीतर तनहाई में दिन काट रहे हैं। हाल ही मध्यप्रदेश में राहुल गांधी का दौरा हुआ। सभाओं और रोड शो में दिग्विजयजी को ‘शटअप’ मुद्रा में रखा गया। राहुल के अलावा जो बोले कमलनाथ और ज्योतिरादित्य ही बोले। अरुण यादव और अजय सिंह राहुल भी बेचारे इन रोडशोज में बेगानी शादी में अब्दुल्ला से ही दिखे।

फिर दिग्विजय सिंह का मायावती पर जो बयान आया उस बयान को मेरे जैसे कई खबरख्वाहों ने बहनजी के जवाबी बयान के बाद मुश्किल से तलाशा। दिग्विजय सिंह का भाजपा के दवाब व सीबीआई के डर से गठबंधन नहीं करने का वक्तव्य तब आया जब मायावती यह स्पष्ट कर चुकीं थी कि वे तीन राज्यों, जहाँ विधानसभा चुनाव होने हैं वहां काँग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करने जा रही हैं।

छत्तीसगढ़ में तो जोगी की काँग्रेस से समझौता इससे भी पहले घोषित हो चुका था। तो यह समझ में नहीं आता कि दिग्विजयसिंह का बयान समझौते के आड़े कहां आ गया जबकि बकौल मायावती राहुलजी और सोनियाजी दिल से गठबंधन चाहती हैं। और इधर सुरजेवाला स्पष्ट करते हैं कि कांग्रेस में कोई तीसरी ताकत का सवाल ही नहीं उठता।

दिग्विजय सिंह पर दलित विरोधी और भाजपा-आरएसएस का एजेंट होने की मायावती की बात उस खिसिआहट से ज्यादा कुछ नहीं लगता जो सीबीआई को लेकर मर्माहत होकर निकली। वे दिग्विजय सिंह पर भी ईडी और अन्य जांच एजेंसियों से डरे होने की बात जोड़ती हैं। यह पूरा प्रदेश जानता है कि दिग्विजय सिंह खुल्लाखेल फरुख्खाबादी खेलने पर यकीन करते हैं। और यकीनन कांग्रेस में उनसे निडर, बेफिक्र नेता कोई नहीं।

रही बात दिग्विजय सिंह के दलित विरोधी व भाजपा एजेंट की तो यह अंधा-बहरा भी जानता है कि मध्यप्रदेश में जो जातीय संघर्ष का ताप महसूस हो रहा है उसकी आग दिग्विजय सिंह की ही लगाई हुई है। मुख्यमंत्री के तौर पर उनका उत्तरार्द्ध दलितों को ही समर्पित था। 2002 में विधिक प्रावधान करके प्रमोशन में रिजर्वेशन का जो फच्चर उन्होंने फँसाया था उसी की कसक ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को “कोई माई का लाल” जैसी भीष्मप्रतिग्या के लिए विवश किया। ये अजाक्स-अपाक्स के पिता जी कौन हैं? किनने सरदार सिंह डंग, डा.अमर सिंह और बैरवा जैसे अफसरों को सिस्टम में जातीय नफरत का जहर घोलने के लिए सरकारी पहुँना बनाकर रखा था? चंद्रभान प्रसाद और भोपाल डिक्लेरेशन याद है ना…यह किसका किया कराया है, बताने की ज्यादा जरूरत नहीं।

दरअसल दिग्विजय सिंह मायावती के वैसे ही वर्गशत्रु हैं जैसे कि नक्सलियों के शत्रु मुख्यधारा के वामपंथी। खुन्नस यही है। ये दिग्विजय सिंह ही थे जिन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में बसपा के तीन चौथाई विधायकों को अपने पाले में कर लिया था। दिग्विजय सिंह की इस मारक शक्ति को जानते हुए ही मायावती ने उनकी भूमिका को काँग्रेस नेतृत्व के सामने निष्प्रभावी करने के लिए यह बयान उछाला..। सही पूछें तो गठबंधन का रास्ता बंद नहीं हुआ है। अभी तो महज 22 सीटों के उम्मीदवार घोषित किए गए हैं।

दरअसल बात यह है कि मायावती मध्यप्रदेश में वैसे ही ‘लायन शेयर’ चाहती हैं जैसा कि सीताराम केसरी के अध्यक्षी के समय उत्तरप्रदेश में ले लिया था। उस चुनाव के बाद से ही वहां काँग्रेस हाशिये पर पहुंची। दिग्विजयसिंह को यह गणित मालुम है कि यदि मायावती के कहे पर वे सीटें बसपा के खाते जाती हैं जहां उसे 6 प्रतिशत वोट भी नहीं मिलते तो वहां काँग्रेस के वोटर उत्तरप्रदेश की तरह हमेशा के लिए छिटक जाएंगे। उनकी इस धारणा से कमलनाथ भी सहमत हैं इसलिए उन्होंने स्पष्ट किया कि गठबंधन टूटने की वजह दिग्विजय सिंह का बयान नहीं अपितु मायावती की अव्यवहारिक अपेक्षा है।

