सऊदी में नारी अस्मिता की एक नयी सुबह का होना

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-ललित गर्ग-

रूढ़िवादी एवं जड़तावादी देश सऊदी अरब में उदारता और आधुनिकता लाने की शाहजादा मोहम्मद बिन सलमान की कोशिशों के तहत तीस वर्षों से चला आ रहा महिलाओं के वाहन चलाने पर लगे प्रतिबंध के कानून में ऐतिहासिक सुधार वहां के महिला समाज के लिये एक नयी सुबह का आगाज है। इस विषयक ताजा फैसले में नारी की अस्मिता एवं अस्तित्व को एक नयी पहचान दी गयी है। अब वहां का महिला समाज सड़कों पर फर्राटा भरते हुए वाहन चला सकेगी। इस निर्णय से महिलाओं में आत्मविश्वास जागेगा। इस निर्णय से महिलाओं को न केवल गरिमा से जीने का अधिकार देने की बात कही गयी है बल्कि स्त्री-पुरुष की समानता पर भी मोहर भी लगाई गयी है। युगों से आत्मविस्मृत नारी को अपनी अस्मिता का भान कराने की दृष्टि से इस तरह के संवैधानिक प्रावधानों में परिवर्तन न केवल पुरुष मानसिकता को बदलने में सहायक होंगे बल्कि एक समतामूलक समाज की संरचना भी हो सकेगी।
सऊदी में 24 जून 2018 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। वहां इस रात का नजारा बिल्कुल अलग था। बड़ी संख्या में महिलाएं सड़कों पर जश्न मना रही थीं। रात 12 बजते ही महिलाएं गाड़ी लेकर सड़कों पर निकल पड़ीं। रास्ते में लोग इन्हें शुभकामनाएं दे रहे थे। चेक प्वाइंट्स पर पुलिसवालों ने गुलाब के फूल देकर इनका स्वागत किया, जो इससे पहले गाड़ी चलाने पर महिलाओं को जेल भेज देते थे, उन पर आतंक से जुड़ी धाराएं लगाते थे, उन्हें इस कानून की आड में तरह-तरह से प्रताड़ित करते थे। दुनिया में सिर्फ सऊदी में महिलाओं पर इस तरह की पाबंदी थी। इस आजादी पाने के लिए इन्हें 28 साल संघर्ष करना पड़ा।
सऊदी अरब में महिलाओं को पुरुषों के कठोर अनुशासन में रहना पड़ता है। उनकी इच्छा के विरुद्ध शादी नहीं कर सकतीं, विदेश नहीं जा सकतीं। पुरुषों से मिलने पर रोक, गैर पुरुष से मित्रता नहीं कर सकतीं। न ही उनके साथ कहीं जा सकती हैं। ड्रेस कोड के अन्तर्गत पब्लिक प्लेस पर महिलाओं को लंबे और ढीले कपड़े पहनना जहां वर्जित है वहीं उनके लिये हिजाब पहनना जरूरी है। वर्किंग नियमों में महिला डॉक्टर, मेल डॉक्टर की अनुमति बगैर पुरुषों का इलाज नहीं कर सकतीं। महिलाएं अकेले घूम नहीं सकतीं। ऐसा करने से रोकने के लिए धार्मिक पुलिस है। इस तरह की अनेक पाबंदियों के बीच वहां का नारी जीवन एक त्रासदी से कम नहीं है।
इस जड़ जीवन से नारी को मुक्ति दिलाने के लिये मानल अल-शरीफ 19 मई 2011 से संघर्षरत है। उस दिन उन्होंने गाड़ी ड्राइव करते हुए गिरफ्तारी दी थी। उन्हें 73 दिन जेल में रहना पड़ा था। इसके बाद वूमन टू ड्राइव मूवमेंट को उन्होंने गति दी। अभी मानल सिडनी में रहती हैं। ड्राइविंग का हक मिलने पर वे बहुत खुश है और कहती हैं- यह महज शुरुआत है। अभी हमें लंबी दूरी तय करनी है। सऊदी में महिलाओं को पुरुषों का गुलाम बनकर रहना पड़ता है। घरेलू हिंसा का भी कानून नहीं है। मेरे लिए आजादी का मतलब है कि गर्व के साथ जीना। नवंबर 1990, सऊदी की 40 महिलाओं ने रियाद में एक साथ गाड़ी चलाई। यह प्रतिबंध के खिलाफ पहली बार सार्वजनिक तौर पर विरोध था। इन महिलाओं को एक दिन के लिए जेल हुई और साथ ही पासपोर्ट भी जब्त कर लिया गया। इसके बाद लम्बा संघर्ष चला। आज उनके संघर्ष की जीत हुई है।
