‘नारी’ नाम दिल-दिमाग़ पर फिर भी आबरू की लूट…………

0
93

ज़हीर अंसारी

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर और उत्तर प्रदेश के देवरिया के बालिका गृह की घटनाएँ देश को शर्मसार करने वाली सूची में दर्ज हो गई। इन बालिका गृह में बच्चियों के साथ क्या-क्या हुआ अब यह जगज़ाहिर हो चुका है। किस तरह सफ़ेदपोशों ने बच्चियों के कौमार्य को तार-तार किया है, यह सुनकर रोंगटे खड़ा होना स्वभाविक है। हो सकता माताएँ यह घटना सुनकर माता होने पर ग्लानि महसूस कर रहीं हूँ। लेकिन क्या कीजिएगा हमारा समाज ही पुरुष प्रधान है, जहाँ पुरुषों को नैतिक-अनैतिक कार्य करने की तब तक छूट रहती है तब तक क़ानून का शिकंजा ऐसे पुरुषों के गले तक नहीं पहुँचता। ऐसे लोगों पर जब क़ानून अपना पंजा मारता है तो हमारे सियासतदाँ उन्हें बचाने पर्दे के पीछे से सक्रिय हो जाते हैं। दिखावे के लिए सार्वजनिक रूप से एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप मढ़कर जनता को गुमराह करते हैं। कुछ दिन मामला गर्माया रहता है फिर न्याय की मंथर गति में सब कुछ भुला दिया जाता है।

मुज़फ़्फ़रपुर और देवरिया की घटना अचानक सामने नहीं आई। पहले भी बालिका शोषण की बातें यदाकदा शासन-प्रशासन के कानों तक पहुँचती रही मगर रसूखदारों की वजह से अनसुना कर दिया जाता रहा है।

यह वही देश हैं जहाँ क़दम-क़दम पर नारी सम्मान की बात कही जाती है। नारी नाम पुरुष की ज़ुबान पर हर स्थिति-परिस्थिति में रहता है। ‘उषा’ (सुबह) से ‘संध्या’ (शाम) तक ‘लक्ष्मी’, ‘सरस्वती’, ‘विद्या’ और ‘अन्नपूर्णा’ (भोजन) के लिए भागमभाग करता है। ‘शांति’ (सुकून) की तलाश में भटकता है। यही पुरुष जब ‘पूजा-वंदना’ के लिए खड़ा होता है तो गायत्री देवी, पार्वती माँ और दुर्गा जी का स्मरण कर अपनी और अपने परिजन की ‘रक्षा’की ‘अर्चना’ करता है। बाल-बच्चों को चोट लग जाए या बीमार पड़ जाएँ तो ‘करुणा’ और ‘ममता’ से भर जाता है।

लेकिन जब कतिपय पुरुषों पर वहशीपन सवार हो जाता है वह इन तमाम नामों को जो हर वक़्त उसके दिल-दिमाग़ में कौंधते हैं, को भूलकर राक्षसी स्वरुप धारण कर लेता है। तब वह धर्म, नैतिकता और मर्यादा का आवरण उतारकर पिशाच बन जाता है और मजबूर, ग़रीब और बेसहरा बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाने में तनिक संकोच नहीं करता।

मुज़फ़्फ़रपुर और देवरिया जैसी घटनाओं पर समाज को लज्जित होना पड़ता है। ऐसे पिशाचों को मातृशक्ति से तब तक कोड़े मरवाना चाहिए जब तक उनके प्राण न निकल जाएँ।

O