बसपा के प्रभाव में प्रदेश की वो 28 सीटें हैं जो उत्तरप्रदेश से सटी हैं। इनमें से 15 से 20 ही ऐसी हैं जहाँ 1989 से पिछले चुनाव तक वोट का प्रतिशत 15 से 25 के बीच में है। जब कोई लहर नही होती तो बसपा के वोट ध्रुवीकृत हो जाते हैं। जैसे 1993 में बसपा अधिकतम 11 सीटें जीती थी। अभी ऐसी कोई राजनीतिक परिस्थिति नहीं पैदा हुई है कि बसपा को इससे ज्यादा बढ़त मिले। यदि स्थितियां कमोबेश 93 जैसी हैं भी, उस हिसाब से यदि बसपा श्रेष्ठ प्रदर्शन भी करती है तो उसे 11-12 सीटों से ज्यादा नहीं मिल पाएगी। बसपा 60 से 80 सीटें चाहती है लेकिन दिग्विजय जैसे खाँटी खुर्राट यह जानते हैं कि यह सौदा आत्मघाती होगा। राहुल-सोनियाजी की तारीफ करके मायावती अभी भी इंतजार में हैं कि उन्हें 80 सीटें मिल जाएं।

असल में हाथी की घोड़े जैसी ढाईघर चाल के पीछे मायावती की लोकसभा पर नजर है। गठबंधन न हुआ तो वे काँग्रेस के प्रत्याशियों को घेरकर अपना वोट प्रतिशत बढ़ाना चाहेंगी ताकि यदि महागठबंधन बने तो इस आधार पर उन्हें ज्यादा सीटें मिल सके। लोकसभा चुनाव की दृष्टि से उन्हें अबतक रीवा व सतना में ही सफलता मिल पाई है। इन दोनों सीटों पर कुछेक अपवाद छोंड़ दें तो बसपा जीती या मुख्यप्रतिद्वंदी रही है। बसपा की जीत वोटों के बँटवारे पर निर्भर है। आदर्श स्थिति में कहीं से भी उसकी अधिकतम हैसियत 6 से 7 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है।

इसबार बसपा उप्र जैसी सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रही है। उदाहरण के तौर पर बसपा के गढ़ रीवा की 8 में से घोषित 5 सीटों में दो सवर्ण उम्मीदवार दिए हैं। शेष तीन में से दो में और सवर्ण प्रत्याशी दे सकती हैं। यदि बसपा सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारती है तो यह तय मानिए कि 40 प्रतिशत से ज्यादा उम्मीदवार सवर्ण होंगे। वह पिछड़ों पर भी दाँव लगाएगी। इस तरह से बसपा अपने पारंपरिक वोटों के साथ पिछड़ों और सवर्णों के वोटों को जोड़ने की दिशा में काम करेगी।

मध्यप्रदेश की राजनीति में एट्रोसिटी एक्ट और प्रमोशन में आरक्षण को लेकर आग लगी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भाजपा, काँग्रेस में से कोई दल बोल नहीं रहा है। सवर्णों का कर्मचारी संगठन सपाक्स का विरोध इतना प्रभावी बन गया है कि सभी फूँक-फूँककर कदम उठा रहे हैं। कुछ उत्साही रिटायर्ड अधिकारियों ने सपाक्स समाज बनाकर राजनीतिक दल गठित कर लिया है। वे चुनाव लड़ने की भी योजना बना रहे हैं। सवर्ण वोटरों का गुस्से को बसपा अपने हित में देख रही है। वैसे मायावती ने कई मौकों पर आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात कही है। एट्रोसिटी एक्ट के दुरुपयोग पर बसपा लाँबिस्ट मायावती के शासनकाल की नजीर देते हैं जब उप्र में उन्होंने इसके प्रावधानों को ढीला किया था। सभी सीटों में उम्मीदवारी के साथ यदि बसपा उतरती है तो मायावती का लाइन आफ एक्शन यही रहेगा।

बहन मायावती अब कुछ भी मन से नहीं बोलतीं। वे सोनियाजी की तरह बाँचकर पढ़ती हैं। बाँचकर पढ़ने वाला कथ्य-तथ्य कोई ऐरा-गैरा नहीं ही लिखता होगा। अब बसपा के पास भी वाँररूम है जो रणनीति तैय्यार करता है। प्रशांतकिशोर की बिरादरी के लोग यहां भी हैं। सो इसलिए यह समझकर चलिए कि मायावतीजी का गठबंधन को लेकर बयान शतरंज की बिसात पर घोड़े जैसी ढाई घर चाल है जिसका मतलब सीधे-सीधे समझ में नहीं आने वाला।

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