सत्ता में बौद्धिकों की अहमियत पर सवाल

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जयराम शुक्ल

अभी हाल ही में एक राष्ट्रीय सेमीेनार में भाग लेने का मौका मिला। विषय था..कुशल प्रशासनिक रणनीति बनाने में अकादमिक योगदान की जरूरत। इत्तेफाकन् मुझे ही मुख्य वक्ता की भूमिका निभानी पड़ी वजह जिन कुलपति महोदय को उद्घाटन के लिए आना था ऐन वक्त पर नहीं आए। वैसे कुलपतियों के अकादमिक सरोकार बचे ही कहां। बेचारों का पूरा पराक्रम धारा 52 से बचने में ही लगा रहता है। मैंने पढ़ा था कहीं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विश्वविद्यालयों के कुलपति का इतना मान सम्मान होता था कि प्रधानमंत्री उस शहर में जाते तो सबसे पहले कुलपतिजी से ही मिलने पहुंचते। जैसे गणेश जी की अर्चना के बाद सभी कर्मकाण्ड पूरे होते हैं वैसे ही कुलपतियों के सम्मान की स्थिति थी। प्रो. अमरनाथ झा जैसे विद्वान इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति थे ज़ो पंडित नेहरू को प्रशासनिक मामलों में अपनी राय देते थे। वे नेहरू की गलत नीतियों पर सार्वजनिक टीकाटिप्पणी करने से भी नहीं चूकते थे। पर झा साहब का बड़ा मान था, शुरुआती दिनों से काफी बाद तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए अपने विद्यार्थियों को तैय्यार करने के लिए ख्यातनाम था। प्रयाग के आध्यात्मिक व सांसकृतिक संस्कारों से सिक्त इन मेधावियों की छाप प्रशासन के अलावा भी सार्वजनिक जीवन के विविध क्षेत्रों में देखने को मिलती रही। बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में आचार्य नरेन्द्र देव जैसे प्रखर समाजवादी चिंतक कुलपति हुए। वे कांग्रेस व पं. नेहरू के प्रखर आलोचकों में थे पर वे देश के सर्वाधिक सम्मानित कुलपतियों में से एक थे। जाहिर है उन्हें नेहरू की सहमति से ही कुलपति नियुक्त किया गया होगा। जैसा कि नाम से ही प्रकट है विश्विद्यालय माने ऐसे शैक्षणिक संस्थान जहाँ समूचे विश्व की विद्याओं का अध्ययन हो। विश्वभर के अध्येता पढ़ने आएं। सामने नालंदा और तक्षशिला विश्विविद्यालय की दृष्टांन्त रहा होगा। चीनी अध्येता ह्वेनसांग नालंदा का विद्यार्थी रहा है। चाणक्य तक्षशिला में पढ़े भी और पढा़या भी। चाणक्य ने अपने शिष्यों को श्रेष्ठ प्रशासक और राजनायिक के रूप में गढ़ा जिन्होंने तीन चौथाई विश्व जीत चुके सिंकदर के पांव भारत में नहीं जमने दिए। सत्ता से स्वयं निरपेक्ष रहते हुए चाणक्य ने भारत को एक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। प्रशासनिक रणनीति बनाने में अकादमिक योगदान का चाणक्य चंद्रगुप्त से बढ़िया शायद ही कोई उदाहरण हो। राजकाज में अकादमिक योगदान और उसके प्रतिफल देखने के लिए हमें ग्रीक और यूनानी दार्शनिकों व चिंतकों की ओर देखने की जरूरत नहीं। हमारे वैदिक वांग्यमय और पौराणिक आख्यानों में इसके सूत्र बिखरे पड़े हैं। ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की। विष्णु पालनहार बने तो उनके परामर्श के लिए सप्तर्षि मंडल गठित किया। ये सप्तर्षि परामर्श के साथ समय समय पर विष्णुजी को सचेत भी करते थे। विष्णुजी ईश्वर थे फिर भी सहिष्णुता की ये पराकाष्ठा ही थी कि छाती में महर्षि भृग के पद प्रहार के बाद भी प्रत्युत्तर में कहते हैं कि विप्रवर आपको चोट तो नहीं लगी क्योंकि कि मेरी छाती बज्र की भांति कठोर है। आज की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में पदप्रहार तो दूर की बात. वाक्यप्रहार में ही सत्ताएं जीभ खैंचने के लिए तैय्यार रहती हैं। नारद भी विष्णुजी के भक्त और सलाहकार थे। पर विश्वमोहिनी स्वयंवर में लगा कि विष्णुजी ने उनके साथ छल किया तो नारद ने वो भीषण श्राप दिया जिसे राम बनकर उन्हें त्रेता में भोगना पड़ा, पत्नी के वियोग में। विष्णुजी परम पराक्रमी ..जैसा कि नारद ने उलाहना देते हुए कहा..परम सुतंत्र उपर कोउ नाहीं..