टिकिटिया अफ़ीम का उतरा नशा…………..

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ज़हीर अंसारी
देश में अनेक तरह की राजनैतिक पार्टियाँ हैं। कोई गरम तो कोई नरम, कोई ढुलमुल तो कोई मौक़ापरस्त। लेकिन इन सब की प्रवृति एक समान है। नीचे वाले नेता और कार्यकर्ता को उल्लू बनाओ और स्वार्थसिद्धी करो। निचले क्रम के नेताओं को टिकिटिया अफ़ीम इतनी पिलाते रहो कि सबरे मदक्की बन जाए। जब तक इन्हें टिकिटिया अफ़ीम चखाते रहो, इनकी सक्रियता बनी रहती है। जैसे ही यह अफ़ीम मिलना बंद हो जाती है, बेचारे निचले क्रम के नेता पल्ली ओढ़ कर सो जाते हैं। पार्टी के कार्यक्रमों में यदाकदा नज़र तो आते हैं मगर वहाँ भी भीतर की टीस उगल देते हैं। टीस उगलने के बाद फिर घिघिया कर कहते हैं कि जो उगला वो ‘ऑफ़ दी रिकार्ड’ है। अब ऐसे लोगों को कौन समझाए कि सियासत में जो होता है वो सब ‘ऑन रिकार्ड’ ही होता है।

ऐसे ही टिकिटिया अफ़ीमची हमारे कल्लू स्वामी थे। टिकिट माँगते-माँगते थक गए। अंत में जब उनके पिछवाड़े घनघनाती दोलत्ती पड़ी तो किलबिलाकर कोना दाब लिया। अब कोने में बैठे-बैठे कायँ-कायँ करते रहते हैं। कुरेदने पर अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते पिछवाड़े पड़ी लात से कराह उठते हैं। कहते हैं जब मैं युवा था, ऊर्जावान था, दरी-फट्टा बिछाने में माहिर था तो पार्टी के सभी नेता मेरी क़द्र किया करते थे। दरी-फट्टे बिछाने में मुश्किल से विशेषज्ञता हासिल की। इसी विशेषज्ञता के बल पर मैं शीर्ष नेताओं की जी-हुजुरी सूची में शामिल हो गया। चमचों की ‘टॉप टेन’ सूची में मेरा नाम आने लगा। सोचने लगा कि मेरा क़द जिराफ़ की गर्दन टाइप हो गया, सो बीवी बच्चों और कारोबार को ठेंगे पर रख आकाओं की चाकरी इस उम्मीद से करने लगा कि अगली बार टिकिट पक्की। जब-जब टिकिटों का मार्केट ओपन होता तो मैं भी क़तार में लग जाता। आका को अर्ज़ी थमा देता। हर बार आका नीचे से ऊपर तक मुझे अजगरी दृष्टि से देखते, मानों सेंघा निगल जाएँगे। फिर मुझे पुचकार कर अगली बार का भरोसा देते हुए बम्बईया गोली चूसने के लिए पकड़ा देते थे।

पहली बार जब मैंने टिकिट का कटोरा फैलाया था। तब तक मैं ज़रा मुँहफट हो चुका था। दशकों से चमचागिरी करते रहने की वजह से मेरे मुँह का गवर्नर डैमेज हो गया था। सो बिना किसी हिचक के सौ की स्पीड में आँकड़ो सहित जीत का प्रमाण पत्र पेश कर दिया और टिकिट चाहिए ही बोल दिया।

आका ने फ़िल्म अदाकारा ललिता पवार की तरह आँखें मटकाई और मुस्कुराहट शशिकला की तरह लाते हुए शाब्दिक भाषा में बोले। बेटा अभी तुम जवान हो, तुम्हारी उम्र ही क्या है। पार्टी में बहुतेरे सीनियर हैं, इन्हें इस बार चुनाव लड़ने दो, अगली बार तुम्हारा नम्बर पक्का। आका की ज़ुबान से चासनी मिली अफ़ीम पाकर मैं गदगद हो गया। चुनाव दर चुनाव आते रहे, मुझे आश्वासन की चासनी में डुबा-डुबा कर निकाला जाता रहा। चासनी की मिठास में कब पचास साल निकल गए पता ही नहीं चला। पता उस वक़्त चला जब महरारू की कमर 75 अंश का कोण बनाने लगी। मैं दौड़ा-भागा अपने आका की चौपाल में पहुँच गया। उनसे बोला कि इस बार के चुनाव में टिकिट चाहिए। अब मैं सीनियर मोस्ट हो गया हूँ। अब तो मेरे पास भी हज़ारों दरी-फट्टा बिछाने और बैनर-कटआउट लगाने वाले चिलुआ हैं। सीट वैसे ही निकालकर दूँगा जैसे सिजेरियन आपरेशन से बच्चा निकाला जाता है।

आका ने यह सब सुनकर अपनी लम्बी सी नाक ऐसे सिकोड़ी जैसे नाक में मच्छर घुस गया हो। सड़ेला सा मुँह बनाते हुए बोले कल्लू अब तुम उम्रदराज़ हो चले हो। हाईकमान की पॉलिसी है कि युवाओं को प्रमोट करना है। अब तुम्हारा वक़्त निकल गया। अब तो तुम्हारा सेवानिवृत हुए नौकरशाहों की तरह पुनर्वास भी नहीं हो सकता।

कल्लू स्वामी अपनी दुःखभरी कथा सुनाते-सुनाते रुआंसे से हो गए। मूर्च्छित अवस्था को प्राप्त होने लगे। किसी तरह शीतल जल के छिड़काव से मूर्च्छित होने से उन्हें बचा लिया। उन्हें जब तनिक चैतन्यता आई तो कहने लगे। युवा अवस्था वाले आका ने कहा था कि थोड़ा सीनियर हो जाओ फिर टिकिट ले लेना, अब का आका कहता है बुढ़ा गए हो युवाओं को मौक़ा मिलेगा। साला सारी उम्र घासियारागिरी में निकाल दी और हाथ की आई शून्य। ये टिकिटिया अफ़ीम भी अजीब है। मैंने अपनी सात पुस्तों को वासियत कर दी है कि कटोरा लेकर चाय-पकोड़े की दुकान पर भीख माँग लेना मगर टिकिटिया अफ़ीम कभी मत खाना।