भली करेंगे, राम !

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राकेश दुबे

राम इस देश की आस्था के प्रतीक हैं, इससे सब राजी हैं | इसके विपरीत इस मुद्दे को सुलझाने की जगह इसे हवा देने का काम भी जारी है| सर्वोच्च न्यायालय में २९ अक्तूबर से इसे मेरिट के आधार पर सुना जायेगा | न्यायालय के बाहर अभी से चर्चाएँ शुरू हो गई है, सबके अलग-अलग लक्ष्य हैं,मुद्दा एक है, राम जन्म भूमि पर मन्दिर | इस मामले से समाज, न्यायालय, आस्था और राजनीति सब जुड़े हैं| लगता है कोई सर्वमान्य हल आने के पहले सरयू में बहुत पानी बह जायेगा | भाजपा ने कानून बनाकर मंदिर निर्माण का रास्ता प्रशस्त करने की बात कही थी पर, कोई सक्रियता नहीं दिखी | कल आये इस फैसले के बाद फिर राम के नाम पर गर्माहट और विरोध की गुर्राहट आमने-सामने है | ऐसे में सिर्फ एक ही बात कही जा सकती है, भली करेंगे राम |

संतों-धर्माचायों की उच्चाधिकार प्राप्त समिति की ५ अक्तूबर को दिल्ली में बैठक होने जा रही है। इसमें अयोध्या मुद्दे पर आंदोलन या कारसेवा को लेकर कोई बड़ा फैसला हो सकता है। समिति में देश के सभी प्रमुख अखाड़ों और हिंदुत्व की पीठों के प्रमुख संत शामिल हैं। पूर्व विहिप अध्यक्ष डॉ. प्रवीण भाई तोगड़िया के २१ अक्तूबर को अयोध्या कूच के एलान से उत्पन्न दबाव भी मनोवैज्ञानिक तरीके से भीतर ही भीतर काम कर रहा है| वैसे विहिप कार्यकर्ता १९८४ से अपने तरीके सेइस आन्दोलन को चला रहे हैं। आंदोलन के विविध चरण जैसे राम जानकी यात्रा, शिला पूजन, शिलान्यास, पादुका पूजन, पहली और दूसरी कारसेवा हो चुकी है।५ अक्तूबर की बैठक में जगद्गुरु शंकराचार्य वासदेवानंद सरस्वती, जगद्गुरु माधवाचार्य विश्वेषतीर्थ उडुपी, श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास, स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि, स्वामी ज्ञानानंद, स्वामी अवधेशानंद, स्वामी हंसदेवाचार्य, जगद्गुरु रामानंदाचार्य सहित अन्य कई संत हिस्सा लेंगे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी दो दिन पहले अयोध्या मुद्दे के जल्द समाधान की इच्छा जताई थी। कहा था- इससे हिंदू व मुसलमानों के बीच संबंध बेहतर होंगे और देश में तनाव खत्म होगा। उन्होंने इस पर अध्यादेश का विकल्प भी सुझाया था लेकिन यह भी कहा था कि उन्हें नहीं पता कि ऐसा संभव है या नहीं। पर, वह एक स्वयंसेवक, संघ प्रमुख और मंदिर आंदोलन के एक हिस्से के रूप में अयोध्या में जल्द से जल्द मंदिर निर्माण चाहते हैं। माना जा रहा कि उच्चाधिकार समिति की बैठक बुलाने के पीछे तोगड़िया और अन्य संगठनों का दबाव व संघ प्रमुख की इच्छा है।

नमाज, इस्लाम का अभिन्न अंग है या नहीं इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया। इस फैसले को चुनौती देने की तैयारियां तेजी और रोष में दिख रही है | एक ओर संविधान में आस्था न्यायलय के निर्णय के सम्मान की बात और दूसरी और इन तैयारियों की जमावट बेमेल हैं | विरोधाभास है | कोई कल के निर्णय का वास्तविक अर्थ समझने को तैयार नही है | सब अपने- अपने अभिप्राय लगा रहे हैं | वैसे तीन सदस्यों वाली बेंच ने बहुमत से कहा कि अयोध्या टाइटल सूट और फारूकी केस दोनों अलग मुद्दे हैं। इस मामले को ऊंची पीठ को नहीं भेजा जाएगा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि टाइटल सूट की सुनवाई मेरिट के आधार पर २९ अक्टूबर से शुरू होगी। इस्माइल फारूकी केस में फैसला पढ़ते हुए जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि इस मुद्दे पर दो विचार हैं पहला विचार जस्टिस भूषण और सीजेआई दीपक मिश्रा का है,जबकि दूसरा विचार जस्टिस नजीर का है। जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि सभी धर्मों और धार्मिक स्थलों का बराबर सम्मान होना चाहिये।उन्होंने कहा कि जिस तरह से सम्राट अशोक के शिलालेख सभी धर्मों के प्रति सद्भाव का जिक्र करता है, ठीक वैसे ही हमें भी एक दूसरे के धार्मिक विश्वासों का सम्मान करना चाहिए। जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि सर्वधर्म समभाव ही इस देश की बुनियाद है।
अभी तो न्यायालय की इस भावना और अभिप्राय को नीचे तक आना है, नीचे तक पहुंचते- पहुंचते हर बार बहुत कुछ बदलता है | इस बार वैसा कुछ हुआ तो, की आशंका सबको है |भली करेंगे, राम !