बदहाली से जूझती स्मार्ट सिटी……

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ज़हीर अंसारी

सरकारी काग़ज़ातों में जबलपुर स्मार्ट सिटी के रूप में जाने जाना लगा है। वक़्त-बेवक्त भाषणों में इस बड़े क़स्बे को स्मार्ट या महानगर के रूप में पुकारा जाता है और चुनाव के टाइम पर पुचकारा जाता है। जो शहर ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्य दृष्टिकोण से कभी काफ़ी महत्वपूर्ण हुआ करता था, आज वही शहर राजनीतिक नज़रिए से हाशिए पर है। सिर्फ़ वोटों की मण्डी बनकर रह गया है। चुनाव के वक़्त ही इस मण्डी में बोली लगाई जाती है और ऊँचे दाम (सम्पूर्ण और आधुनिक विकास की बात) लगाए जाते हैं। चुनाव जाते ही इस शहर के मतदाताओं की वही स्थिति कर दी जाती जैसे मदक्की की होती है। मदक्की नशे के लिए जब चिल्लाता है तो मादक पदार्थ की एक पुडीया पकड़ा दी जाती है ताकि मदक्की चुप जाए। ठीक वैसे ही एकाध झुनझुना आम जनता को पकड़ा दिया जाता है ताकि उसका मुँह उतना ही खुले कि जीभ बाहर न निकल सके।

पिछले एक महीने से शहर की ज़्यादातर आबादी मच्छरजनित बीमारी से ग्रसित है। अस्पतालों और डाक्टरों के यहाँ मरीज़ों का जमघट लगा हुआ है। चिकिनगुनिया, डेंगू, जैपनीज़ बी और जीबीएस बीमारी का प्रकोप फैल गया है। अब तक कई जाने जा चुकी है।

जिले की सड़कों के हाल बेहाल है। गड्ढों से पटी पड़ी है। आम लोगों का चलना दूभर है। आए दिन दुर्घटनाएँ हो रही है। कथित आवारा जानवरों का साम्राज्य सड़कों पर दिखाई पड़ता है। जानवरों के मल-मूल का कोई समाधान नहीं है। नालियाँ की सफ़ाई, डीटीएच पाउडर छिड़काव और फागिंग मशीन का निकलना बंद हो चुका है। ये हालात शहर के किसी विशेष हिस्से के नहीं बल्कि समूचे शहर के हैं। कल तक तो पुरानी, पिछड़ी और घनी आबादी समस्याओं और सुविधाओं का रोना रोया करती थी तो पॉश कालोनी और स्मार्ट सिटी क्षेत्र में रहने वाले सभ्य लोग अव्यवस्थाओं और प्रशासनिक लचरता का दुखड़ा सुनाने लगे हैं। यहाँ तक के सत्ताधारी दल के नेता और कार्यकर्ता भी कसमसाने लगे हैं। असंगठित कांग्रेस के कानों में जबलपुर की समस्याओं को लेकर जूँ तो रेंग रही है मगर एकजुटता के अभाव में बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पा रही है।

इस सबके बावजूद शहर की सहनशील आबादी ख़ामोशी से सब झेल रही है। अपनी आँखों से देख रही है कि उसकी गाढ़ी कमाई कैसे लुटाई जा रही है। सीवर लाईन, स्टॉर्म वाटर, स्वच्छता और स्मार्ट सिटी आदि के नाम पर अब तक कई सौ रुपए फूँक डाले गए, लेकिन नतीजा वही ढाँक के तीन पात। अब तो ऐसा लगता कि 12-13 लाख आबादी वाले शहर की सुध लेने वाला कोई नहीं है, सब अपना उल्लू सीधा करने में व्यस्त हैं।