स्व. अमृतलाल वेगड़ ‘बेजोड़ जीवन शैली’ के धनी थे…..

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प्रहलाद सिंह पटैल,

3 अक्टूबर 1928 को जबलपुर में जन्में श्री अमृतलाल जी बेगड़ एक जीवन शैली का पर्याय है। 1948 से 1953 तक शांति निकेतन के विद्यार्थी के रूप में शिक्षा गृहण करने वाले, जब वापिस आने लगे तो उन्होंने अपने गुरू आचार्य नंदलाल बोस से पूछा कि मेरे जीवन का क्या उद्देश्य है। तब उन्होंने कहा कि ’’जीवन को सफल नहीं बनाना, जीवन को सार्थक बनाना’’। आदरणीय बेगड़ जी ने जीवन पर्यंत अपने गुरू के वचन को आदेश मानकर जीवन पूरा किया, इसलिये मैं श्री वेगड़ जी को व्यक्ति नहीं जीवन शैली मानता हूँ।

वे एक चित्रकार थे, स्केच बनाते थे, कोलाज बनाते थे, लेखक थे, सहज सरल किंतु प्रभावी वक्ता थे। लेकिन लोकेष्णा से दूर सहजता से बड़े बड़े कार्य कर गये। वे कभी व्यवसायिक नहीं हुये किंतु अपव्यय के घोर विरोधी थे। वे कला एवं लेखन को पात्र लोगों तक पहुँचाने के हिमायती थे। ऐसी प्रवृत्ति परम त्याग के अलावा कुछ और नहीं हो सकती। छात्र जीवन में उन्होंने ’’अहिंसा टू वेटल फील्ड’’ स्टूडेन्ट प्रोजेक्ट के रूप में लिखा। जो 1968 में ’’गांधी गंगा’’ पुस्तक के नाम से प्रकाशित हुई। 1977 में 50 वर्ष की आयु में नर्मदा की परिक्रमा प्रारंभ की जो 82 वर्ष की आयु तक सतत जारी रही। उन्होंने नर्मदा की पूर्ण परिक्रमा की। उस कालखण्ड में सरदार सरोवर का निर्माण नहीं हुआ था, इसलिये उन्हें डूबे हुये गांवों को भी देखने का अवसर मिला। श्री वेगड़ जी ने नर्मदा की तीन सहायक नदियों की भी परिक्रमा की थी। जिसमें उन्होंने लगभग 4000 किलोमीटर की पैदल पदयात्रा की।

श्री बेगड़ जी ने ’’नर्मदा रेखांकन’’ में एक परिचय लिखा है जिसमें उन्होंने अपने आपको नर्मदावृत्ती लेखक व चित्रकार कहा है। इन नर्मदावृत्ति लेखक व चित्रकार ने तीन पुस्तकें इस दौरान लिखी। जिसमें सौंदर्य की नदी नर्मदा,तीरे तीरे नर्मदा, अमृत्सय नर्मदा है। इनके यात्रा वृत्तांत स्केच व कोलार्ज भी मिलते है। उनके 89 वर्ष पूर्ण होने के दौरान जब अस्वस्थ हुए तो उन्होंने अपने स्केच व कोलार्ज तथा उनके गुरू नंदलाल बोस जी के रेखा चित्रों को संग्रह कर एक पुस्तक बनाई जिसका नाम हैं ’’नर्मदा रेखांकन’’। जो उन्होंने अपने गुरू को समर्पित की है। इस अस्वस्थता में भी उन्होंने यह पुस्तक मुझे स्वंय के हस्ताक्षर के साथ भोपाल पहुँचाई थी। जो आज मेरे पास धरोहर के रूप में सुरक्षित है। यह संयोग बना मेरी लोकसभा थी। आश्वासन समिति के सदस्यों को उनकी पुस्तक भेंट करने के लिये मेरे कार्यालय ने संपर्क किया तो तब मुझे पता चला कि तीनों पुस्तकों को मिलाकर एक पुस्तक बना दी गई हैं। उनकी ये पुस्तकें गुजराती, मराठी, बंगला, अंग्रेजी व संस्कृत में प्रकाशित है। श्री वेगड़ जी को इस लेखन के लिये गुजराती व हिंदी साहित्य अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें इसके लिये ’’राहुल सांस्कृत्यायन’’ पुरस्कार भी मिला।

