उडने वाला मच्छर… चलने वाला मच्छर…..

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ज़हीर अंसारी

हां तो बच्चों आज आपको मच्छरों के बारे में समझाया जाएगा। मच्छर दो प्रकार के होते हैं। एक उडने वाला और एक चलने वाला। उडने वाले मच्छरों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं जबकि चलने वाले मच्छर की एक ही प्रजाति और एक ही प्रवृत्ति होती है।

पहले हम बात करेंगे उड़ने वाले मच्छरों की। हिन्दुस्तान में मच्छरों की आबादी इंसानों से ज्यादा बढ़ी है। पहले गंदगी, नाले-नर्दे, पुल-पुलिया के नीचे, जलभराव वाले स्थानों के साथ खेत-खलिहान के नमी वाले और कचरे के ढेर में मिला करते थे। अब इन मच्छरों को भी बुद्धि-ज्ञान प्राप्त हो गया है लिहाजा ये अपनी औकात के हिसाब से झोंपड़ी से लेकर आलीशान मकानों में रहने लगे हैं। बच्चों आपको पता ही होगा कि उडने वाले मच्छर रक्त से अपना पेट भरते हैं। ये अपने डंक से खून चूसकर टॉक्सिन-बैक्टिरिया छोड़ जाते है जिससे इंसानों को तरह-तरह की बीमारियां हो जाती है। इनके काटने से मलेरिया, डेंगू, वेस्ट नाईल, वायरस, चिकनगुनिया, पीला बुखार, जापानी इंसेफलाइटिस, जिका बुखार/वायरस और भी कई तरह की बीमारियां प्रसारित होती हैं। मच्छरों के काटे का प्रकोप इस वक्त कमोबेश पूरे शहर में फैला हुआ है। गरीब से अमीर तक सब इसकी चपेट में आ रहे हैं।

बच्चों यहां मैं बताना चाहूंगा कि कोई चार दशक पहले तक मच्छर के काटने से होने वाली बीमारी मलेरिया से हडकंप मच जाया करता था। मलेरिया विभाग का पूरा अमला जांच-परख और रोकथाम में लग जाया करता था। मलेरिया विभाग के कार्यकर्ता घर-घर जाकर मच्छर से बचने जागरुकता पाठ पढ़ाया करते थे। स्थानीय निकाय के सफाईकर्मी मश्क में पानी लेकर नालियां साफ किया करते थे और कचड़ा आदि साफ किया करते थे। अब वक्त बदल चुका है। उडने वाले मच्छरों की तादाद और प्रजातियां मट्ठर हो गई हैं। ठीक उसी तरह जैसे चलने वाले मच्छर। चलने वाले मच्छर की चर्चा आगे की जाएगी। अभी उड़ने वाले मच्छरों से बचाव के उपाय बताये देता हूं।

हां तो बच्चों उडने वाले मच्छरों से और उनके द्वारा प्रसारित बीमारियां से बचने के लिये आपको खुद सजग रहना होगा। अपने आसपास गंदगी न करें, न होने दें, बजबजाती नालियों में खुद के पैसे से डीटीएच पाउडर या कैरोसिन डालें। फुल बांह की शर्ट पहनें, रात में मच्छरदानी लगायें। छींकते और खांसते वक्त मुंह में रुमाल लगायें। शरीर के खुले अंगों में मंहगी वाली मच्छररोधी क्रीम लगायें या नीम तेल में सरसों तेल मिलाकर घरेलू नुस्खा इस्तेमाल करें। शासन-प्रशासन के भरोसे न रहें, स्थानीय निकायों से कतई अपेक्षा न करें। इनके पास दर्जनों फागिंग मशीनें और हैंड स्प्रे हैं, लाखों रुपये का कैमिकल खरीदते हैं, पर ये सब कागजी घोडों को काटने वाले मच्छरों में इस्तेमाल ख़त्म हो जाता है।

आईये बच्चों, अब चलने वाले मच्छरों के बारे में आपका ज्ञानवर्धन करता हूं। दिखने में ये सामान्य मानव जैसे होते हैं मगर इनकी सोच-समझकर पर विशेष प्रकार का दलीय लेप लगा होता है। इस दलीय लेप के गुण-दोष के आधार पर इनका आचरण होता है। ये इंसानों की बेहतरी की दुहाई तब तक देते हैं जब तक इन्हें ’वोट डाईट’ नहीं मिल जाती। ’वोट डाईट’ मिलने के बाद इनका आचरण जंगल के बब्बर शेर जैसे हो जाता है। अपना, अपने कुनबे का और अपने दल का पेट भरने के लिये ये ‘वोट डाईट प्रोवाईडर’ को ही चूसने लगते हैं। पहले भी चलने वाले मच्छर हुआ करते थे, मगर पुरानी शिक्षा-दीक्षा के कारण इनके डंक ज्यादा नुकीले नहीं होते थे परंतु अब इक्कीसवीं सदी चल रही है। प्रगति और उन्नति के साथ डंक में भी ‘शार्पनेस’ आ गई है।

खैर, बच्चों मैं अब इन दोनों के फ़र्क़ के बारे में बताता हूं। उडने वाले मच्छर एक टाईम पर एक व्यक्ति का खून चूसते हैं। तरह-तरह की बीमारियां ‘रिटर्न गिफ्ट’ में दे जाते हैं। इनकी खासियत है कि ये व्यक्तिगत क्षति पहुंचाने में विश्वास रखते हैं जबकि चलने वाले मच्छर सामूहिक रुप से खून चूसते हैं। एकबार में हजारों-लाखों लोगों का खून निकाल लेते हैं। इनकी इस प्रवृत्ति से समुदाय, समाज और देश को घातक नुकसान पहुंचता है। इनकी जुबानों पर राम नाम होता है मगर बगल में धारदार रेजर भी रहती है। रेजर से ऐसे काटते हैं कि पता नहीं चलता, पता तब चलता है जब खून तेजी से बहने लगता है। इसलिये बच्चों यह सबकुछ अच्छे से दिल व दिमाग में डिपॉजिट कर लो। दोनों ही तरह के मच्छरों से सतर्क रहने की आवश्यकता है। उडने वाले मच्छर से जहां व्यक्तिगत क्षति होगी तो वहीं चलने वाले मच्छरों से राष्ट्र को।

जय हिन्द
ज़हीर अंसारी