विकास का प्रथम मापदंड महिला सुरक्षा ………..

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विवेक कृष्णा तन्खा

आजकल मैं सुबह का अखबार भी बड़े अनमना सा उठाता हूं। आज प्रदेश की जनता की आवाज में यह कैसा दर्द है, यह कैसी कराह है, ना जाने इस देवभूमि को किसकी नजर लग गई। आये दिन कहीं न कहीं हत्या एवं हैवानियत की घटनाऐं जैसे आम बात हो गई है। कल जबलपुर में हुई पांच वर्ष की मासूम से दुष्कृत्य के बाद निर्मम हत्या एवं उसे हत्या के पश्चात गटर में फेंक देने जैसे घिनोने कृत्य ने मुझो अन्दर तक हिला कर रख दिया है। इसके पूर्व भी मध्यप्रदेश मे सतना में चार वर्ष की मासूम से हैवानियत एवं इसके पूर्व मंदसौर में अबोध बच्ची के साथ और इंदौर में नन्हीं सी बालिका के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या की दिल दहलाने वाली घटना लगता है जैसे कानून कहीं सो गया और नैतक मूल्य तो अंतिम शैयया पर चले गए। ऐसे भय एवं आतंक के बादलों से हमारा समाज आतंकित है और शर्मसार होने की सीमा समाप्ति की ओर है। लगता है कि कही मध्यप्रदेश की पहचान देश में “रेप केपिटल” के रुप में प्रचारित न होने लगे। यहां यह संवाद करते हुए एक अजीब सी ग्लानी होती है कि प्रदेश में हर दिन औसतन 15 महिलाओं, अबोधों बालिकाओं, कन्याओं के साथ अत्याचार होता है। हमारे नौनिहालों की रक्षा, सुरक्षा एक चिंतनीय विषय बन चुका है। नैतिक मूल्यों के विषय में चर्चा करना वर्तमान परिदृश्य में लाजिमि है?
मुझे याद है कि आज से लगभग डेढ़ दशक पूर्व प्रदेश के वरिष्ठ एवं लोकप्रिय नेता जो आज हमारे बीच नहीं है, उन्होंने भारतीय सेना में अपनी सेवायें दी थी। वो मुझसे बार-बार कहा करते थे कि “मैं मध्यप्रदेश को उस दिन सुरक्षित मानूंगा जिस दिन हमारी बेटियां सुशिक्षित होकर अच्छे गहनों एवं वस्त्रों के साथ निर्भिक होकर समाज में रह सकेंगी। किंतु क्या यह आज संभव है? एनसीआरबी के आकड़ों के अनुसार 2017 में प्रदेश में अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा दुराचार के मामले दर्ज किए गए है, उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कुल 5310 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए है, विगत वर्ष भी अन्य राज्यों की तुलना प्रदेश इस प्रकार के अपराधों की सूची में अव्वल रहा है। अभी हाल ही में जबलपुर जिले के गोरखपुर इलाके में भी चौदह वर्षीय नाबालिग के साथ पांच लोगों ने जो दुराचार किया, इन घटनाओं से मैं स्तब्ध हूं। मेरे सोचने समझने की शक्ति विलोप होने लगी है।

