अब क्या देश में हो रहा बहुसमाज का तुष्टिकरण…

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संजय साहू

वोट बैंक की राजनीति ने देश को गर्त में धकेल दिया है। अनुसूचित जाति/ जनजाति से लेकर मुस्लिमों तक तुष्टिकरण की राजनीति होती रही है। यही कारण है कि आजादी के 70 साल बाद भी भारत की दशा और दिशा में वह सुधार नहीं हो पाया है जो अन्य देशों में देखने मिल रहा है। आज भी भारतीय संस्कृति को संकीर्ण मानसिकता का परिचायक बताया जाता है। वहीं पश्चिमी सभ्यता को लोग गले लगाकर अंगीकार कर रहे हैं, आज विदेशी भाषा इतनी प्रिय हो गई है कि बिना इसके सरकारी कामकाज तक नहीं हो पा रहा है जबकि देश की अपनी ही भाषा अपने आपको अपमानित महसूस कर रही है, लेकिन अब देश का युवा जाग रहा है। इसी का परिणाम है कि 70 सालों से आरक्षण जैंसे गंभीर मुद्दे का दंश झेल रहे सवर्ण और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगोें का आक्रोश 6 सितंबर को फूट पड़ा। हालांकि यह आक्रोश पूरी तरह शांतिपूर्व माना जायेगा, क्योंकि जिस प्रकार की मानसिकता का परिचय देकर एट्रोसिटी एक्ट लाने में केन्द्र सरकार द्वारा जल्दबाजी दिखाई है, वह एक अपरिपक्व सरकार की कहानी बयां कर रही है।
केन्द्र सरकार द्वारा जिस प्रकार अनुसूचित जाति / जनजाति के वोटों की खातिर देश के सर्वोच्य न्यायालय के आदेश की अवहेलना की है, वह सर्वविदित है। इसके कुछ दिन के बाद ही एट्रोसिटी बिल का लाना संसद में सभी पार्टियों द्वारा खामोशी से स्वीकृति प्रदान करना, इनकी मानसिकता को बता रहा था। देश का 75 फीसदी सवर्ण और अन्य पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति फिर चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का क्यों न हो सभी अपने आप को आहत महसूस कर रहे थे।
बंद की सफलता से सहमी सरकार
6 सितंबर को बिना किसी नेतृत्व के भारत बंद की मिली अभूतपूर्व सफलता को देखकर केन्द्र और राज्य की सरकार मंथन में जुट गई। एट्रोसिटी बिल से हो रहे नुकसान की भरपाई करने नेताओं की फौज को उतारा जा रहा है। हालांकि अब देर हो चुकी है। जो भी नेता सवर्णां और ओबीसी समाज को मनाने जायेगा वह मुंह की खायेगा। क्योंकि अब यह सामाजिक नहीं देशव्यापी तुष्टिकरण को लेकर आंदोलन बन चुका है।
विधानसभाओं के परिणाम बतायेगें
जानकारों की माने तो बंद का असर इस साल दिसंबर में होने जा रहे तीन राज्यों के विधानसभाओं के चुनावों में देखने मिलेगा। सरकार के प्रति आम जन का आक्रोश यही बता रहा है कि अब आर या पार की लड़ाई लड़ी जायेगी। क्योंकि बीते 70 सालों से आरक्षण और इस बिल का दंश झेल रहे लोगों में इस बार जो आक्रामकता नजर आई है, उससे स्पष्ट है कि अगर सरकार अभी भी नहीं चेती तो अगामी विधानसभा चुनावों में इसका असर साफ दिखाई देगा।
सवर्ण ओबीसी वर्ग आया साथ
राजनैतिक के जानकारों का कहना है कि जिस प्रकार कांग्रेस द्वारा वर्षों से अनुसूचित जाति/ जनजाति के साथ मुस्लिमों की राजनीति की जाती रही है, उसी राह पर अब भारतीय जनता पार्टी भी चल निकली है। भाजपा का दलित प्रेम उसके पतन का कारण बन जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि पूर्व से भाजपा को सवर्ण और ओबीसी समाज की पार्टी माना जाता रहा है। हालांकि पार्टी के शीर्ष नेताओं ने कभी भी दलित या आदिवासी समूह को उपेक्षित भी नहीं किया है। यही कारण है कि देश भर का हिन्दु भाजपा की पनाह में चला गया था लेकिन जिस प्रकार से तुष्टिकरण कर दलित समूह को ज्यादा सम्मान और अन्य समाज के अपमान से पूरा देश में खलबली मची हुई है। ऐंसे में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का बयान की एट्रोसिटी एक्ट के विरोध का कोई असर नहीं उनका बड़बोलापन दर्शा रहा है। बहरहाल अगामी दिनों में स्थिति जो भी बने परंतु फिलहाल सवर्ण और ओबीसी समाज में राजनैतिक दलों के प्रति आक्रोश स्पष्ट दिखाई दे रहा है।