भाजपा और साल सोलहवें की खुमारी

0
79

राकेश दुबे

भारतीय जनता पार्टी में मची उथल-पुथल का सटीक कारण मध्यप्रदेश के एक वयोवृद्ध नेता ने खोज लिया है | कारण पूरे देश में एक ही है – आंतरिक लोकतंत्र की अनदेखी | वैसे यह शुरू तो वर्षों पहले हो गई थी,जब उसके एक शीर्ष नेता ने कहा था कि “ अवैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल, भाजपा के चाल चरित्र और चेहरे को बदल रही है |” अब यह बदलाहट सतह पर आ गई है और मध्यप्रदेश में तो निर्णायक दौर में है | इसके परिणाम क्या होंगे, इसको लेकर अलग-अलग राय है, परन्तु सब इस बात से सहमत है कि ये नवीन पद्धति भारतीय जनता पार्टी के मूल विचार और संस्कृति से पृथक है | उन राज्यों में जो विधान सभा चुनाव की दहलीज़ पर खड़े है, कार्यकर्ता से लेकर, स्थापित नेता तक इस नई पद्धति से मनोवैज्ञानिक दबाव में आ गये हैं कि ” पता नहीं क्या होगा ? कोई सुनने वाला नहीं है, किससे कहें ?”
बात मध्यप्रदेश से शुरू हुई है | विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी चयन, बड़ा टेड़ा काम है | भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने जो फार्मूला अन्य जगह अपनाया, पार्टी मध्यप्रदेश में भी वही दोहराना चाहती है | जमीनी सर्वे से लेकर प्रत्याशी चयन तक सारे काम किसी निजी एजेंसी की राय के अनुरूप | इससे से पार्टी के वयोवृद्ध नेता नाराज़ हैं और इस पद्धति के खिलाफ उन्होंने अपनी बात अपनी तरह से कह डाली | जिसकी प्रतिध्वनि “पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव” के रूप में गूंजी | इसके पीछे एक कसक भी है | यह कसक प्रदेश के दो वयोवृद्ध नेताओं की कुर्सी जाने की प्रतिक्रिया भी बताई जा रही है | यह खेल पहले उजागर हो चुका है,उम्र तो बहाना सबित हुई थी |
एक मित्र ने कल इस सारे मामले में बड़ी रोचक प्रतिक्रिया दी | उनका कहना था, अक्सर उम्र के १६ वें साल में ऐसी गलतियाँ हो जाती हैं, जिसे पूरे परिवार को भोगना पड़ता है | मध्यप्रदेश में भाजपा का १५ साल से शासन है, यदि जीते तो साल सोलहवां होगा, उसकी खुमारी अभी से आ गई है | सोलहवें साल के आसार पूरे प्रदेश में दिख रहे है | कहीं दिग्गज नेताओं की कार रोकी जा रही है, तो कहीं नेताजी को भाषण के बगैर लौटना पड़ा है | मंत्री की मंत्री से, विधायक की विधायक से, विधायक की महापौर से, महापौर की अपनी स्थाई समिति से होने वाली रार सडक पर आ गई हैं | सब एक दूसरे प्रत्यक्ष और परोक्ष वार करने से नहीं चूक रहे हैं | मित्र की प्रतिक्रिया पर १९७३ में राजकपूर द्वारा बनाई गई फिल्म बाबी का यह गाना याद आता है “ मुझे भी कुछ कहना है, इस हाल में”…..!
मध्यप्रदेश के साथ एक अन्य राज्य में भी सोलहवां साल आ रहा है | तस्वीर वहां की भी कुछ ऐसी ही है | यह सच है कि भाजपा में पहले सुनवाई होती थी, सब कुछ साफ दिखता था | कारण गिनाये और बताये जाते थे अब ऐसा नहीं है | कुछ बड़े नेता घर बैठा दिए गये हैं | कुछ को ये बाहरी एजेंसी घर का रास्ता दिखा देगी | ये कहते रह जायेंगे “मुझे भी कुछ कहना है और कोई सुनेगा नहीं | १६ वें साल की खुमारी में ऐसा ही होता है |