शादीशुदा महिलाओं का अधूरा टारगेट…….?

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ज़हीर अंसारी
आज गाँव में काफ़ी चहल-पहल थी। कई जगहों पर लाउड स्पीकर बँधे हुए थे। राष्ट्रभक्ति के गीत फ़ुल वाल्यूम में बजाए जा रहे थे। गाँव की स्कूल में बच्चों का जमघट रहा। चूँकि आज स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था इसलिए गाँव के सरपंच और पंच साफ़-सुथरे कपड़े में पहुँचे थे। ग़ैर स्कूली बच्चे स्कूल की चहारदीवारी के बाहर हल्ला-गुल्ला करते खेल-खिलवाड़ कर रहे थे।

चंद क़दम दूर आम के पुराने दरख़्त पर रस्सी का झूला डला था। बच्चियाँ भविष्य की चिंता से विमुक्त झूले में लम्बी-लम्बी पेंगे मार रही थीं। उनके मासूम चेहरे ख़ुशियों से सराबोर थे। ऐसा लग रहा था मानों उन्हें दुनिया-जहान की दौलत मिल गई हो। सावन की हरियाली के बीच बच्चियों का चहकना और खिलखिलाना और छोटे बच्चों का उछल-कूद करना आज़ाद हिंदुस्तान की कहानी कह रहा था। सब में आज़ादी को लेकर भारी उत्साह था, यद्यपि वे सब इस आज़ादी के पीछे की दास्तान और कुर्बनियों से अब तक बेख़बर हैं।

पेड़ की मोटी जड़ के पास आपा और दीदी ज़मीन पर दरी बिछा कर बैठी बतिया रही थीं। दोनों क़रीब-क़रीब हमउम्र थीं। साथ खेलीं, साथ पढ़ी, और शादी भी लगभग साथ हुई। आपा का निकाह उत्तर की तरफ़ हुआ तो दीदी का पूरब की तरफ़। दोनों की शादी के बाद यह चौथा इत्तेफ़ाक था कि दोनों अपने मायके एक ही वक़्त आई थीं। दोनों की बचपन से अच्छी घुटती थी, वही सखी प्रेम अब तक दोनों में बना हुआ था। हालाँकि दोनों सखी दसवीं तक ही पढ़ीं थी मगर उनकी सोच-समझ आला दर्जे की थी। घर-गृहस्थी की तमाम जिम्मेदारियाँ लगभग पूरी हो चुकी थी, फिर भी दोनों ख़ुद को आज़ाद महसूस नहीं कर पा रही थीं।

दोनों की बातों का लब्बोलुआब यह रहा कि आज़ादी के बाद बेशक नारी जात की शिक्षा-दीक्षा बेहतर हुई हैं। बेटियाँ तरक़्क़ी के सोपान चढ़ी हैं। खेल से लेकर शासन-प्रशासन तंत्र में धाक जमा रही हैं। इस सबके बावजूद पुरुष प्रधान समाज में उन्हें वो अहमियत और सम्मान नहीं मिल रहा है जिसकी वह हक़दार हैं। समानता के तराज़ू पर अभी भी उनका पलड़ा हल्का ही है। रही बात घरेलू औरतों की तो वे आज भी सीमित दायरे में ही हैं। पुरुषों के जैसी स्वतंत्रता अभी भी महिलाओं के लिए दूर की कौड़ी है। शादी-शुदा महिलाएँ अभी भी पिंजड़े में क़ैद तोते की तरह हैं जिन्हें बोलने की आज़ादी तो होती पर मगर कुतरने और उड़ने की आज़ादी नहीं है।

आपा और दीदी अपनी गपशप पूरी करके उठने लगी तो पेड़ की आड़ में बैठी बुज़ुर्ग महिला ने धीरे से कहा कि हमारी सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी है कि जब तक बेटियाँ घर में रहती हैं सरकारी नौकरशाहों की तरह आज़ाद रहती हैं और जब सुसराल चली जाती हैं तो प्रायवेट नौकर की तरह हो जाती हैं। कितना भी मेहनत कर ले, कितना ही सबको खुश रखे लेकिन कभी टारगेट पूरा नहीं होता..!!! इसलिए वह ग़ुलाम की ग़ुलाम रहती है।