जब मैंने सपत्नीक 2005 में मां नर्मदा की परिक्रमा के बाद विभिन्न स्थानों पर गोष्ठियां की। श्री बेगड़ जी से मेरा घनिष्ठ संबंध बना। वे प्रचार व लोकेष्णा से दूर विलक्षण महापुरूष थे। उनका विनोदपूर्ण सरल संवाद घंटों तक मोह लेता था, उदाहरण स्वरूप वे मानस भवन जबलपुर बोले कि मुझे मां नर्मदा ने बुंदी दी और प्रहलाद जी को लड्डू। क्योंकि उनकी परिक्रमा नौकरी के बाद जो अवकाश होता था, वे उसमें करते थे अर्थात् प्रतिवर्ष टुकड़ों में और मैंने एक साथ कर ली थी। साम्य ये था कि दोनों की परिक्रमा में दोनों की धर्मपत्नी साथ थी।

मैं उनसे अंतिमबार 9 जून 2018 को सपत्नीक मिला था, तब वे अस्वस्थ थे आक्सीजन लगी हुई थी। ब्हीलचेयर पर थे, पर उनकी जीवटता, चैतन्यता व स्मृति वैसी ही थी, जैसे 12 वर्ष पूर्व मैंने उन्हें देखा था और सुना था। उन्होंने विनोद भाव से व्हीलचेयर पर बैठे हंसते हुये कहा, प्रहलाद जी मैं आपके सम्मान में खड़ा नहीं हो सकता। मैंने पैर छुये व आर्शीवाद लिया। पिछले 12-13 वर्षों की हर घटना का उन्होंने स्मरण किया। उन्होंने ’’नर्मदा रेखांकन’’ पुस्तक के प्रकाशन में जो व्यय आया, वह उनके परिवारजनों ने स्वंय उठाया है। ;आने वाली पीढ़ी के लिये यह बात लिखना जरूरी है कि श्री बेगड़ जी तीन पीढ़ीयां एक साथ रहती है।इनकी 500 प्रतियां बिकवा दीजिये ताकि प्रकाशन का व्यय निकल जाये। लाभ नहीं चाहिये व्यापार नहीं करना। मैंने कुछ पुस्तकें ली तो उसमें भी एक शर्त थी कि पात्र को ही दीजिये, जो कला का सम्मान कर सके। बाद में मेरी बेटियों को याद किया जो उनसे मिली। उस दिन तारीख थी 12 जून 2018। उन्हें हस्ताक्षर कर नर्मदा रेखांकन पुस्तक दी और कहा कि आज की तारीख दर्जनों में हैं। ’’एक दर्जन/ आधा दर्जन/ डेढ़ दर्जन’’

इस चैतन्य को नमन्, मुझसे कहा था जरूर आइये, लंबा बैठेंगें आप से बात करना अच्छा लगता है। जो अधूरा रह गया। टुकड़ों में परिक्रमा करने वाले ’’वेगड़ परिक्रमा’’ कहते हैं। वेगड़ जी स्वंय नर्मदावृत्ति लेखक व चित्रकार कहते हैं। मैं ’’वेगड़ जीवन शैली’’ कहता हूँ। जिसमें ईमानदारी, सहजता, सरलता, व्यापार से दूर सिर्फ परोपकार, मितव्ययता से पूर्ण जीवन जीने के साथ, अहंकार एवं प्रचार से दूर जीवनशैली। मैं सपरिवार उनके चरणों में नमन करता हूँ। उनकी अरधांगनी माताजी एवं परिजनों के लिये मां नर्मदा से कृपा का आंकाक्षी हूँ कि वे उन्हें संबल दें। नर्मदा समग्र के अध्यक्ष श्री वेगड़ जी ने दुनिया से विदा ली और आज ही नर्मदा समग्र के महामंत्री श्री अनिल माधव दवे जी जंयती है।
लेखक दमोह मध्यप्रदेश से बीजेपी के सांसद और नर्मदा परिक्रमा वासी है