आज हमारे देश की कुल आबाद का लगभग 48 फीसद एवं मध्यप्रदेश की भी कुल आबादी का लगभग 48.5 फीसद महिलायें है, फिर भी समाज के इस बड़े हिस्से की सशक्तिकरण की दरकार क्या है? क्यों आज भी हमारे देश की एवं प्रदेश की मातृशक्तियां सुरक्षित नहीं है? मुझे याद है कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरु कहा करते थे कि यदि समाज की जगाना है तो महिलाओं का जागृत होना जरुरी है, एक बार अब वो अपना कदम उठा लेती है तो परिवार, परिवार के साथ समाज आगे बढ़ता है, गांव आगे बढ़ते है, प्रदेश आगे बढ़ता है एवं राष्ट्र विकास के पथ की ओर अग्रसर हो जाता है। भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुरुप महिलाओं की पुरुषों के सामान ही हर क्षेत्र बराबरी का हक है, अधिकार है, क्या आज भी समाज में महिलाओं की बराबरी का दर्जा प्राप्त है…? हमें अपने विचारों एवं सोच पर चिंतन करने की आवश्यकता है महिलायें तभी सुरक्षित होंगी जब वह सुशिक्षित, जागृत एवं अपने अधिकारों के लिए सामने आकर उनको पाने के लिए तत्पर रहेंगी। मां यदि सशक्त है सामाजिक ढांचे में मां अबला नारी के रुप में नहीं, वरन एक शक्ति के रुप में अपनी पहचान की सिद्ध करने में सफल हो जाएगी तो परिवार, समाज सुरक्षित रह सकेगा।
अगर बीते समय की बात करु तो हमारे घर में हमारी मां इस बात से खुश थी की वो अपने पति की परछाई थी, यह सुपरिचित है की काश्मीरी पीड़ितों के परिवार में लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान ओर प्राथमिकता दी जाती है, अच्छी शिक्षा के बावजूद भी हमारी मां पर के दमन में खुश थी, मगर आज मेरी बेटी इस बात के लिए तैयार नहीं है कि वो अपनी जिंदगी मात्र घर गृहस्ती चैनल में व्यतीत कर दे, उसे कहां पढ़ना है, देश में या विदेश में यह सारे निर्णय उसने स्वयं लिए, कहां उसको नौकरी करनी है यह उसकी अपनी सोच थी, मैंने और मेरी पत्नी आरती ने उसे हर कदम पे मात्र समर्थन और मार्गदर्शक दिया है, मगर पूर्णत: मेहनत और सोच मेरी बेटी की थी, और इसका नतीजा यह रहा कि आज वह एक वैश्विक वित्तीय सेवा फर्म मॉर्गन स्टेनली जिसका मुख्यालय न्यूयॉर्क शहर, अमेरिका में है के साथ काम कर चुकी है और अब कैलिफोर्निया में पेपाल के साथ सिलिकॉन बैली में काम कर रही है वो सिलिकॉन बैली में विश्व की सर्वश्रेष्ट कम्पनियों के सीईओ और स्फो की फाइनेंसियल मार्किट की सलाह मशवरा करती है।
सच तो यह है कि आज के दौर की नारियां हमारी बेटियां एक नये परिवर्तन के दौर में है, आज हमको यह परिवर्तन समझना भी होगा और स्वीकार भी करना पड़ेगा, समाज लड़कियों की अब दबा नहीं सकता, आज हमारी हर बेटी की अपनी एक अलग पहचान है वे किसी मायने में लड़कों से कम नहीं हैं, और जब तक हर परिवार में यह सोच जागरुक नहीं होगी तब तक हमारा प्रदेश तरक्की कर ही नहीं सकता। हमें तो सिर्फ उनके लिए साधन बनाने हैं शेष वो खुद अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से प्राप्त कर लेगी, यह वहीं प्रदेश है जहां रानी लक्ष्मीबाई, रानी अहिल्या बाई, सुभद्रा कुमारी चौहान, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, लगा मंगेशकर और कई अन्य महिलाओं ने जन्म लेकरहमारे प्रदेश का नाम गौरान्वित किया और विश्व में अपनी एक अलग पहचान बनाई।
विषय यहां सामाजिक जागरुकता, चैतन्यता का भी है, अपनी सुरक्षा के साथ-साथ समाज में फैली उन मनोविकृति को नियंत्रण में रखना जरुरी हो गया है, जिसके कारण इस प्रकार की घटनाएं जन्म लेती है। आज महिलाएं किसी भी मायने में अपने पति या भाई से कम नहीं है, वे उनसे बेहतर काम कर सकती है और एक बेहतर परिणाम दे सकती है।
(लेखक मध्यप्रदेश से राज्य सभा सांसद एवं सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता है एवं पूर्व में भारत के अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल एवं प्रदेश के महाधिवक्ता रह चुके हैं)