व्यंग = मच्छरों के लिए भी होना चाहिए नसबंदी क़ानून….

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ज़हीर अंसारी

इस वक़्त शहर ही नहीं प्रदेश में वायरल का प्रकोप चल रहा है। तरह-तरह के बुखार से आमजन ग्रसित हैं। कोई मलेरिया, कोई डेंगू, कोई चिकिनगुनिया तो कोई जैपनीज़ बी बुखार से पीड़ित है। कईयों को तो हाई प्रोफ़ाइल बीमारी गुईल्लीयन बैरी सिंड्रोम (जीबीएस) हो रहा है।

शहर में तो वायरल महामारी की तरह फैला हुआ है। हर घर पीछे एक घर का सदस्य वायरल बुखार का मज़ा चख चुका है या चख रहा है। अगर बचा है तो उसे भी वायरल स्वाद चखना पड़ेगा। महीनों से शहर के अख़बार और टीवी स्क्रीन बता रहे हैं कि शहर वायरल के जबरजस्त चपेट में है। अस्पतालें और दवाखाना मरीज़ों से ऐसे पड़े हैं जैसे कभी आवारा जानवरों से काँजी हाउस पटे रहते थे। यह मान सकते हैं कि बंद हो चुके काँजी हाउसेस का स्वरुप बदल गया है। नए मोडेल के काँजी हाउस में पशु मान लिए गए इंसानों का इलाज मोटी रक़म वसूल कर किया जाता है। सरकारी काँजी हाउसेस में पशुओं को मुफ़्त चारा-पानी मिल जाता था मगर इंसानी काँजी हाउस में कुछ भी फ़्री नहीं है।

छोड़िए, बात शहर में फैली वायरल रूपी महामारी की हो रही थी। कई तरह के वायरल फ़ीवर ने आधे शहर के लोगों की जेबें ख़ाली कर दी। डाक्टर, अस्पताल और दवा कम्पनियों की जेबें लबालब हो गई। इन सब बातों से बेपरवाह स्थानीय जनप्रतिनिधि और प्रशासन अपने रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हैं।

दिल्ली-भोपाल जब वायरल महामारी की ख़बर पहुँची तो विशेषज्ञों की टीम दौरा करने जबलपुर आई। टीम ने दौरा करने के बाद पाया कि जबलपुर डेंजर ज़ोन में है। शहर में डेंगू और चिकिनगुनिया का संक्रमण फैला हुआ है। टीम ने इन संक्रमणों की रोकथाम के उपाय में माथापच्ची शुरू कर दी है।

अब सवाल यह उठता है कि शहर में ऐसा क्या हुआ कि अचानक से वायरल ने जबलपुर जैसे अतिविकसित शहर को अपनी चपेट में ले लिया। सब यही कहेंगे कि गंदगी इसका मुख्य कारण है। नाली-नर्दा, कुलिया-पुलिया साफ़ नहीं हो रही है। ये सब फ़ालतू बातें हैं। ज़िंदगी बीत गई कचड़ा-कूडा और गंदगी में रहते। पहले भी मच्छर होते थे अब भी हो रहे हैं। फ़र्क़ इतना है कि अब के मच्छर ज़रा एडवांस और स्मार्ट हैं। देश-दुनिया की डिजिटल तकनीक से वाक़िफ़ हैं। इनमें प्रजनन क्षमता भी ग़ज़ब बढ़ी है। आज के मच्छर हम दो हमारे दो के फ़ार्मूले पर विश्वास नहीं करते, नसबंदी क़ानून से भी नहीं डरते। मच्छरों के लिए मानव निर्मित गंदगी, नाली, गटर, गड्ढों में जमा दूषित पानी, सीवर पाइप में भरा सड़ा पानी, सुअर, कुत्ता और सड़कों पर घूमते पालतू पशुओं का मल-मूत्र आज के मच्छरों के लिए अमेरिकन व्याग्रा का काम कर रहा है। इंसानों से ज़्यादा इनकी आबादी बढ़ रही है। इनकी बढ़ोत्तरी से महँगाई, पेट्रोल-डीज़ल और सेंसेक्स की उछाल भी पानी-पानी हो रही है।

इन एडवांस और स्मार्ट मच्छरों से निपटने के लिए गंदगी-वंदगी का बहाना बेकार है। गंदगी और हमारा नाता पुराना है। गंदगी फैलाना हमारा जन्मसिद्ध और मौलिक अधिकार है इसलिए मच्छरों की तादाद रोकने के लिए नसबंदी जैसा क़ानून ज़रूरी हो गया है। या फिर कोई ऐसा वैज्ञानिक पैदा किया जाए जो नर मच्छर के लिए कंडोम और मादा मच्छर के लिए रोज़ खाए जाने वाली पिल तैयार करे। अगर ऐसा नहीं हुआ और हम सिस्टम पर निर्भर रहे तो वो दिन दूर नहीं जब हमारा जीना दूभर हो जाएगा।