दो-दो वित्त मंत्री फिर भी विदेशों में डिपॉज़िट बढ़ा….

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ज़हीर अंसारी

जैसे ही यह ख़बर आई कि स्विस बैंकों में भारतीयों के डिपॉज़िट में 50 फ़ीसदी इज़ाफ़ा इस साल हुआ है वैसे ही विपक्ष दल हमलावर हो गए। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी सरकार से जवाब माँगने लगे। बोले कि पहले स्विस बैंकों में जमा राशि को काला धन बताने वाले अब उस धन को सफ़ेद बता रहे हैं। यहाँ तक तो ठीक है मगर अब सरकार के अपने ही अपनों के ख़िलाफ़ बोलने लगे। भाजपा सीनियर नेता सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने वित्त मंत्री का इस्तीफ़ा तक माँग लिया। अब कौन से वाले वित्त मंत्री को इस्तीफ़ा देना चाहिए यह स्वामी जी ने स्पष्ट नहीं किया।

मौजूदा वक़्त में मुल्क में दो वित्त मंत्री हैं। अरुण जेटली पूर्णकालिक और पीयूष गोयल प्रभारी वित्त मंत्री हैं। जेटली जी ट्विटर और ब्लाग से वित्त विभाग चला रहे हैं तो गोयल जी दफ़्तर और टीवी के ज़रिए वित्त मंत्रालय का कामकाज संभाले हुए हैं। बावजूद इसके विदेशों बैंकों में बेख़ौफ़ धन जमा किया जा रहा है। जीएसटी की चोरी भी धड़ल्ले से जारी है। कुछ दिन पहले ही जीएसटी इंटेलीजेंस के डीजी जॉन जोसेफ़ ने बताया था कि जीएसटी चोरी चल रही है। सिर्फ़ एक प्रतिशत कारोबारी ही 80 फ़ीसदी जीएसटी जमा कर रहे हैं। अब यह सोचने वाली बात है कि देश में 1 करोड़ 11 लाख कारोबारियों ने जीएसटी में अपना पंजीयन कराया है, उनमें से मात्र एक फ़ीसदी कारपोरेट और बड़े व्यवसायी ही टैक्स अदा कर रहे हैं। डीजी जोसेफ़ ने माना कि रिटर्न भरने में लोगों को काफ़ी दिक़्क़त आ रही है। उन्होंने यह माना कि योजनाबद्ध तरीक़े से फ़र्ज़ी चालान तैयार किए जा रहे हैं।

जॉन जोसेफ़ के बयान से लगता है कि जीएसटी भी नोटबंदी की तर्ज़ पर जल्दबाज़ी में लागू की गई थी। जब नोटबंदी हुई थी तो कहा गया था कि लगभग 14 लाख करोड़ रुपए के हज़ार-पाँच सौ के नोट चलन में है। क़रीब-क़रीब 4 लाख करोड़ रुपए काला धन निकल आएगा। काला धन तो निकला नहीं उलटे आज तक़रीबन सवा अट्ठारह लाख करोड़ रुपए मार्केट में चल रहे हैं। फिर भी मार्केट में कैश फ़्लो नज़र नहीं आ रहा है। माना जा रहा कि बैंकों में बढ़ता एनपीए और घोटालों से डर कर सामान्य लोगों ने अपना पैसा निकाल लिया।

दूसरी तरफ़ बाज़ार का असेसमेंट बता रहा है सभी तरह के कारोबार नोटबंदी के बाद से ठंडे पड़े हैं। व्यापारी वर्ग में निराशा के भाव हैं। नोटबंदी के दौरान और जीएसटी लागू होने के बाद जिस तरह फटाफट नियम बदले गए उसकी वजह से कारोबारियों का भरोसा डावाँडोल है। सरकार कब कौन सा नियम ले आए या लागू कर दे इसकी वजह से भी असमंजस्य बनी हुई है।

हालाँकि सरकार अपनी तरफ़ से हर भरसक प्रयास कर रही है कि आर्थिक हालात जल्द सुधर जाए परंतु नौकरशाही और लालफ़ीताशाही की सुस्ती सरकार की इस कोशिश में आड़े आ रही है। वहीं कहीं न कहीं नीतिगत मामलों में स्पष्टता का अभाव है।

जहाँ तक सुब्रमण्यम स्वामी का सवाल है वो हमेशा चर्चा में बने रहने वाला बयान देते हैं। शायद इसीलिए उन्होंने वित्त मंत्री का इस्तीफ़ा माँग लिया। वैसे स्वामी को अर्थशास्त्र का बेहतरीन ज्ञान है, सरकार को उनके अनुभवों का लाभ उठना चाहिए।

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जय हिन्द
ज़हीर अंसारी