पेट्रोल-डीजल पर जनता की कराह नक्कारखाने में दबी……

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ज़हीर अंसारी

पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की दनादन बढ़ती कीमतें आम आदमी का कचूमर निकाल रहीं हैं। सरकार और पेट्रोलियम कंपनियों की होशियारी का दंश हर दिन लोगों को चुभ रहा है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में चंद पैसों की बढ़ोत्तरी करते पेट्रोल ९० रुपये और डीजल ८० रुपये के आसपास पहुंचा दिया गया है। डीजल-पेट्रोल आम आदमी की जरुरत बन गई है इसके बिना उसका काम नहीं चलता। लिहाजा आदमी कराह-कराह कर महंगी कीमतों में पेट्रोल-डीजल खरीद रहा है।
सरकार और पेट्रोलियम कंपनियां भले ही अपने बचाव में अंतर्राष्ट्रीय क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों और मजबूत होते डालर की दुहाई दे लेकिन यह दुहाई आम उपभोक्ताओं के गले नहीं उतर रही है। उपभोक्ता आज खुद को ठगा महसूस कर रहा है। ठगी का शिकार आम नागरिक दबी जुबान में उस दिन को कोस रहा है जब उसने सपनों के हिंडोले पर बैठकर ईवीएम की बटन दबाई थी।
आम जनता को मलाल इस बात का है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती दरों के खिलाफ उनकी आवाज बुलंद करने वाला अब कोई नहीं है। सत्ताधारी दल के नेताओं से सहायता की उम्मीद बेमानी है क्योंकि उनकी ही सरकारें जनता के कांधे पर महंगाई का बोझ लाद रही है। सत्ताधारी दल के नेता इस मामले में खुद की लाचारगी से ही शर्मसार हैं। शायद इसलिये पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के मुद्दे पर ऐसे चुप हो जाते हैं जैसे उनकी जिह्वा लकवाग्रस्त हो गई है। अलबत्ता विपक्षी दल के नेता कभी-कभार चीख-चिल्ला लेते हैं। मगर उनमें एकजुटता का अभाव होने और यदा-कदा हो-हल्ला मचाने की प्रवृत्ति से उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती के समान दबा दी जाती है।
जबलपुर शहर में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतें अब तक सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गईं हैं। रविवार को पेट्रोल ८८ रुपये ५५ पैसे और डीजल ७८ रुपये १२ पैसे बेचा गया। चूंकि पेट्रोल-डीजल का कोई विकल्प नहीं है इसलिये बिना चूं-चपाड़ के उपभोक्ता खरीद रहा है। तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी से उद्योग-धंधे, ट्रांसपोर्ट व्यवसाय, खेती-किसानी पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है, साथ ही नौकरीपेशा व कामकाजी लोगों की जेबें कट रही है।
जनता को सरकारों से राहत की उम्मीदें छोड़ देना चाहिये क्योंकि सरकारें मन:स्थिति बना चुकी है कि खाली खजाने को भरने के लिये डीजल-पेट्रोल पर मिलने वाली एक्साईज ड्यूूटि और वेट ही एकमात्र सीधा माध्यम है। तेल कीमतों को लेकर सरकारें अब पूरी तरह से संवेदनहीन हो गईं हैं। हो सकता है कि साल के अंत तक पेट्रोल-डीजल सौ रुपये के आसपास पहुंच जाए। भारत, अमेरिका और ईरान के बीच जिस तरह व्यापारिक और रणनीतिक गुत्थी उलझी हुई है उससे तो यही संकेत मिल रहे हैं।

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जय हिन्द
ज़हीर अंसारी