हार्दिक पटेल का जादू क्या ख़त्म हो गया है

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अहमदाबाद =पाटीदार आरक्षण आंदोलन का चेहरा बनकर पिछले लगभग तीन साल में तेजी से उभरे हार्दिक पटेल धीरे-धीरे अपना असर खोते दिख रहे हैं। गुजरात की राजनीति में उथल-पुथल मचाने वाले हार्दिक ने जब बुधवार को अपना अनशन तोड़ा तो किसी राजनीतिक दल के नेता तो दूर, खुद उनके आंदोलन से जुड़े नेता भी नदारद रहे। सरकार भी किसानों की कर्जमाफी की उनकी मांग के आगे नहीं झुकी और उन्हें ‘बड़ों का सम्मान करते हुए’ अनशन खत्म करना पड़ा।
हार्दिक अगस्त, 2015 में हुई महाक्रांति रैली की तीसरे सालगिरह पर अनशन पर बैठे थे। वह एक बार फिर पाटीदारों के लिए सरकारी नौकरियों औशिक्षण संस्थानों में आरक्षण और किसानों की कर्जमाफी की मांग कर रहे थे। हालांकि, सरकार ने उनकी मांग नहीं मानी और उन्होंने यह कहते हुए अनशन खत्म किया- ‘मैं समुदाय के बड़ों के सम्मान में अनशन खत्म कर रहा हूं। अब वे मेरे साथ हैं तो मुझे किसी बात की चिंता नहीं है। मैं 19 दिन के उपवास के बाद रीचार्ज हो गया हूं और अगर जरूरत पड़ी तो, अगले 19 साल तक लड़ना जारी रखूंगा।’
हालांकि, उनके गिरते असर का अंदाजा इस बात से लग रहा था कि मुठ्ठी भर समर्थकों के अलावा बड़े नेताओं में वहां केवल नरेश पटेल और सीके पटेल मौजूद थे। लालजी पटेल, दिलीप सबवा, अतुल पटेल या दिनेश बंभानिया जैसे आरक्षण आंदोलन के बड़े नेताओं में से कोई भी नहीं पहुंचा था। यहां तक कि उपवास के दौरान भी कांग्रेस नेता हार्दिक से मिलने गए, लेकिन पाटीदार समाज ने दूरी बनाए रखी।
माना जा रहा है कि हार्दिक के खिलाफ माहौल तभी से बनना शुरू हो गया था जब 2015 में महाक्रांति रैली में उन्होंने खुद को आरक्षण आंदोलन के नायक के रूप में आगे करने की कोशिश की। उस वक्त आंदोलन के नेतृत्व लालजी पटेल कर रहे थे। वहीं, कभी हार्दिक को बीजेपी का मोहरा तो कभी कांग्रेस की कठपुतली कहा जाने लगा। गुजरात चुनाव में वह पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के कांग्रेस से दूर रहने के फैसले के खिलाफ चले गए। यहां तक कि अहमदाबाद के एक होटेल में तत्कालीन भावी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मिलने के बाद ब्रीफकेस लेकर बाहर निकले हार्दिक पर लोगों का शक गहरा होता गया।
हालांकि, हार्दिक की छवि को सबसे ज्यादा नुकसान तब पहुंचा जब गुजरात चुनाव से ठीक पहले उनकी सेक्स सीडी + सामने आई। उन्होंने ‘कुछ गलतियां’ करने की बात तो मानी लेकिन तब तक भारी नुकसान हो चुका था। उनकी ही पार्टी के नेताओं ने ही उनसे राहें अलग कर लीं।
इन सबके सबके अलावा गुजरात के विरंगम में दो कमरे के घर से निकल अहमदाबाद के फ्लैट में पहुंचे हार्दिक जब खुद फॉर्च्यूनर गाड़ी में चलने लगे तो लोगों में यही संदेश गया कि वह अपना रास्ता भटक गए हैं। आरक्षण आंदोलन को भूल वह खुद के बारे में ध्यान देने लगे हैं। रही बची कसर बहन की शादी पर खर्च किए लाखों रुपयों ने पूरी कर दी, जिसे उन्होंने ‘किसी भी भाई का फर्ज’ बताया था। हालांकि, हाल ही में उनकी वसीयत से उनका बैंक बैलेंस 50,000 रुपये दिखता है।