चायनीज आई लव यू का चलन बढ़ा…….

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ज़हीर अंसारी

आजकल इश्क़ के मारे या तो ख़ुदकुशी कर रहे हैं या क़त्ल। जबलपुर में पिछले दिनों इस तरह की कई वारदात हुई हैं। किसी ने इश्क़ में फ़रेब खाकर आत्महत्या कर ली या प्रेमिका की हत्या कर दी। वाट्सअप्प की मोहब्बत का चलन जबसे बढ़ा है तब धोखेबाज़ी का चलन भी बढ़ गया है। वाट्सअप्प और मैसेंजर के ज़रिए अक्सर नौजवान जुड़ते हैं। बातचीत का सिलसिला शुरू होता है। यह सिलसिला कब मोहब्बत में तब्दील हो जाता है, पता नहीं चलता। एक दूसरे को ठीक से जाने पहचाने बिना इश्क़ में जीने मरने की क़समें खाई जाने लगती है। इस बीच कोई तीसरा कहीं से टपक पड़ता है। शंका-कुशंकाओ का दौर शुरू हो जाता है। चंद दिनों में ही साथ जीने-मरने के वायदे चकनाचूर हो जाते हैं।

आभाषी दुनिया के ज़रिए परवान चढ़ने वाली मोहब्बत की उम्र बहुत छोटी होती है। यह सिर्फ़ अल्फ़ाज़ों के दायरे में सिमटी रहती है। आशिक़ और माशूका एक दूसरे के फ़ैमिली बेकग्राउंड को नहीं समझ पाते। फ़ैमिली बेकग्राउंड से दोनों को वास्तविक चरित्र समझने में सहजता होती है और मोहब्बत पुख़्ता और लम्बी होती है।

पुराने लोग भी मोहब्बत किया करते थे। एक झलक पाने महीनों माशूका के फेरे लगाया करते थे। फिर मुस्कुराने और चिट्ठी-पत्री का सिलसिला चलता था। जब दोनों एक-दूसरे को ठीक से समझ लेते थे तब मेल-मुलाक़ात होती थी। मेल-मुलाक़ात के बाद जब मोहब्बत की चासनी में गाढ़ापन आ जाता था तब शादी-ब्याह की बात होती थी। उस दौर की मोहब्बत में शारीरिक सुख की अपेक्षा न के बराबर हुआ करती थी।

अब आभाषी दुनिया के ज़रिए होने वाली मोहब्बत में सबकुछ ‘इंस्टंट’ चाहिए होता है। मन का प्रेम और आत्मीय प्रेम से परे शरीर के प्रेम की लालच और एकाधिकार के भाव ज़्यादा होते हैं। जहाँ लालच और एकाधिकार के भाव आए वहाँ क़त्ल और ख़ुदकुशी जैसे वारदातें होना स्वभाविक है।

कहने का आशय है कि प्रेम का भी विदेशीकरण हो चला है। जैसे चाइनीज़ प्रोडक्ट होते हैं ‘यूज एंड थ्रो’ वैसी ही मोहब्बत में आज के युवा वर्ग विश्वास रखते हैं। हफ़्ते भर में किसी ने किसी को ‘आई लव यू’ का जवाब नहीं दिया तो दूसरे विकल्प की तरफ़ बढ़ जाते हैं। अब तो लगने लगा है कि ‘आई लव यू’ शब्द भी चायना से आयात हो रहा है। जब तक चला तो चलाया, नहीं चला तो फेंक दिया। भारतीय संस्कृति के प्रेम में धैर्य, संयम और लोक-लाज की सीमा हुआ करती थी जो अब ख़त्म होती दिख रही है। इसी की परिणिति है युवा वर्ग आवेश में आकर हत्या या आत्महत्या कर रहे हैं।

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जय हिन्द
ज़हीर अंसारी