मृत पौधों को श्रद्धांजलि की दरकार…….

0
94

ज़हीर अंसारी
बीते साल जुलाई को समूचे प्रदेश में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया था। सरकार की तरफ़ से दावा किया गया था कि इस दिन 6 करोड़ 60 लाख पौधारोपण किया गया था। पूरी सरकारी मशीनरी इस मुहिम में लगी थी और करोड़ों रुपए ख़र्च भी किए गए थे, पर परिणाम आज तक कोई नहीं बता पाया कि इनमें से कितने पौधे ज़िंदा हैं और कुल कितनी राशि ख़र्च की गई। पिछले साल वर्षा ने भी दग़ा दिया था, अधिकांश पौधे वर्षाजल के अभाव में पनप नहीं पाए। उसी वक़्त एक पौधे की आपबीती लिखी थी, कृपया इसे पढ़कर मृत हो चुके पौधों के प्रति संवेदनाएँ व्यक्त कर सकते हैं….

‘इंद्र’ की कृपा हुई तो फिर मिलेंगे…….

पानी….पानी….पानी…… की आवाज़ कहीं से आ रही थी। आवाज़ की कराहना सुनकर मैं सहम गया। नर्मदा कछार के किनारे कौन है जो पानी के लिए क्रंदन कर रहा है। झाड़-झंकाड़ हटाकर मैं वहाँ पहुँचा जहाँ से क़राहने की आवाज़ आ रही थी। देखा ज़मीन पर छः माही पौधा आख़री सांसे ले रहा था। इसी वक़्त अगर उसे पानी रूपी अमृत न मिला तो यह तत्काल काल के गाल में समा जाएगा। मैं दौड़कर गाड़ी से पानी की बोतल लाया और उस पौधे को पानी से तरबतर किया और वही बैठ गया।

कुछ देर बाद वह पौधा चैतन्य हुआ। लड़खड़ाते हुए सीधा हुआ और गहरी ठंडी साँस भरी। फिर मेरी तरफ़ अनुराग भरी नज़रों देखा और हृदय से मुझे धन्यवाद कहा। मैं जाने को उठा ही था कि कहा आप इंसान लोग हो, शिक्षित और सभ्य हो मेरी व्यथा सुनते जाओ और उन्हें बताना जिन्होंने मेरा और मेरे करोड़ों भाई-बहनों का ये हाल किया है। मैं इंकार न कर सका, वहीं पद्मासन लगाकर बैठ गया। उस पौधे ने अपनी आपबीती सुनानी शुरू की….

सूबे के 24 जिलों में नर्मदा के कछार और ख़ाली-पड़त भूमि पर कुछ दिनों पहले वृक्षारोपण मुहिम चली थी। 6 करोड़ पौधों के रोपण का लक्ष्य था। लक्ष्य पूरा करने पूरा सिस्टम, पूरे विभाग और तमाम बड़े अफ़सर बीवी-बच्चे और शासकीय काम छोड़कर भिड़ गया। धड़ाधड पैधों की ख़रीदी हो गई। नर्सरियों से फटाफट पौधे उखाड़े जाने लगे। जिस दिन हम लोगों को उखाड़ा जा रहा था हमने उसी दिन समझ लिया था कि हम सबकी सरकारी बलि तय है।

जैसे-तैसे हम लोगों को नर्सरियों से लाकर जहाँ-तहाँ रोप दिया गया। संख्या बढ़ाने के लिए कईयों ने हम लोगों के हाथ-पैर तोड़कर गड़ा दिया। ऐसा इसलिए किया होगा कि हरामखोरी कर सके। ट्रीगार्ड के नाम पर भी कईयों ने मोटी रक़म डकार ली। मनरेगा मज़दूरों से डगालों का ट्रीगार्ड बनवा लिया और लोहे का बिल लगा दिया।ख़ैर इससे हमें क्या। ऐसी मुहिम की ही जाती है भ्रष्टाचार के लिए।

रहनुमा की अगवाई में दो जुलाई को हम पौधों को कैमरा और वीडियो कैमरों कीगवाही में बड़े मान-सम्मान के साथ रोपा गया। सभी विभागों ने हमारी वीडियो रिकार्डिंग करवाई तो हम भी गदगद हो गए। सोचा हमारी आने वाली पीढ़ियाँ देखकर ख़ुश होंगी। उसी शाम फ़ेसबुक पर देखा कि 6 करोड़ 62 लाख भाई-बहिनों को नया जीवनदान दिया गया है। हम सब एक्स्ट्रा ख़ुश हुए। मुखिया की ख़ूब बढ़ाई हुई। गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज कराने जानकारियां भिजवा दी गईं।

हम पौधों ने तो यह बिलकुल न सोचा था कि नर्सरी से निकाल कर हमारी दुर्गति करने के लिए हमें यहाँ गाड़ा गया है। हम लोगों को गाड़ने वाले पलट कर यह देखने नहीं आए कि हमें पानी मिल रहा कि नहीं। पानी के अभाव में करोड़ों पौधे मर चुके हैं और करोड़ों मरणसन्न अवस्था में हैं। इंद्र भी इस ‘स्टंट’ से ख़फ़ा हो गए, पानी बरसा ही नहीं रहे हैं। वैसे तो हमारी नियति यही है। जब हमें फ़ारेस्ट, हार्टिकल्चर, एग्रिकल्चर डिपार्टमेंट और कृषि विश्वविद्यालय वाले नहीं बचा पाए तो औरों से क्या उम्मीद। सत्तर के दशक में हमारा वन क्षेत्र 24 प्रतिशत रहा जो अब घटकर 19 फ़ीसदी रह गया।

मरणसन्न अवस्था से उबरते ही पौधे में नेताई जोश आ गया हो। बाँहें सिकोड़ते ऊँची आवाज़ में चीख़ा कि जब उन्हें करोड़ों पौधे रोपना ही था तो हमारी खुराक यानी पानी की व्यवस्था भी कर लेते। यह तो दूध पीते बच्चे को भी पता है कि हमें जीने के लिए पानी लगता है। उनके पास तो बड़े-बड़े ‘बूकिस वर्म’ हैं। इनके इतनी अक़्ल तो होनी ही चाहिए थी कि दिल्ली के मौसम विभाग से पूछ लेते कि मानसून यहाँ कब आएगा। दिल्ली वाले सैटेलाइट की बटन दबाकर मानसून की संभावित तारीख़ बता देते। लेकिन इन ‘बूकिस वर्म्स’ ने एयरकंडिशंस में बैठ कर वृक्षारोपण की तारीख़ फ़िक्स कर दी।

अब हालात यह है कि जो पौधे बचे हैं वो मरने की कगार पर खड़े हैं। अख़बार में आज पढ़ा कि भोपाल मौसम केंद्र का कहना है कि मानसून अगले हफ़्ते आएगा तब तक तो हम सब की ‘लाई’ लुट जाएगी। वैसे भी हमें अब ज़िन्दा रहने की ज़्यादा आशा नहीं है। जब इंसानों की औलादें ‘कुपोषण’ से मर रही हैं तो बेज़ुबानों के मरने का दर्द क्यों किसी को होगा। जिसको जो फ़ायदा उठाना था, उठा लिया।

अंत में पौधे ने कहा कि धन्यवाद आपका कुछ दिनों के लिए जीवन दे दिया, अब ‘इंद्र’ की कृपा हुई तो फिर मिलेंगे वरना …… पर जाकर अपनी इंसानी क़ौम को यह बता देना कि हम न रहेंगे तो तुम्हें भी दिक़्क़त होगी।

अब पद्मासन की वजह से मेरे पैरों में झुनझुनी आ गई थी। धीरे से उठा और लंगड़ाते हुए लौट पड़ा। रास्ते में यही सोचता रहा आख़िर कब तक हम प्रकृति के साथ यूँ ही खिलवाड़ करते रहेंगे।