अब तो कांग्रेसी समझ का परिचय दें

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ज़हीर अंसारी

मध्यप्रदेश में गत 15 सालों से भाजपा का एकछत्र राज चल रहा है। भाजपा के इस राज को ख़त्म करने और कांग्रेस की सरकार बनाने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रदेश के बिखरे हुए नेताओं को एकजुट कर दिया और सामूहिक ज़िम्मेदारी सौंप दी। कांग्रेस के शीर्ष नेता कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी, अरुण यादव और अजय सिंह राहुल नेता अपने अपने स्तर पर कांग्रेस को ज़िन्दा करने में मेहनत कर रहे हैं। पब्लिक के बीच जाकर मीटिंग्स कर रहे हैं, संवाद कर रहे हैं, दौरा कर रहे हैं और अलग लगा क्षेत्रानुसार रणनीति बना रहे हैं।

यहाँ तक तो ठीक है। लेकिन इनके नीचे के नेताओं का ढर्रा वही कांग्रेस निपटाऊ बना हुआ है। उनके इस रवैए में धेला भर का भी फ़र्क़ नहीं आया। बड़े नेता के समर्थकों में भी गुटीय वैमनस्यता परवान चढ़ने लगी है। अभी जब टिकिट की घोषणा नहीं हुई है, तो कांग्रेसी आपस में लड़े-मरे जा रहे हैं। उम्मीदवार घोषित होने के बाद ये असंतुष्ट कांग्रेसी क्या क़हर मचाएँगे, इसका अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है।

कांग्रेस का इतिहास रहा है कि कांग्रेस को धरातल पर लाने वाले कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस के नेतापरस्त दोयम दर्जे के नेता ही ज़िम्मेदार हैं। जबलपुर संसदीय क्षेत्र और यहाँ की आठ विधानसभा इसकी साक्षी है। हर बार नेतापरस्त स्थानीय नेता ही कांग्रेस प्रत्याशियों की लुटिया डुबाते आएँ है।

इसकी शुरुआत एकबार फिर शुरू हो गई है। बीते दो दिनों में कांग्रेसी जिस तरह से आपस में लड़ते-मरते दिख रहे हैं उससे यह साफ़ हो गया है कि शीर्ष नेताओं की लाज छोड़कर अपने अहम की लड़ाई लड़ रहे हैं। पूर्व विधानसभा क्षेत्र के दो दमदार नेता आपस में लड़ गए। गाली-गलौज तो हुई ही, सुना है कि रिवाल्वर चमकौवल भी हुई। इसी तरह पश्चिम विधानसभा में रहने वाले दो क़द्दावर नेता आपस में भिड़ पड़े। जान से मारने की धमकी तक मामला पहुँच गया। ये जो स्थानीय नेता आपस में लड़-मर रहे हैं, वो सभी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रदेश के एक शीर्ष नेता से जुड़े हैं। मज़ेदार बात यह कि इनकी आपकी लड़ाई खुल्लम-खुल्ला चल रही है।

टिकिट घोषणा के पहले आपसी सिर फुटौव्वल के वजह राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के स्वागत में लगाए जाने वाले पोस्टर-बैनर और कटआउट है। टिकिट की होड़ में शामिल कांग्रेसी नेता ज़्यादा से ज़्यादा अपनी शक्ति और निष्ठा प्रदर्शित करना चाहिए हैं। उन्हें लगता है कि राहुल गांधी पोस्टर-बैनर और कटआउट-होर्डिंग देखकर उम्मीदवार के नाम पर ऊँगली रख देंगे।

उधर शीर्ष नेता पार्टी को जिताने की रणनीति में व्यस्त हैं और इधर स्थानीय नेता टाँग खिचौव्वल में मशगूल हो गए हैं। इनकी हरकतें निश्चित रूप से कांग्रेस पार्टी को डुबाकर ही छोड़ेंगी।