शेर चलते हुए आगे भी देखता है और पीछे मुड़कर भी देखता है। आज प्रश्न केवल सऊदी अरब के मुस्लिम महिला समाज का ही नहीं है, बल्कि दुनिया के सम्पूर्ण महिला समाज का है, वह आज जिस पड़ाव पर खड़ा है, वहां से जब उसके आगे बढ़ते कदमों को देखा जाता है तो उनकी क्षमताओं का विस्तार हुआ है, आज वह हर क्षेत्र में अग्रणी है, चाहे ओटो चलाना हो या हवाई जहाज। चाहे घर चलाना हो या राष्ट्र। चाहे नौकरी करना हो या लोगों से काम लेना। चाहते पत्रकारिता हो, चाहे वकालत हो, चाहे व्यापार हो, चाहे डाॅक्टरी का पेशा, चाहे इंजीनियरिंग हो या कोई भी तकनीकी क्षेत्र- महिलाओं ने सफलता के कीर्तिमान स्थापित किये हैं। उसके कर्तृत्व का परचम हर क्षेत्र में फहरा रहा है। महानगरों में फैलती हुई सडकों की तरह महिलाओं का कार्यक्षेत्र भी अब फैलता जा रहा है। निःसंदेह महिलाओं ने ज्ञान-विज्ञान से अपने कद को ऊंचा उठाया है लेकिन इस पड़ाव पर ठहर कर जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो कई प्रश्न उत्तर पाने कि प्रतीक्षा में खड़े नजर आते हैं। वे प्रश्न हैं- कहीं हमारे संस्कारों की जमीन हमारे पैरों तले से सरकती तो नहीं जा रही है? कहीं कैरियर कोन्सियनेस की प्रतिस्पद्र्धा हमारे मानसिक तनाव को तो नहीं बढ़ा रही है? कहीं पाश्चात्य संस्कृति के संक्रामक कीटाणुओं ने हमारी जड़ों पर हमला तो नहीं कर दिया है। इन सब प्रश्नों के उत्तर महिला समाज को अपने भीतर तलाशने होंगे।
इसी सोच को विकसित करके महिलाएं सदियों से चले आ रहे पुरुषों के पारंपरिक नजरिया को बदल सकती है, जहां पुरुष को स्त्री के मालिक के रूप में ही देखने का नजरिया रहा है। इसलिए अब तक सारे अहम फैसलों में पुरुष का ही वर्चस्व बना रहा है। नारी को दोयम दर्जा ही मिला हुआ है। कैसी दुर्भाग्यपूर्ण विसंगति है कि नारी का शिक्षित, आत्मनिर्भर एवं कर्तृत्व सम्पन्न होने पर भी उसका शोषण समाप्त होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। जबकि सच यह है कि पुरुष ने नारी को आधार बनाकर ही उच्च सोपानों को छुआ है। पुरुष की मानसिकता महिलाओं की प्रगति को कुछ समय के लिये बाधित कर सकती है लेकिन रोक नहीं पायेंगी क्योंकि परिवार, समाज और राष्ट्र का हित नारी प्रगति में ही निहित है। नारी की समता और क्षमता से न केवल परिवार में संतुलन रहता है बल्कि समाज एवं राष्ट्र को संरक्षण भी मिलता है।
नारी समाज में अभिनव स्फूर्ति एवं अटूट आत्मविश्वास भरने के लिये पुरुषों की मानसिकता बदलना जरूरी है। जहां केवल पुरुष की मर्जी चलती हो, स्त्री की मर्जी कोई मायने न रखती हो, वहां स्त्री पुरुष की चल संपत्ति या वस्तु जैसी हो जाती है, उसके प्रति भेदभाव का नजरिया पनपने लगता है, उसे कमजोर समझा जाने लगता है, वस्तुतः एक महिला प्रकृति से तो कमजोर होती ही है, उसे शक्ति से भी इतना कमजोर बना दिया जाता है कि वह अपनी मानसिक सोच को भी उसी के अनुरूप ढाल लेती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि शाहजादा मोहम्मद बिन सलमान की सोच एवं उसकी जागरूकता नारी पर सदियों से चले आ रहे दुर्भाग्य को मिटाकर उसे गौरव के साथ जीने का धरातल देंगी। इसी से नारी के जीवन में उजाला होगा और वह सदियों से उस पर लादी जा रही हीनता एवं दुर्बलता की ग्रंथियों से मुक्त हो सकेगी।