परसाई जी की आत्मा से एक मुलाक़ात……

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ज़हीर अंसारी
ख्यात साहित्यकार स्व. हरिशंकर परसाई की शुक्रवार को पुण्य तिथि थी। लिहाज़ा उनका स्मरण आना स्वाभाविक था। सो उनके साहित्य को पलट रहा था। उनका लिखा व्यंग्यात्मक कटाक्ष ‘दो नाक वाले लोग’ पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते नींद आ गई। गहरी नींद में देखता हूँ कि परसाई जी आत्मा मुझसे रुबरू है। उनकी आत्मा ने कहा कि ‘दो नाक वाले लोग’ की बात बहुत पुरानी हो गई है। अब ‘दो मुँह वाले लोगों’ का बोलबाला है। जिनकी ख़ासियत यह है कि इनके दोनों मुँहों में दो ज़ुबान है। एक जो देखने में सीधी है और दूसरी ‘रिवर्स जीभ’ जो किसी को नहीं दिखती। ‘रिवर्स जीभ’ शातिर कमाल करती है। सीधी वाली ज़ुबान मीठी-मीठी, बड़ी-बड़ी, जन और राष्ट्र हितैषी शब्दों को उगलती है। इसकी मिठास और सत्यता पर कोई भी ‘लिमिटेड बुद्धि’ वाला लट्टू हो जाता है। लट्टू होकर जयकारे गुंजायमान करने लगता है। यहाँ तक ऐसे लोग ‘रिवर्स जीभ’ वालों को एक तरह से अपनी आस्था का प्रतीक मान लेते हैं। ‘रिवर्स जीभ’ वालों का विरोध करने पर ‘लिमिटेड बुद्धि वाले लड़ने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। हालाँकि इसमें इनका कोई दोष नहीं है। इनको दवा ही ऐसी पिलाई जाती कि ये ‘अनलिमिटेड बुद्धि’ वाले न बन जाए। तुमने ग़ौर किया होगा घोड़े के कंपटी पर मोहरा पहनाया जाता है ताकि घोड़ा दाएँ-बायें न देख सके। सिर्फ़ चाबुक मारने वाले की मंशानुसार आगे देखकर दौड़ता-भागता रहे। घोड़े को भागने और अपनी खुराक से मतलब होता है। क्यों और कहाँ भागना है, इसकी समझ घोड़े को नहीं होती। यही स्थिति आजकल ‘लिमिटेड बुद्धि’ वालों के हैं। उन्हें आश्वासन रूपी हरा-हरा चारा मिल रहा है, वह इसी में गदगद हैं। ‘रिवर्स जीभ’ उनके भविष्य के सपनों को कुतर रही है। इंसानियत बँट रही है, बच्चियों और महिलाओं के साथ हो रहे दुराचार है, इस पर चिंतन करने की फ़ुर्सत उन्हें नहीं है।

परसाई जी आत्मा पास बैठते हुए बोली। जो लोग ‘लिमिटेड बुद्धि’ वालों को जगाने की कोशिश कर रहे हैं वो सब नासमझी कर रहे हैं। मैंने ‘लिमिटेड बुद्धि’ वालों को सदमार्ग बताने का ख़ूब प्रयास किया। रूढ़िवाद छोड़ने और सामाजिक विषमता त्यागने का सबक़ पढ़ाया। मानवीय मूल्यों की दुहाई दी। विज्ञान सम्मत दृष्टिकोण बताए। फिर भी ‘लिमिटेड बुद्धि’ वालों के ‘ऊपरी तल’ पर कुछ न ठहरा क्योंकि उनके ऊपरी तल के फ़्लोर पर डबल पालिश विटरीफ़ाईड टाइल्स लगी है। ज्ञानवर्षा होते ही सटाक बह जाता है।

परसाई जी की आत्मा लौटने को उठी। उठकर कहने लगी.. सुनो बच्चा पते की बात। देश के जो राजनीतिज्ञ हैं वो सबके सब स्पेशल मिट्टी। के बने हैं। इनके ऊपर सिर्फ़ और सिर्फ़ वोटों की चिकनाई थमती है। वोट की ख़ातिर धर्म बटे, समाज बटे, जाति बटे, उप-जाति बटे, स्त्री-पुरुष बटे, इसमें ही नेताओं और जनप्रतिनिधियों को सुकून मिलता है। बीसवीं सदी के सियासतदाँ आज के सियासतदाँ से काफ़ी क़ाबिल थे, दूरदर्शी सोच-समझ के मालिक थे तब वे इस बटे-बँटाई को रोक नहीं पाए तो अब के रहनुमा किस खेत की मूली हैं। पब्लिक में ‘लिमिटेड बुद्धि’ वाले बहुत हैं, अब नेताओं की जमात में भी ‘लिमिटेड बुद्धि’ वालों की भरमार हो गई है। जो घोड़े बनकर, मोहरा पहनकर सियासत कर रहे हैं। मालिक की चाबुक पर भागे-दौड़े जा रहे हैं। मालिक मलाई खा रहा है और ये खुरचन में संतुष्ट हैं। रही बात अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की तो वो कल जहाँ था, आज भी वहीं है और कल भी वहीं रहेगा। शायद उसका प्रारब्ध ही दोषपूर्ण है।

आत्मा आगे बोली, जाते-जाते मैं तुम सब लोगों को एक सीख दिए जा रही हूँ। देश को, धर्म को, समाज को, वर्ग को, सियासत को, रहनुमाओं को, व्यवस्था को सुधारना चाहते हो तो ख़ुद को समझ लो। जिस दिन आम आदमी अपनी हैसियत समझ लेगा सब समस्याओं का समाधान मिल जाएगा। ‘लिमिटेड बुद्धि’ वाली कम्पनी से निकलकर ‘अनलिमिटेड’ बुद्धि वाले ग्रुप को ज्वाइन कर लें, तभी देश और देश की सियासत को समझ पाएँगे और दो मुँहधारी वाले लोगों की ‘रिवर्स जीभ’ के डंक से बच पाएँगे।

यह सीख देते हुए परसाई जी आत्मा फुर्र हो गई।