नया शिगूफा मप्र में एक और सरकारी डेंटल कालेज

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राकेश दुबे

सरकार को १९६१ के बाद अब मध्यप्रदेश में एक और सरकारी दंत चिकित्सा महाविद्यालय [डेंटल कालेज ] खोलने की आवश्यकता महसूस हुई है | विश्व स्वास्थ्य सन्गठन की रिपोर्ट को आधार बनाकर इसके औचित्य को सही ठहराता एक प्रस्ताव प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग में घूम रहा है | “१००० की आबादी पर एक दंत चिकित्सक की आवश्कता” १९९० में कहे गये इस वाक्य पर जोर दिया जा रहा है कि प्रदेश में एक और सरकारी दंत चिकित्सा महाविद्यालय होना चाहिए | इस विषय पर सरकार अब इतनी गंभीर क्यों है ? एक प्रश्न है, इसके विश्लेष्ण से जो उत्तर प्राप्त होता है “वो अभी नहीं तो कभी नहीं” के सिद्धांत का पोषण करता है |
प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा पर एक दृष्टि डाले तो १९४६ में राज्य में पहला सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय ग्वालियर में खोला गया था | अब तक सरकार ६ चिकित्सा महाविद्यालय खोल चुकी और कुछ और खोलने जा रही है | इन महाविद्यालयों में ८०० सीटें है | इसके विपरीत पिछले कुछ सालों में रसूखदार लोगों के संरक्षण / भागीदारी में ८ निजी चिकित्सा महाविद्यालय खुलवाये गये जिनमे १२०० सीटें है | इन २००० सीटों पर प्रवेश की मारमारी ने ही प्रदेश में व्यापमं जैसे घोटाले को जन्म दिया है | दंत चिकित्सा महाविद्यालय खोलना, उसमें प्रवेश और परीक्षा की कहानी किसी तिलिस्म से कम नहीं है | अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार १९६१ के बाद २०१८ में दूसरे दंत चिकित्सा महाविद्यालय की सोच रही है | इसके विपरीत निजी क्षेत्र में १४ दंत चिकित्सा महाविद्यालय चल रहे हैं | सरकार के पास दंत चिकित्सा में स्नातक की ४० और स्नातकोत्तर की १० सीटें है और निजी क्षेत्र में स्नातक की १३२० और स्नातकोत्तर डिग्री हेतु २२५ सीटें हैं |
मूल प्रश्न सरकार पिछले सालों में सरकारी दंत चिकित्सा महाविद्यालय क्यों नहीं खोलना चाहती थी और अब क्यों खोलने की इच्छुक है ? स्वशासी होने के बावजूद सरकारी खाते से सुरक्षित वेतन, पदोन्नति और तबादले का डर नहीं जैसी नौकरी में कौन नहीं आना चाहेगा और पालक रसूखदार हो तो कहना ही क्या |
वैसे प्रदेश में दंत चिकित्सकों के सामने रोजगार का संकट है | विभागीय विशेषग्य निजी चिकित्सा महाविद्यालयों से उत्तीर्ण छात्रों में गुणवत्ता में कमी मानते हैं | भारी- भरकम फ़ीस देने के बाद भी ये छात्र वो सब नहीं सीख पाते जिसे दंत चिकित्सा कौशल कहा जा सके | प्रदेश के एक मात्र शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय से उत्तीर्ण छात्रों का रोजगार प्रतिशत और गुणवत्ता तुलनात्मक रूप से बेहतर है | अब निजी दंत चिकित्सा महाविद्यालय से उत्तीर्ण सारे दंत चिकित्सक कहाँ जाएँ ? और पालक रसूखदार हो तो और भी कष्ट | ऐसे में एक मात्र रास्ता और और सरकारी दंत चिकित्सा महविद्यालय ही है | १९६१ के बाद सरकार को अब यह शिगूफा इसी कारण सूझा है की १४ रसूखदार परिवारों के स्नातकोत्तर दंत चिकित्सकों को तत्काल सुरक्षित रोजगार उपलब्ध कराना है | अभी नही तो कभी नहीं की तर्ज़ पर | चुनाव सर पर है, लौटे तो ठीक, नहीं तो प्रस्तावित योजना में सन्तान को सुरक्षित रोजागर तो मिल ही जायेगा |
फोटो प्रतीकात्मक है