“राजा” को तोहमत दे “हाथ” से फिसला “हाथी”

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राकेश दुबे

और मायावती ने दिग्विजय सिंह के सिर पर ठीकरा फोड़ ही दिया | उन्होंने साफ कहा कि मध्यप्रदेश और राजस्थान में उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी, कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेगी। उन्होंने “कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह पर आरोप लगाया कि वे भाजपा के एजेंट हैं। उन जैसे नेता कांग्रेस-बसपा का गठबंधन नहीं होने देना चाहते|” जबकि बसपा छत्तीसगढ़ में पहले ही कांग्रेस से बगावत कर अलग पार्टी बनाने वाले अजीत जोगी के साथ गठबंधन कर चुकी है| मायावती के तेवर से साफ हो गया कि तीनों राज्यों में कांग्रेस के “हाथ” से “हाथी” फिसल गया है | अब बसपा से गठबंधन की सारी उम्मीदें खत्म हो गई हैं| बसपा के कांग्रेस संग न आने से भाजपा को एक बार फिर सत्ता को बचाए रखने की आस नजर आ रही है|
जहाँ तक मध्यप्रदेश की बात है, प्रदेश में लगभग १५ प्रतिशत दलित मतदाता हैं| २०१३ में मध्यप्रदेश में बसपा ने २३० सीटों में से २२७ सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किये थे और ६.४२ प्रतिशत वोट के साथ चार सीटें जीतने में सफल रही थी| राज्य की ७५ से ८० सीटों पर बसपा प्रत्याशियों ने १० हजार से ज्यादा वोट हासिल किए थे| १७ तो सीटें ऐसी थीं जहां बसपा उम्मीदवारों ने ३५ हजार से ज्यादा वोट लिए थे| प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बीच ८.४ प्रतिशत वोट शेयर का अंतर था |तब अर्थात २०१३ में भाजपा को १६५ सीटें और कांग्रेस को ५८ सीटें मिली थीं| अगर कांग्रेस और बसपा में गठ्बन्धन होता तो शिवराज का समीकरण बिगड़ सकता था|
यह भी याद रखने की बात है कि चित्रकूट विधानसभा सीट पर उपचुनाव में बसपा के न लड़ने का फायदा कांग्रेस को मिला था| इसी को ध्यान में रखकर कांग्रेस बसपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की सोच रही थी| मायावती ने दिग्विजय के सर ठीकरा फोड़ कर गठबंधन के कयासों पर पूर्णविराम लगा दिया है|मध्य प्रदेश में बसपा का आधार यूपी से सटे इलाकों में अच्छा खासा है| चंबल, बुंदेलखंड और बघेलखंड के क्षेत्र में बसपा की अच्छी खासी पकड़ है| कांग्रेस के साथ बसपा का न उतरना शिवराज के लिए अच्छे संकेत माने जा रहे हैं|
बसपा-कांग्रेस एक साथ मिलकर चुनावी जंग में उतरते तो राज्य की राजनीतिक तस्वीर बदल जाने की संभावना थी| बसपा का कांग्रेस के साथ न आना राहुल गांधी की विपक्षी एकता फार्मूले को झटका माना जा रहा है| इसके चलते कांग्रेस को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में नुकसान उठाना ही पड़ेगा | इसके अलावा आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ बसपा रहेगी या नहीं यह अभी कहना मुश्किल है| अगर बसपा २०१९ में भी इसी तरह से अलग होकर लड़ती है तो कांग्रेस को कई राज्यों में दलित मतों का नुकसान झेलना पड़ सकता है| एक बात और भाजपा और कांग्रेस के बाद बसपा एकलौती पार्टी है जिसका आधार राष्ट्रीय स्तर पर है, जो गठ्बन्धन का महत्वपूर्ण अंश हो सकता था |