आनंदी बेन… हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि…

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राघवेंद्र सिंह

मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल राज्य के लिए उसी तरह शुभ हैं जैसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए कहते हैं कि वे देश के लिए भगवान का वरदान हैं। यह बात हमें इसलिए भी लिखनी पड़ रही है कि राज्यपालेक किताब के चलते चर्चाओं में। आनंदी बेन देश की संभवत: पहली ऐसी राज्यपाल हैं जिनके कार्यकाल के एक सौ ग्यारह दिन का अभ्युदय अविस्मरणीय, ऐतिहासिक और दुर्लभ कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनकी सक्रियता को लेकर मशहूर शायर मिर्जा गालिब की एक गजल याद आती है। हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमां फिर भी कम निकले… एक सौ अठ्ठाइस पेज की यह पुस्तक करीब बारह सौ की संख्या में मद्रित की गई है। एक पुस्तक एक हजार के लगभग बताई गई है। यह पहला संस्करण है। आगे भी इस तरह की और भी किताब देखने को मिल सकती हैं।
आजादी के पहले जन्मी हमारी राज्यपाल साहस, योग्यता, मेहनत में असाधारण हैं। यही वजह है कि उन्होंने अपने तीस साल के शिक्षकीय कार्यकाल में अनेक उल्लेखनीय काम किए हैं। जिसके चलते कार्यकाल के दौरान वे राज्यसभा में चुनीं गईं और सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद ही 1998 में अहमदाबाद के मांडल विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुनीं गईं और अपने दूसरे कार्यकाल में वे गुजरात की शिक्षा मंत्री बनीं। इसके बाद उन्होंने फिर कभी पलटकर नहीं देखा। कह सकते हैं भले ही वे गुजरात में मुख्यमंत्री पद का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं हों लेकिन मध्यप्रदेश जैसे शांत राज्य में उन्होंने अपनी सक्रियता से हलचल पैदा कर लोगों को हैरान कर दिया है। असल में अब से पहले चुनी हुई सरकार के रहते इतने महत्वाकांक्षी और ऐक्टिव गर्वनर राज्य को पहले कभी नहीं मिले। इसलिए सियासी हलकों से लेकर नौकरशाही तक में उनकी गतिविधियों को लोग दिल थामकर और दम साधकर देख रहे हैं।
विज्ञान की छात्रा के साथ पढ़ाने में गोल्ड मैडल लेकर मास्टर डिग्री लेने वाली राज्यपाल 22 मई 2014 से 7 अगस्त 2016 तक गुजरात की मुख्यमंत्री भी रहीं। चुनाव पूर्व उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया था। बस यही उनके राजनैतिक जीवन का अधूरापन कहा जा सकता है। इसके बाद 23 जनवरी 2018 को वे मध्यप्रदेश की राज्यपाल बनाई जाती हैं। उनके 111 दिन के कार्यकाल को अभ्युदय एक प्रेरणा का नाम दिया गया है। अब ये प्रेरणा किसकी है यह तो पता नहीं लेकिन राज्य शासन के जनसंपर्क विभाग ने इसका प्रकाशन किया और मध्यप्रदेश माध्यम इसका मुद्रक बना। 128 पेज की बहुरंगी ग्लेज्ड पेपर पर आंखों में बस जाने वाली किताब निकाली। इसमें उपराष्ट्रपति एम वैंकैया नायडू और गुजरात के राज्यपाल ओपी कोहली के संदेश हैं। राज्यपाल के प्रमुख सचिव डॉ. एम. मोहनराव ने 111 दिन की संक्षिप्त जानकारी दी है। इसमें खासबात के रूप में दो शब्दों के एक लेख के अंत में जो लिखा है उसे जस का तस प्रकाशित कर रहे हैं… ‘यह हकीकत है कि माननीय राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल के द्वारा प्रदेश के राज्यपाल का पद स्वीकार कर प्रदेशवासियों का गौरव बढ़ाया है। प्रदेशवासियों में यह आशा जगी है कि राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन के रहते प्रदेश का तेजी से विकास होगा और गांव तथा गरीबों की स्थिति बदलेगी। माननीय राज्यपाल महोदया के संरक्षण में हमारा प्रदेश और देश सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सकेगा।’ अब कह सकते हैं कि मध्यप्रदेश की राज्यपाल ने अन्य प्रदेशों के राज्यपाल और यहां तक की राष्ट्रपति के लिए भी इसी तरह से सक्रिय होने की एक लाइन दे दी है। अभी तक राज्यपाल को निर्वाचित सरकारों के बीच काम करने के मामले में रबर स्टेम्प माना जाता था। दरअसल राज्यपाल की एक सीमा और स्वनिर्मित मर्यादा भी रही है। जिसे आनंदी बेन पटेल के 111 दिन के अभ्युदय ने कई मिथकों को तोड़ा भी है। वैसे उन्होंने 2002 में गुजरात के शिक्षा मंत्री के रूप में चुनाव जीतकर इस मान्यता को भी गलत साबित किया था कि गुजरात में शिक्षा मंत्री लगातार दूसरा चुनाव नहीं जीत पाते हैं। इस 128 पेज की किताब को देखने के बाद लगता है कि इसे अंतिम रूप देने वाली टीम ने राज्यपाल की हर आम और खास गतिविधियों को प्रमुखता से दिखाया है। प्रशासनिक और राज्यपाल की विशिष्ट गतिविधियों के साथ अपनी अधीनस्थ कर्मी की पुत्री की शादी में शामिल होने, औषिधि पौधों का निरीक्षण करने से लेकर राज्यभवन में सफाई और निर्माण कार्य,योग गतिविधियां, अस्पतालों का निरीक्षण और अधिकारियों को निर्देशित करना भी शामिल है। इस किताब में यह भी बताया गया है कि उन्होंने 17 जिलों में प्रवास किया। तीन हजार से ज्यादा लोगों से मुलाकात, दस सरकारी अस्पतालों में रोगियों से मुलाकात, बारह जिलों के स्कूलों का निरीक्षण, बीस से ज्यादा आंगनबाडी केन्द्रों का भ्रमण, बच्चों से भेंट, फल वितरण। राज्यपाल की अध्यक्षता वाली दस संस्थाओं का भ्रमण और बैठक के साथ पांच विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोह में शामिल होना प्रमुख है। एक बार ऐसा भी हुआ कि अपने विद्यालय की दो छात्राएं जो नर्मदा नदी में डूब रही थी उनको बचाने के लिए वे पानी में कूद कर बचा लाती हैं। खासबात ये है कि यह काम उन्होंने तब किया जब वे खुद तैरना नहीं जानती थीं। अहमदाबाद के मोहिनिबा कन्या हाई स्कूल में 1968 से 1998 तक 30 साल तक शिक्षक रहीं और प्राचार्य के पद से निवृत्त हुईं। अपने सेवाकाल के दौरान 1987 में राजनीति से जुड़ीं और इस दौरान गुजरात भाजपा प्रदेश महिला मोर्चा की अध्यक्ष भी बनीं। विदेश यात्राओं में चीन से लेकर बुलगारिया, फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, इंग्लैड, नीदरलैंड, अमेरिका, कनाडा, मैक्सको, नामीबिया के प्रवास पर गईं।
राज्यपाल की सक्रियता से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रशासनिक कामों में मदद के रूप में देखा जा रहा है। अगर यह परंपरा अन्य राज्यों में अपनाई जाती है तो हो सकता है कि मुख्यमंत्रियों का नागवार गुजरे क्योंकि सब शिवराज जैसे बड़े दिल के नहीं हो पाएं। अब एक बात और निकल रही है कि आनंदी बेन की तरह राष्ट्रपति भी सक्रिय हो जाएं तो बहुत संभव है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी सरकार चलाने में मदद मिले। वैसे तो परंपराएं और पानी ऊपर से नीचे की तरफ आता है लेकिन मध्यप्रदेश की राज्यपाल ने जो उदाहरण पेश कर रही हैं उसे हम कह सकते हैं कि पानी नीचे से ऊपर की तरफ जा रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए राष्ट्रीय स्तर पर राज्यपालों की इस तरह की सक्रियता सियासी और संवैधानिक गलियारों में बड़ी बहस का जरिया भी बन सकती हैं। मध्यप्रदेश के संदर्भ में हमने इसके पहले प्रशासनिक अधिकारी रहीं सरला ग्रेवाल को प्रदेश में सक्रिय राज्यपाल के रूप में देखा था। उन्होंने भोपाल की बड़ी झील को बचाने के लिए सरोवर हमारी धरोहर नाम से एक अभियान शुरू किया था जिसमें राजनेता, कार्यकर्ता और आम जनता बड़े पैमाने पर शामिल रही थी।

इस मौके पर मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की यह ग़ज़ल भी खासी मौजू लगती है….

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
– मिर्जा गालिब

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले

मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले

हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले

हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले

खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले

कहाँ मयखाने का दरवाजा ‘गालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले