” पादुका ” पुराण………..

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मदन गोपाल गर्ग

हे चरण – पादुका आपको नमन । आपकी महिमा अपरंपार है । आप विश्व में अनेकानेक रूपों एवं नामों से विद्यमान हैं । आप पुरातन युग में ‘ पनहीं ‘ के रूप में प्रतिष्ठित हुए । बाद में आप कहीं जूता बन अवतरित हुए तो कहीं शू । कभी आप चरणों में स्थान पाते हो तो कभी सिंहासन पर विराजित होते हो । कभी सिर पर बैठ अपमान का दंश देते हो तो कभी पीठ पर वार कर प्रताड़ित करते हो । कभी आप पूजनीय हो तो कभी प्रतिशोध का चिन्ह । कभी आप सर्वसुलभ हथियार हो तो कभी गले का हार हो ।
चरण-पादुकाएँ सदा चर्चा का पात्र रहीं हैं । इनका प्रादुर्भाव कब हुआ ? कैसे हुआ ? किसने किया ? यह कहना कठिन है , लेकिन इनका इतिहास युगों – युगों से गाया अर्थात बखाना जाता रहा है । इसलिए इन्हें हम इस पुराण में अजन्मा की केटेगरी में रख देते हैं । पुरातन काल में ये लकड़ी की खड़ाऊँ बन कर देवों एवं गुरुजनों के पाद ( पैरों ) में स्थान पाने में सफल रहीं हैं । तब ये श्रद्धा और सम्मान की पात्र रहीं । भक्त और शिष्य इन चरण-पादुकाओं को श्रद्धा-स्थल पर रखकर पूजन करते थे । देव और गुरु जनों की अनुपस्थिति में ये इन्हें ही आदरभाव देकर ज्ञान प्राप्त करते थे । त्रेतायुग में तो भरत ने श्रद्धा और सम्मान की पराकाष्ठा का प्रदर्शन किया । उन्होंने अपने बड़े भाई श्री राम की चरण-पादुकाओं को राजसिंहासन पर विराजमान कर खुद को राजपद से विरक्त रखा । यह चरण-पादुका की सर्वोत्तम स्थिति थी ।
समय के साथ चरण-पादुकाओं का स्वरूप भी बदला और नाम भी । कलयुग के प्रथम चरण में ये ‘ पनहीं ‘ के रूप में विख्यात हुईं और इनकी निर्माण सामग्री बनी चमड़ा । चर्र-मर्र इनकी लोक-ध्वनि के रूप में सुनी जाती रहीं । इन्हें भी पैरों की सुरक्षा का दायित्व मिला , लेकिन यह धीरे – धीरे अपने रौद्ररूप के लिए पहचानी गईं । जिसका भय सारे जगत में व्याप्त हुआ । ये असम्मानित करने का साधन बनीं । कभी सिर पर रखाई गईं तो कभी पीठ पर बरसाई गईं । जल्द ही इनकी विदाई हुई , फिर इसका सौम्य और फैशनेबल रूप सामने आया ‘ जूता ‘ । यह रूप , गुणों की खान के रूप में ज्यादा जाना गया । इस जूते ने चाणक्य से ज्ञान प्राप्त किया । चाणक्य के एक सूत्र के अनुसार किसी का अस्तित्व समाप्त करना है तो उसे अमरबेल की तरह घेर लो । जूते ने इस गुण को पूरी मनसा , वाचा , कर्मणा से अपनाया तथा श्रद्धा चरण को पूरी तरह अपनी गिरफ़्त में लेकर उसका अस्तित्व नाम मात्र को रहने दिया । शायद यही वजह है कि आज लोगों को चरण-वंदना की जगह जूता वंदना करनी पड़ती है । इसी कारण कुछ लोग ‘ घुटना – वंदन ‘ करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं ।
अग्रेजों के आगमन पर ये ‘ शू ‘ के रूप में प्रसिद्ध हुए । साथ ही इनके कई रूप , गुण विख्यात हुए । सेना के जवानों के लिए ये बूट बन बैठे । मार्निंग-वाक के लिए पी.टी. शू । खेल के लिए ‘ स्पोर्ट्स शू ‘ । क्रूर – शासकों के लिए ‘ आयरन – हील ‘ । और साफ – सफाई आदि कामों के लिए ‘ गम – बूट ‘ । फैशन की दुनिया में तो ये कई अवतारों में सामने आए ।
जूते ने राजनीति की दुनिया में भी अहं रोल अदा किया है । कभी ये सम्मानीय जनों की ओर उछाले गये । कभी शरीर में लगे तो कभी बाजू से निकलकर चर्चित हुए । तो कभी असम्मानीय जनों के गले का हार बन गये । परीक्षार्थियों के लिए तो आप सर्वाधिक उपयोगी साबित हुए । ज्ञान की पूंजी ( कुंजी अथवा नकल ) को सुरक्षित रखने के लिए आप से बेहतर कोई और विकल्प था ही नहीं । शरारती तत्वों के कारण आप बदनाम हुए और अब परीक्षा – भवनों के बाहर ही उतरवाये जाने लगे ।
हे जूता देव आपके किन -किन गुणों का बखान करूँ । चलते -चलते आपके दो महत्वपूर्ण गुणों का बखान करना अनिवार्य है । प्रथम आप स्मरणीय हैं दूसरा बेशकीमती और संस्कारी भी । जब हम देवालय जाते हैं तब आपको बाहर उतारने का नियम है किंतु तब आप भगवान से ज़्यादा स्मरण किये जाते हैं । जब तक आंख बंद रहती है आप ही आप दिखते हैं । लौटकर आपको वापस पाने की खुशी किसी अपार संपदा से कम नहीं होती । इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति सिर पर दूल्हे का सेहरा बांधता है तब आपको सबसे ज्यादा याद करता है । यदि साली आपको न चुराये तो दुल्हे की नाक नीची हो जाती है । संस्कार की तौहीन कहलाती है । साली द्वारा चुराये जाने के बाद आपको पुनः पाने के लिए दुल्हा आपकी हर कीमत चुकाने को तैयार रहता है ।
हे देव आपकी महिमा से सारा जगत विभोर है , अंत में हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि सदा सौम्य एवं फैशनेबल रूप में ही कृपा बरसाते रखना , कभी बरसना मत ।