वे चाहते तो नारद को सृष्टि निकाला दे सकते थे पर नारद की प्रतिष्ठा में उन्होंने कभी आँच नहीं आने दी। ऋषियों और देवताओं, ईश्वर के बीच ऐसे वाद, विवाद, संवाद होते रहते थे लेकिन सब परस्पर एकदूसरेके लिए अपरिहार्य थे। स्तुति की जरुरत थी तो निंदा और आलोचना की भी। सबका महत्व था। आज तो हाल ये कि …सिर्फ करते रहो वंदना, सत्य कहना समझना मना..। मैं किसी व्यक्ति विशेष के राज के बारे में ये नहीं कर रहा। असहिष्णुता सत्ता का मौलिक चरित्र बनती जा रही है। अपने देश में सन् बहत्तर के बाद से इस प्रवृत्ति को विस्तार ही मिलता गया। स्थिति यह बन गई कि प्रशासन में जो बौद्धिकों का दखल होता था वह मंद पड़ता गया और सलाह की जगह चापलूसी शुरू हो गई। कुलपति और शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुख योग्यता नहीं वरन चापलूसी के आधार पर तय होने लगे। इसलिए एक जमाना वो था जब प्रधानमंत्री कुलपतिजी से मिलने जाया करते थे और आज का जमाना ये कि कुलपतियों का झुंड मंत्री के भंडारे में पूड़ी पंजीरी बांटनें में लग जाता है। ये पतनशीलता हमारी ओढी हुई है। ऐसे में यदि हम अफसोस मानें कि लोकप्रशासन में हमारी योग्यता की कोई पूछ परख नहीं तो ये गलत बात है। हम हर नकल पश्चिम की करते हैं पर अधकचरी। शिक्षा की गुणवत्ता के बारे में भी नकल कर लें। अमेरिका दुनिया में इसलिये श्रेष्ठ है क्योंकि उसके पास श्रेष्ठ विश्विविद्यालय हैं। चीन इस श्रेष्ठता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अपने मध्यप्रदेश की बात करें तो राष्ट्रीय संस्थानों को अलग कर दें तो कोई ऐसे संस्थान नहीं जिनकी रैंकिंग देश में सौ के भीतर हो। देश के पैमाने पर बात करें तो दुनिया के श्रेष्ठ सौ संस्थानों में भी कोई नंबर नहीं लगता। यह हाल उस देश का है जो अपने गुरुकुलों, नालंदा, तक्षशिला विश्विद्यालयों की बदौलत विश्वगुरू रहा है। यह विमर्श का विषय है कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था बौद्धिक परंपरा को पनपने नहीं देना चाहती? क्योंकि आमतौर पर यही आरोप लगता है कि राजनीति के बेजा दखल ने शैक्षणिक संस्थाओं का बेडा गर्क किया है। जनप्रतिनिधियों के चुने जाने का आधार उनकी योग्यता नहीं अपितु ज्यादा से ज्यादा मत अर्जित करने का कौशल है। और यह कौशल जाति,संप्रदाय, बाहुबल, धनबल से आता है। इन्हीँ में से कोई शिक्षामंत्री भी बनता है। नीति नियंताओं में ऐसे ही लोगों का बहुमत होता है। यह भी विचारणीय तथ्य है। पर अमेरिका तो लोकतांत्रिक उदारता की पराकाष्ठा और चीन एक तरह से तानाशाह। पर शिक्षा के क्षेत्र में दोनों तेजी से आगे बढे हैं। बौद्धिकों और शिक्षाविदों का काम पढाने के अलावा लोकशिक्षण का भी है। हमारे यहां के प्रायः बौद्धिक राजनीतिक धाराओं के पिट्ठू हैं। उनके लोकजागरण के पीछे भी न्यस्त राजनीतिक स्वार्थ होता है। पिछले साल इसका प्रदर्शन भी देखने को मिला जब असहिष्णुता के नाम पर हस्ताक्षर अभियान चलाए गए, अवार्ड वापिस किए गए। यही लोग माओवादियों, अलगाववादियों के मामले में चुप रहते हैं । थियामिन चौक में लोकतंत्र समर्थक छात्रों के नरसंहार को चीन का अंदरुनी मामला बताते हैं और जब कश्मीर में हिंसा भड़काने और जवानों पर पत्थर बरसाने वालों पर जरा सी भी कार्रवाई होती है तो ये चिंहुक उठते हैं। प्रायः बौद्धिक खेमेबाजी में बंटे हैं । जो तटस्थ हैं उनकी अपील नहीं। निजाम कभी अकल को पनाह नहीं देता क्योंकि वह खुद को सबसे ज्यादा अक्लमंद समझता है। वह बौद्धिकों को चाहता तो है पर अपने दरबारी की शक्ल में जो उसके हुक्म का हुक्का भरता रहे।मध्यकाल में कबीर हुए, इब्राहीम लोधी जैसे निर्दयी और निरंकुश के शासनकाल में। काशी की गलियों में दादू, रैदास जैसे समकालीन बौद्धकों की मंडली लेकर लोकजागरण करते रहे निर्भय।इस्लाम के निंदकों को खौलते कड़ाह में तलवा देने वाला इब्राहीम कबीर और उसके अनुयायियों का बाल बांका नहीं कर पाया। जानते हैं क्यों ..वो इसलिये कि लोक की ताकत से बड़ी बड़ी सल्तनतें घबराती हैं। तुलसी के प्रायः समकालीनों को अकबर ने अपना दरबारी बना लिया। संतन को कहां सीकरी सो काम…माँगकर खाइबो मसत में सोइबो कहते हुये तुलसी नहीं गए। तुलसी अपने आप में एक आंदोलन बन गए और सनातन मूल्यों की रक्षा की। यह कहना गलत है कि सत्ता का दवाब बुद्धि का गला चपा देता है। यह हम पर निर्भर करता है कि कितना दबते हैं। यहाँ तो हाल यह है कि झुकने का इशारा किया जाता है तो हम बिछ जाते हैं। सवाल ये है कि पहले हम बौद्धिक कहलाने वाले वाले लोग खुद को नाप लें कि कितने पानी में हैं फिर तय करें कि शासन को लोकजयी बनाने की दिशा में क्या कर सकते हैं।