मुश्किल में मॉस लीडर…

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… राघवेन्द्र सिंह

भोपाल। अब वो जमाने लद गए जब लोग आम जनता के बीच जाकर उनके दुख दर्द कम करने के लिए संघर्ष किया करते थे। इसमें महात्मा गांधी से लेकर गांव के मुखिया तक को शामिल कर सकते हैं। अपनी जरूरतों की अनदेखी कर जो आमजन को सहयोग करे वही लीडर माने जाते थे। मगर अब दौर बदल गया है। चैंबर पालिटिक्स,फंड मैनेजर और इवेन्ट के मास्टर इस कदर सियासत पर हावी हैं। ऐसे में मास लीडर आधारहीन अचंभों के बीच अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। मध्यप्रदेश को ही देखें तो यहां कांग्रेस और बीजेपी में दो सबसे बड़े जननेता हैं। एक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह। हम ऐसे ही जननेताओं पर चर्चा करना चाहते हैं। जो जनता के बादशाह हैं मगर हाईकमान और मैनेजरों की नजरों में आंखों की किरकिरी।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह राज्य की राजनीति में अभी तक सर्वाधिक जनाधार वाले नेताओं में शुमार हैं। तेरह साल में तीन बार के मुख्यमंत्री और 15 साल की भाजपा सरकार की एंटीइंकमबैंसी के बावजूद जनता उनका आशीर्वाद यात्रा में रात दो बजे तक इंतजार करती थी। मगर भाजपा का यह मास लीडर इन दिनों एट्रोसिटी एक्ट की वजह से जनविरोध का शिकार हो रहा है। खासबात ये है कि सपाक्स की भाषा में कहें तो केन्द्र सरकार के गुनाह की सजा शिवराज सिंह को झेलनी पड़ रही है। इसमें हैरत की बात ये है कि इस पूरे मामले में वे अकेले ही संघर्ष करते दिख रहे हैं। सरकार में उनके सहयोगी और भाजपा संगठन इस एक्ट के मामले में जनता का सामना नहीं कर पा रहे हैं। इस एक्ट ने जनआशीर्वाद यात्रा में आ रही भीड़ और उससे पैदा हो रहे भाजपाईयों के उत्साह परस पानी फेर दिया है। मंत्री,विधायक,सांसद और संगठन के बड़े तुर्रम खां एक्ट की आग पर पानी डालना तो दूर उसकी तपिश को भी सहने की स्थिति में नहीं हैं। बचाव में मुख्यमंत्री का यह बयान कि मध्यप्रदेश में बिना जांच गिरफ्तारी नहीं होगी, भाजपाईयों को थोड़ी राहत देता है और केन्द्र को यह संदेश भी कि अगर एक्ट में सकारात्मक बदलाव नहीं किया तो चुनाव में भैंस पानी में चली जाएगी।
दिग्विजय सिंह को ही देखें तो उन्होंने नर्मदा यात्रा के रूप में कठिन संकल्प लिया था। भाजपा नेताओं तक ने उनकी प्रशंसा करते हुए प्रार्थना की थी कि यह धार्मिक कार्य निर्विघ्न संपन्न हो। ऐसे नेताओं में केन्द्रीय मंत्री उमा भारती,पूर्व केन्द्रीय मंत्री विक्रम वर्मा और प्रहलाद पटैल शामिल थे। विरोधों के बाद भी प्रतिपक्ष की यह सदाश्यता पाना कोई मामूली बात नहीं है। लेकिन ऐसे सव्यसाची दिग्विजय सिंह की स्थिति पार्टी के आधारहीन नेताओं के बीच अच्छी नहीं है। घटना थोड़ी पुरानी है। भोपाल में राहुल गांधी आए थे। उस कार्यक्रम में दिग्विजय सिंह की अनुपस्थिति और कटआउट में उनके फोटो के न होना खांटी कांग्रेसियों को दुखी कर गया। अलग बात है पार्टी को असहज स्थिति से बचाने के लिए दिग्विजय सिंह ने कह दिया कि उन्होंने फोटो और कटआउट के लिए खुद ही मना कर दिया था। बातचीत में वे कहते हैं कि जब मुख्यमंत्री थे तब भी बैनर पोस्टर और कटआउट से वे परहेज करते थे। इसके बाद दूसरा किस्सा व्यापम के जिन्न को उन्होंने एक बार फिर बोतल से बाहर निकाला है। सीबीआई कोर्ट में उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और कुछ आला अफसरों के खिलाफ परिवाद दाखिल किया है। इसमें 27 हजार पन्नों के दस्तावेजों का निचोड़ अदालत के सामने रखा है। उनके इस कदम से कांग्रेस जनता के बीच व्यापम को लेकर फिर सुर्खियों में है। इस मुद्दे पर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में प्रेस से चर्चा में कपिल सिव्वल,प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और विवेक तनखा ने दिग्विजय सिंह के साहस और संघर्ष की तारीफ की। लेकिन प्रेस वार्ता में परिवाद दायर करने वाले हीरो के रूप में दिग्विजय सिंह नजर नहीं आए। इसके कारण गिनाए जा सकते हैं। पहला तो ये कि वे इस मामले में कोर्ट में अपना बयान दर्ज करा रहे थे। इसलिए नहीं आ सके। लेकिन दूसरा सवाल ये है कि क्या पत्रकार से चर्चा का समय आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। यह सवाल इसलिए भी है क्योंकि जैसे ही सिब्बल,तनखा और कमलनाथ की पत्रकार वार्ता खत्म हो रही थी तभी दिग्विजय सिंह पार्टी कार्यालय में प्रवेश कर रहे थे। नर्मदा यात्रा, कार्यकर्ताओं से संपर्क और नेताओं से समन्वय के लिए अब तक लगभग जिलों की खाक छान चुके हैं दिग्विजय। इसके साथ व्यापम के मुद्दे पर भी तैयारी करना पार्टी के मुताबिक भी बड़ा काम है। लेकिन मंच से लेकर माईक तक पता नहीं दिग्विजय सिंह दूरी बना रही है या पार्टी उन्हें दूर रख रही है। दिग्विजय एक तरह से कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल हैं जो पार्टी को प्रदेश में फिर से खड़ा करने का काम कर रहे हैं। हालांकि उनके दस साल के राज में पार्टी तो ठीक प्रदेश की जो बदहाली सड़क,बिजली,पानी को लेकर हुई थी भाजपा उसे आज तक भुना रही है। ऐसे में उनका नैतिक जिम्मा भी बनता है कि वे पार्टी को फर्श से उठाकर शिखर पर ले जाएं।

अजीब संयोग है कि जिस नेता ने अपने मुख्यमंत्री रहते हुए पूर्व मुख्यमंत्रियों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा और बंगला देने का विधानसभा में जो नियम बनाया था आज वही राज्यसभा सदस्य रहते बंगले से वंचित कर दिया गया है। हालांकि यह सब सुप्रीम कोर्ट एक फैसले के चलते हुआ है। भाजपा सरकार ने अपने पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगलों का दोबारा आवंटन कर दिया है। इस सूची में नियम बनाने वाले दिग्विजय सिंह का नाम शामिल नहीं है। अब वे भोपाल प्रवास के दौरान सर्किट हाउस में कैंप करते हैं। हो सकता है आने वाले दिनों में होटलों में भी रहना पड़े। सूबे की सियासत में कड़वाहट के ऐसे दौर पहले शायद ही देखे गए हों। —