नेतृत्व और मार्गदर्शन के बिना नहीं होता काम ……

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ज़हीर अंसारी
आजकल दो शब्द काफ़ी प्रचलन में है। पहला नेतृत्व और दूसरा मार्गदर्शन। पहले इन शब्दों का इस्तेमाल विशेष परिस्थितियों में किया जाता रहा है, लेकिन अब यह शब्द चलतू टाइप हो गया है। जहाँ देखो वहीं ठोंक दिया जाता है। अब तो नेतृत्व और मार्गदर्शन शब्द के अर्थ को हँसी में लिया जाने लगा है।

सत्ता का संचालन किसी के नेतृत्व या मार्गदर्शन में चले तो समझ आता है। अब प्रशासनिक कार्य सिर्फ़ और सिर्फ़ नेतृत्व और मार्गदर्शन में होते हैं। मतलब यह कि सभी विभागों का प्रशासन तंत्र पूरी तरह निकम्मा हो गया है या मान लिया गया। विभाग प्रमुख को छोड़ कर बाक़ी अमले को डंडे के बल पर हकालना पड़ता है तभी कामकाज होता है।वरना बीच का अमला दिन भर मटरगश्ती करता रहता है, ऐसा विभाग प्रमुख द्वारा जताया है। हाँ..जब कोई काम नहीं होता या बिलुर जाता है तो ढींगरा इसी बीच या नीचे वाली जमात पर फोड़ा जाता है।

हाल-फ़िलहाल देखने में आ रहा है कि रेलवे, विद्युत कम्पनी, शासकीय-अर्ध शासकीय, स्थानीय निकाय, ज़िला एवं पुलिस प्रशासन में जो भी कार्य सफलतापूर्वक हो जाते हैं उनका सहरा विभाग प्रमुख के सिर बाँधने की परंपरा प्रारम्भ हो गई है यानि चाटुकारिता परंपरा। फ़ौरन प्रेस नोट जारी हो जाएगा। फ़लाँ के नेतृत्व में, फ़लाँ के मार्गदर्शन में फ़लाँ काम कामयाबी मिली है। उन लोगों को दरकिनार कर दिया जाता है जिनकी मेहनत और भागदौड़ से कामयाबी मिलती है।

चार चोर पकड़े जाने से लेकर अस्पताल में नर्स को निलम्बित करने तक, नाली निर्माण से लेकर कोरी योजनाओं की घोषणा तक, बिजली लाईन मरम्मत से लेकर बिजली आपूर्ति तक, प्लेटफ़ार्म के शौचालय की सफ़ाई से लेकर रेलवे ट्रेक का मेगा ब्लाक क्लीयर करने तक तथा आँकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने तक का काम किसी किसी के नेतृत्व व मार्गदर्शन में ही हो रहा है। साधारण भाषा में इसे ऐसे समझ सकते हैं कि विभाग प्रमुख अपनी छवि नेताओं के समान चमकाने में लगे हैं। विभाग प्रमुख सत्ता को यह दिखाना चाहते हैं कि विभागीय अमला निठल्ला बन चुका है। यह तो उनकी क्षमता है जो इन निठल्लों से काम ले रहा है।

और अधिक हल्के में ऐसे समझा जा सकता कि नेताओं की तरह विभाग प्रमुखों को भी पब्लिसिटी का चस्का लग गया है। ठीक भी है जब सब काम/योजनाएँ प्रचार आधारित चल रही है तो ये शीर्ष अधिकारी प्रचार के ज़रिए श्रेय क्यों न लें।

यही हाल सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं का है। छोटे से छोटे कामों में नेतृत्व और मार्गदर्शन का बखान किया जाता है। अब तो लगने लगा कि अगर ये दो शब्द न होते तो कोई अपने कर्तव्यों का निर्वहन न करता।