दरिंदगी पर समाज का मौन आश्चर्यजनक…..

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ज़हीर अंसारी
बड़ा अफ़सोस होता है जब यह ख़बर मिलती है कि दरिंदे ने मासूम के साथ दुराचार किया। न उम्र का लिहाज़ न सज़ा की परवाह। एक के बाद एक इस तरह की दरिंदगी वाली घटनाओं में इज़ाफ़ा होता जा रहा है। अब तो हवस का कोई पैमाना न रहा और न मज़हब। बस रह गई तो हैवानियत। हैवानियत के नाम पर भी कलंक लगाया जा रहा है।

देखने में आ रहा है कि इस तरह की घटनाओं की मुख़ालफ़त की बजाय तेरा मज़हब और मेरा मज़हब किया जा रहा है। तेरी क़मीज़ से मेरी क़मीज़ उजली वाली दुहाई दी जा रही है। क़मीज़ किसी की भी हो अगर काला धब्बा लग गया तो सब को दूर से ही दिखलाई पड़ेगा। इस तरह की हैवानियत को तेरा-मेरा करके घर में भले दबा लिया जाए लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर क्या जवाब दिया जाएगा। विश्व जगत को तो यह पता है कि तेरे-मेरे सभी एक ही घर के बाशिंदे हैं। उन्हें क़मीज से नहीं दाग़ से मतलब होता है।

कठुआ की घटना हो या मन्दसौर की या फिर सतना की। ये घटनायें तो अत्याधिक घिनौनी है फिर भी इस घिनौनेपन की तुलना, उलाहना, कटाक्ष और नुक़्ताचीनी का सिलसिला सा चल पड़ा है। इस तरह की बातों से क्या पिशाचों की मानसिकता बदल जाएगी या फिर पीड़िता और उसके परिजनों के ज़ख़्मों पर मरहम लग जाएगा। अगर लग जाए तो बहुत बढ़िया, ऐसे लोगों को ऐसा करते रहना चाहिए।

सोचने वाली बात यह है कि जिस कृत्य को जानवर तक नहीं करते वह आजकल मानसिक विकृति के मानव कर रहे हैं। जानवर भी उम्र का ख़्याल रखते हैं पर कुछ हैवान उम्र का भी ख़्याल नहीं कर रहे हैं। छोटी-छोटी बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं। न केवल हवस का शिकार बना रहे हैं बल्कि अमानवीय कृत्य तक कर रहे हैं। जिसे सुनकर ही हर समझदार आदमी शर्मसार हो जाए।

इस तरह की घटनाएँ सामाजिक ताने-बाने की बिगड़ती बुनाई की तरफ़ इशारा करती हैं। कहीं न कहीं इन घटनाओं के लिए समाज दोषी है। इसका विस्तृत स्तर पर चिंतन होना चाहिए कि क्या वजह है जो समाज में विकृत मानसिकता के कतिपय दुष्ट तैयार हो रहे हैं। इनकी दुष्टता की वजह से पूरा समाज और मज़हब कलंकित हो रहा है। बावजूद इसके समाज और मज़हब के ठेकेदार चुप हैं। इन सब को सामाजिक व्यवस्था की बजाय परलोक की चिंता सता रही है। इस लोक में क्या चल रहा है उसके बारे में सिर्फ़ दोषारोपण करके अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। सरकार पर ठींकरा फोड़कर ख़ुद को तसल्ली दे देते हैं मगर अपने दायित्वों का मूल्याँकन नहीं करते। यदि ठेकेदारों का यही रवैया बना रहा तो बच्चियों के साथ दुराचार की घटनाएँ थमने की बजाय बढ़ती जाएँगीं।

अब तो यूँ लगने लगा है कि ज़िंदा जिस्म की कोई अहमियत नहीं रही, मज़ार बनने के बाद प्रबुद्ध वर्ग मेला ज़रूर लगा लेता है। वक़्त रहते अगर समाज नहीं जागा और विकृत मानसिकता वालों को दुरुस्त करने समाज सामूहिक प्रयास नहीं करता तो विकट स्थिति बनने में देर न लगेगी।